Millets Panicum Antidotale: कुटकी खाओ टनाटन हो जाओ!

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millets Panicum antidotale
Millets Panicum Antidotale
आहार विज्ञानं 

Millets Panicum Antidotale: कुटकी खाओ टनाटन हो जाओ:

पातालकोट के भारिया आदिवासियों का मुख्य अनाज है यह।

                                      क्या खास है कुटकी में ? आइये जानते है...

आखिर कुटकी को क्यों पसंद करते हैं भरिया जनजाति के लोग। कुटकी एक प्राकृतिक और पारंपरिक मोटा अनाज है, इस जैसा दुनिया मे कोई नही। पातालकोट में इसे उगाने के लिए न तो सिंचाई व्यवस्था है, न ही उर्वरक डाली जाती गई और न ही इसे कीटनाशक लगता है। पातालकोट का खास व्यंजन है कुटकी भात, मकई की रोटी, बेसन और पोपटी की दाल। लेकिन आज की कहानी का पात्र कुटकी है। इसे खाने वाले टनाटन रहते हैं, क्योंकि बड़े बड़े शहरी रोग इससे दूर भागते हैं। बीजों को और फसल को देखकर आप समझ ही गये होंगे कि इनका उत्पादन बहुत सीमित होता है, क्योंकि आज भी ये प्राकृतिक दशाओं में ही उग रहे हैं।
Kutki
यह एक जड़ी-बूटी है। आयुर्वेद में कुटकी के बारे में विस्तार से अनेक अच्छी और महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। कुटकी का इस्तेमाल (katuki churna uses)रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। बरसों से आयुर्वेदाचार्य मरीज को स्वस्थ करने के लिए कुटकी का उपयोग करते आ रहे हैं।कुटकी (picrorhiza kurroa) पचने में हल्की, पित्त और कफ की परेशानी को ठीक करने वाली, भूख बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी है। यह बुखार, टॉयफॉयड, टीबी, बवासीर, दर्द, डायबिटीज आदि में भी लाभ (kutki ke fayde) पहुंचाती है। इसके साथ ही कुटकी सांसों की बीमारी (सांसों का उखड़ना या फूलना), सूखी खाँसी, खून की अशुद्धता, शरीर की जलन, पेट के कीड़े, मोटापा, जुकाम आदि रोगों में भी मदद करती है।
Millets Panicum Antidotale
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आज की पोस्ट में कुटकी के बारे में पंचायत होगी, जहाँ इसकी गुणवत्ता की भी पेशी होगी और हमारे जैसे कुटकी प्रेमियों की भी, कि क्यों वे कुटकी के लालच में जंगल-जंगल, पहाड़ -पहाड़ भटकते रहते हैं। कुटकी छिंदवाडा जिले के पातालकोट में पाया जाने वाला एक खास अनाज है, यह पेट की भूख शांत करने के साथ साथ स्वास्थ्य का बीमा करने वाला अनाज भी है। जिसमें अनेक प्रकार के स्वास्थ्यवर्धक गुण भी पाए जाते हैं। इस घास कुल पोएसी (poaceae) के सदस्य का वैज्ञानिक नाम पैनिकम एंटीडोटेल (Panicum antidotale) है।
भारत में 60 के दशक के पहले तक कदन्न अनाज (Coarse grain) की खेती की परम्परा थी। हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से कदन्न अनाज का उत्पादन करते आये हैं। 1960 में हरित क्रांति के बाद हाइब्रिड गेंहू एवं चावल का बहुतायत उत्पादन होने लगा और इन मोटे अनाजों की उपेक्षा होने लगी। प्राचीनता की बात करें तो यजुर्वेद में कदन्न अनाज का उल्लेख मिलता है। 50 साल पहले तक मध्य और दक्षिण भारत के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में मोटे अनाज की खूब पैदावार होती थी और देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन में कदन्न अनाज की हिस्सेदारी 40 फीसदी थी। उस समय मानव शरीर अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ होता था। कदन्न अनाज को मोटा अनाज भी कहा जाता है क्योंकि इनके उत्पादन में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लेकिन यही नाम इनकी उपेक्षा का भी कारण बना वो तो भला हो शासन कि शासन को इनका महत्व समझ आ गया और अब ये श्री अन्न जैसे पवित्र नाम से जाने जाते हैं। ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उग जाते हैं। कुटकी भी श्रीअन्न में से एक है। ये कुपोषण से जंग का मुख्य हथियार बन सकते हैं।
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कुटकी के दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा तथा 65.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, फाइबर्स, कई तरह के पोषक तत्व जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, जिंक, आयरन, विटामिन ए और एमीनो एसिड भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं। आजकल मोटापा और मधुमेह रोग देखकर चिकित्सक चावल नहीं खाने की सलाह देते हैं जबकि कुटकी में अधिक फायबर होने के कारण यह मधुमेह के रोगियों के लिए भी सेवन योग्य है। इसे खाने से पेट संबंधी रोग नहीं होते और यह सुपाच्य भी होता है। इसके सेवन से मूत्र संबंधी विकार भी नही होते हैं। इसमें पाये जाने वाले एमीनो एसिड शरीर में कोलेस्ट्रॉल कम करते है। कैल्शियम और फॉस्फोरस हड्डी से जुड़ी परेशानियां दूर करने मे सहायक है, इसके अतिरिक्त इसमें पोषण भी भरपूर मात्रा मे पाया जाता है। हाँ और एक खास बात जो इसे बेहद आकर्षक बनाती है और वो यह है कि सिर्फ 2 चीनी के चम्मच जितनी कुटकी से एक सामान्य इंसान की खुराक के लायक कुटकी चावल तैयार किये जा सकते हैं। हमने आधा ग्लास कुटकी और एक चौथाई ग्लास मूँग दाल के साथ ढेर सारी सब्जियों का प्रयोग करते हुए पूरे परिवार के लिए कुटकी की खिचड़ी बनाई है। इसे गाँव की भाषा मे शैला होना (फैलना, बढ़ जाना) कहते हैं। इसके स्वाद के विषय मे जितना कहूँ उतना कम है।
कुटकी नाम के विषय मे एक अन्य पादप Picrorhiza kurroa से भ्रम उत्पन्न होता है, जिसके कारण लोग कुटकी का स्वद कड़वा समझते हैं। जबकि यह धान की तरह किन्तु छोटे आकार का चावल है और अत्यंत कम पानी के जमाव वाले पहाड़ी ढलानों में उगता है, अतः इसकी खेती आज भी प्राकृतिक तरीके से ही होती है। इसका आकार अत्यंत छोटा होने के कारण इससे अनाज को निकालना भी मशक्कत का काम है, जिसे ग्रामीण बखूबी अंजाम देते हैं। अनाज निकालने के लिए उखड़ी में अनाज डालकर लकड़ी के मूसर से इसे कूटा जाता है, फिर फटककर अनाज से छिलका अलग कर लिया जाता है।
जिन लोगों को पेट संबंधी समस्याएं हैं, उनके लिए भी कुटकी का इस्तेमाल करना काफी लाभदायक हो सकता है। कुटकी में मौजूद कुछ खास तत्व पाचन क्रिया को तेज करने में भी मदद करते हैं। यहाँ के निवासी बताते हैं कि कुटकी खाने से हल्का बुखार अगर बना रहता हो तो वह निकल जाता है। थका हुआ महसूस करने वालों के लिए कुटकी का सेवन करना काफी लाभदायक होता है। आजकल पातालकोट में इसके लड्डू भी बनने लगे हैं।
पातालकोट में अपने भ्रमण के दौरान हमे कुटकी भात, पोपटी की दाल, मकई की रोटी और बेसन खाने को मिलता है। कुटकी का चावल वैसे तो गुणों की खान है लेकिन इसे बनाना भी किसी कला से कम नही क्योंकि यह अत्यंत बारीक अनाज है, और इसमें काफी कंकड़ रहते हैं। केवल अनुभवी लोग ही इसे कई कई बार परोरकर कंकड़ रहित बनाते हैं। बनाने की विधि चावल की तरह ही है। हमारे घर सामान्यतः ग्रामीण जीवन शैली अनुसार ही भोजन पकाया व ग्रहण किया जाता है। पिछले वर्ष से हमने श्रीअन्न को हमारी रसोई में शामिल किया हुआ है। आज आप लोगो के साथ पातालकोट से अलग थोड़े नये कलेवर में कुटकी की खिचड़ी परोस रहा हूँ, पसंद आये तो तारीफ करने में कंजूसी न करियेगा। एक बात और बताऊँ बनाने का तरीका वही खिचड़ी वाला ही है। जो उपलब्ध हो, उसे कम ज्यादा, आगे पीछे भी कर दें, तो कोई आसमान नही टूट पड़ेगा। जैसा भी बनायेंगे, स्वाद में कमी नही होगी।

 विशेष नोट; सावधानी –यह लेख मोटे अनाज के प्रति जागरूकता के लिए पोस्ट किया गया है .अपने डॉक्टर से सलाह कर उपयोग करें .

  1. यह जड़ी-बूटी प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय बनाती है। यदि आपको मल्टीपल स्केलेरोसिस या ल्यूपस जैसी बीमारी है तो इसका इस्तेमाल ना करें।
  2. सर्जिकल ऑपरेशन कराने जा रहे हैं तो ऑपरेशन के पूरा होने के 2 सप्ताह बाद ही इसका सेवन करें।
  3. कुटकी शरीर में रक्त में शर्करा के स्तर को कम करती है। मधुमेह रोगी को इसके सेवन के दौरान शर्करा के स्तर में परिवर्तन की जांच करते रहना चाहिए। यदि आप देख रहे हैं कि यह आपके स्तर को कम कर रही है तो इसके सेवन से बचने की कोशिश करें।
  4. स्तनपान कराने वाली महिलाओं को बिना डॉक्टर की सलाह के इसके सेवन से बचना चाहिए।
धन्यवाद
डॉ विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय।महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाडा (म.प्र.)

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