मम्मी चली गईं, स्मृतियां रह गईं

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मम्मी चली गईं, स्मृतियां रह गईं

▪️अरुण दीक्षित▪️

कुछ रिश्ते खून से नहीं, विश्वास, अपनत्व और समय की कसौटी पर गढ़े जाते हैं। ऐसे रिश्ते जीवन में मां की तरह ही सुरक्षा, स्नेह और संबल देते हैं। जब वे अचानक छूट जाते हैं, तो शब्द कम पड़ जाते हैं और स्मृतियां बोलने लगती हैं। यह लेख केवल एक शोक संदेश नहीं, बल्कि उस मां के लिए एक आत्मीय स्मरण है, जिसने बिना जन्म दिए भी मातृत्व का पूरा अधिकार निभाया। यह लेख एक बेटे के मन की वह आवाज है, जिसमें कृतज्ञता, टूटन और सम्मान एक साथ बहते हैं।

 

▪️मम्मी नहीं रहीं..▪️

आज सुबह से ही तबियत ढीली थी,इसलिए घर में ही कैद रहा।ज्यादा समय तो सोता ही रहा।

देर शाम दिल्ली से अचानक श्री युवराज माथुर जी का फोन आया!मन में कुछ खटका सा हुआ!मेरी आवाज सुनते ही उन्होंने कहा – भाई साहब मम्मी(श्रीमती मोहिनी माथुर) नहीं रहीं!

मेरे मुंह सिर्फ एक शब्द निकला – अरे..युवराज जी ने बताया कि अभी देर शाम मम्मी ने दुनियां छोड़ी है।हम कल सुबह उनका अंतिम संस्कार करेंगे!उन्होंने बताया कि मम्मी कुछ समय से बीमार चल रही थीं । हमें उम्मीद थी कि ठीक हो जाएंगी।लेकिन आज शाम अचानक चली गईं।

जानकारी देने के बाद युवराज जी ने फोन काट दिया।कुछ समय के लिए मैं जड़ हो गया। अप्रैल 1991 से लेकर 7 जनवरी 26 तक का पूरा काल खंड आंखों के आगे घूम गया।

आगे कुछ कहने से पहले मैं आपको मम्मी के बारे में बता दूं!श्रीमती मोहिनी माथुर नवभारत टाइम्स के पूर्व प्रधान संपादक स्वर्गीय राजेंद्र माथुर जी की पत्नी थीं।मेरा उनसे परिचय नवभारत टाइम्स या माथुर सर की वजह से नहीं हुआ था। नियति ने मुझे उनसे एक बड़ी त्रासदी के चलते मिलाया था।

दरअसल अप्रैल 1991 के पहले पखवाड़े में राजेंद्र माथुर साहब के असामयिक और आकस्मिक निधन ने मुझे माथुर परिवार की देहरी तक पहुंचाया था।उस दिन दोपहर में अचानक यह खबर आई थी कि माथुर साहब नहीं रहे!पूरा टाइम्स हाउस सन्न रह गया था।हिंदी पत्रकारिता जगत के लिए यह खबर एक स्थाई दंश की तरह थी।

उस समय जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है।मेरे मन में वह घटनाक्रम आज भी ताजा सा है।

उस दिन बड़े भाई और नवभारत टाइम्स के तत्कालीन कार्यकारी सम्पादक स्वर्गीय सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने मुझे बुलाकर माथुर साहब के घर जाने को कहा साथ ही मुझे कुछ काम सौंपे!

इस तरह मैं पूर्वी दिल्ली के स्वास्थ्य विहार में रहने वाले माथुर परिवार की देहरी चढ़ा।जो काम बड़े भाई ने सौंपा था,वह किया। फिर पता ही नहीं चला कि मैं कब माथुर परिवार का हिस्सा बन गया।

मुझे तीन छोटी बहने ऋतु, मेहा और पुरु मिलीं।इस दौरान वे उन तीनों के साथ कब मेरी भी “मम्मी” बन गईं,पता ही नहीं चला।

मम्मी और बहनों के साथ मुझे एक बड़ा परिवार भी मिला। मामा – मामी,चाचा – चाची,मौसी व नानी…

सबसे रिश्ता जुड़ा और आज तक कायम है।

इस बीच तीनों बहनों की शादियां हुईं।तीन प्यारे बहनोई मिले।उनके परिवारों से रिश्ता बना।युवराज जी इनमें सबसे वरिष्ठ हैं।

बी 4 / 624 एकता गार्डेंस का पता भी जिंदगी में आया।दिल्ली में दूसरी पारी के दौरान ,कुछ साल के लिए यह मेरा भी स्थाई पता रहा।अब भी है।

अब नहीं हैं तो बस मम्मी!उनकी आवाज हमेशा कानों में गूंजेगी!इस बात का दुख आजीवन रहेगा कि मैं उनके महाप्रयाण से पहले उनके दर्शन नहीं कर पाया।

मुझे जन्म देने वाली मां तो मई 2012 में दुनियां से गई थीं।सच कहूं तो मुझे तब ऐसा नहीं लगा था जैसा आज लग रहा था।तब मेरे मन में ख्याल आया था ,कोई बात नहीं,जिया (मां ) गईं तो क्या मम्मी तो हैं।ऐसा ही कुछ मम्मी ने भी सिर पर हाथ रख के कहा था।वही रिश्ता आज तक रहा।आज लग रहा है कि जिया के बाद मम्मी भी…कुछ टूट सा गया है।

मम्मी चली गईं…उनके रहते उनसे मैं कभी नहीं कह पाया कि मम्मी आप बहुत हिम्मती हो।बहुत मजबूत हो!उनकी मजबूती,स्वाभिमान और हिम्मत को मैंने बहुत ही करीब से महसूस किया था।

सच में वह आयरन लेडी – लौह महिला थीं!

मम्मी आपको सलाम!

▪️श्रद्धांजलि▪️

मां के समान स्नेह, संबल और आत्मबल देने वाली श्रीमती मोहिनी माथुर को विनम्र श्रद्धांजलि। उनका जीवन, उनका साहस और उनका मातृत्व स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगा।

श्रद्धांजलि — मीडिया वाला की ओर से