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केतकर से पहले धर्म प्रमुख मोहन भागवत को सीधी चुनौती दे चुके हैं। जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने 23 दिसंबर को कहा था कि संघ प्रमुख ने अच्छा नहीं कहा। संघ भी हिंदुत्व के आधार पर बना है। जहां-जहां मंदिर या मंदिर के अवशेष मिल रहे हैं, उन्हें हम लेंगे। वे संघ प्रमुख हैं, हम धर्माचार्य हैं। हमारा क्षेत्र अलग है, उनका अलग। वे संघ के सरसंघचालक हैं, हमारे नहीं। राम मंदिर पर बयान देना दुर्भाग्यपूर्ण है।ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संघ प्रमुख पर राजनीतिक सुविधा के अनुसार बयान देने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि जब सत्ता हासिल करनी थी, तब वे मंदिर-मंदिर करते थे। अब सत्ता मिल गई तो मंदिर नहीं ढूंढने की नसीहत दे रहे हैं। अगर हिंदू समाज अपने मंदिरों का पुनरुद्धार कर उन्हें पुनः संरक्षित करना चाहता है तो इसमें गलत क्या है।
तो मोहन को उनके मंदिर-मस्जिद ज्ञान से सार्वजनिक तौर पर चुनौती मिल रही है। संघ की पत्रिका के संपादक ही अगर मोहन को ज्ञान दे रहे हैं तो विषय के विवाद को समझा जा सकता है। समझ यह नहीं आ रहा है कि हिंदुत्व के हिमायती संघ के प्रमुख भागवत के मन में आखिर चल क्या रहा है। क्या वह संघ को नई दिशा में ले जाने को उत्सुक हैं, जिसमें अब हिन्दू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद से दूर संघ की सोच को संविधान के करीब देखा जा सके। या फिर राम मंदिर निर्माण के बाद के जनमत से आहत होकर संघ प्रमुख नए विचारों से ओतप्रोत नजर आ रहे हैं। या फिर 75वें साल में चल रहे और संघ प्रमुख के पद पर चल रहा उनका सोलहवां साल उन्हें थकाने वाला साबित हो रहा है। खैर जो भी हो पर मोहन ज्ञान पर सवालिया निशान ने उथल-पुथल पैदा कर दी है। अब चारों तरफ से घेरकर उन्हें घायल करने की कोशिश की जा रही है। इसके बाद यह तय लग रहा है वक्त ही इन हालातों का उचित जवाब देगा…या तो मोहन मौन रहकर नीलकंठ बनेंगे या फिर मुखर होकर अपने बयान की तर्कसंगतता का दावा करेंगे। फिलहाल बाकी सभी को छोड़ दें, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के संपादक ‘केतकर के ज्ञान’ से ‘मोहन का मान’ आहत नजर आ रहा है…।