सूचना आयोग की सख्ती: मामले को टालना महंगा पड़ा, दो कलेक्टर सहित पांच अफसरों को नोटिस

सूचना आयोग की सख्ती: मामले को टालना महंगा पड़ा, दो कलेक्टर सहित पांच अफसरों को नोटिस

मीडियावाला.इन।

जानकारी नहीं दी तो नगरीय प्रशासन

विभाग के पांच अफसरों को नोटिस

-विभाग के तत्कालीन डिप्टी सेक्रेटरी भरत यादव और गोपालदास डाढ अब जबलपुर और खरगोन में कलेक्टर हैं। ये दोनों पूर्व लोक सूचना अधिकारी हैं।

-वर्तमान लोक सूचना अधिकारी राजीव निगम और अधीक्षण यंत्री राजीव गोस्वामी के लिखित जवाब विरोधाभासी होने पर आदेश में आयोग की सख्त टिप्पणी।

-एक अफसर के खिलाफ हुई जांच की रिपोर्ट देने में 24 महीने लग गए, तब जानकारी किसी काम की नहीं थी।

-------------- 

भोपाल। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के एक मामले में राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने नगरीय प्रशासन विभाग के पांच अफसरों को जुर्माने के नोटिस भेजे हैं।

इनमें दो आईएएस अधिकारी जबलपुर कलेक्टर भरत यादव और खरगोन कलेक्टर गोपाल चंद्र डाढ शामिल हैं। सूचना के अधिकार के तहत जब जानकारी मांगी गई थी तब ये नगरीय प्रशासन विभाग में लोक सूचना अधिकारी के पद पर कार्यरत थे।

इनके अलावा वर्तमान लोक सूचना अधिकारी राजीव निगम, कार्यपालन यंत्री राजीव गोस्वामी और हिमांशु वर्मा को भी लोक सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 (1) के तहत 25-25 हजार जुर्माने के नोटिस थमाए हैं।

अगली सुनवाई में 27 अगस्त को आयोग ने इस मामले के सारे दस्तावेज तलब किए हैं।

 विदिशा निवासी अचल दुबे ने 25 मई 2017 को नगरीय प्रशासन विभाग में एक जानकारी के लिए आवेदन लगाया था। उन्हें विदिशा नगर पालिका परिषद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आरके कार्तिकेय के खिलाफ हुई किसी जांच के दस्तावेज चाहिए थे।

लेकिन न तो समय पर जानकारी दी गई और न ही कोई जवाब दिया गया। आवेदक की ओर से स्मरण कराए जाने पर भी आवेदन को अटकाकर रखा गया। गलत जानकारी दी गई कि जांच की कार्रवाई अभी जारी है।

दुबे ने आयोग में अपील प्रस्तुत की और नियमित सुनवाइयों में सिद्ध किया कि विधानसभा में फरवरी 2016 में ही यह बताया जा चुका है कि इस प्रकरण में जांच पूरी हो चुकी है। विभाग के स्तर पर फिर यह कहकर टाला गया कि फाइल संचालनालय के स्तर पर परीक्षण में है।

जबकि ऐसा नहीं था। उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि संचालनालय में फाइल कब भेजी गई।

 आयोग ने पाया कि तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी अपने स्तर पर प्रकरण का निराकरण में प्रथम दृष्टया असफल सिद्ध हुए। आयोग के समक्ष प्रस्तुत वर्तमान लोक सूचना अधिकारी राजीव निगम और अधीक्षण यंत्री राजीव गोस्वामी के पत्रों में भी विरोधाभासी बातें सामने आईं।

निगम ने अप्रैल 2019 में आयोग को बताया कि फाइल आज ही प्राप्त हुई है और 22 पृष्ठों की जानकारी अपीलार्थी को भेजी जा चुकी है। हालांकि वे इसका प्रमाण नहीं दे पाए कि यह जानकारी भेजी किस तरीके से गई।

अपीलार्थी ने कहा कि उन्हें कोई जानकारी मिली ही नहीं है। जबकि राजीव गोस्वामी के एक पत्र से पता चला कि फाइल फरवरी 2019 में ही भेजी जा चुकी थी। पिछली सुनवाई में जब आयोग ने अपीलार्थी को जानकारी उपलब्ध कराई तब अपीलार्थी ने कहा कि दो साल बाद मिली यह जानकारी उनके किसी काम की नहीं है।

 सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने अपने आदेश में टिप्पणी की है कि विभाग में इस प्रकरण में हुआ पत्र व्यवहार भी विरोधाभासी है और ऐसा लगता है कि जानकारी देने की बजाए जानबूझकर टालमटोल की गई है।

लगातार टालमटोल और समय पर जानकारी देने की बजाए तर्कहीन प्रयास इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि दाल में कुछ काला अवश्य है। विभाग का रवैया ही अपने आप में पर्याप्त पक्ष है।

एक साथ कई स्तरों पर जानबूझकर जानकारी छिपाने का प्रयास किया गया है। इस केस में अब तक छह सुनवाइयां हो चुकी हैं।

- "आरटीआई को आए 14 साल हो गए। लोक सूचना अधिकारियों का आम रवैया मामलों के निराकरण की बजाए टालमटोल का है। समय पर सही जानकारी देने में दिलचस्पी का अभाव है।

30 दिन की समय सीमा पार होते ही वे 25 हजार रुपए के जुर्माने के दायरे में आ जाते हैं। नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों में सुधार की ज्यादा जरूरत है।"

-विजय मनोहर तिवारी, राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश।

 

 

 

0 comments      

Add Comment