
MP Politics: क्या यूपी का राजनीतिक परिदृश्य मध्य प्रदेश में दिखने लगा है?
रंजन श्रीवास्तव की विशेष राजनीतिक रिपोर्ट
छह वर्ष पूर्व 2020 में तत्कालीन कमल नाथ सरकार के गिरने के बाद जब भाजपा सरकार बना रही थी तो मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भाजपा के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा का नाम प्रमुख नेताओं में शामिल था.
कारण यह है कि नरोत्तम मिश्रा ने कमल नाथ सरकार को गिराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी. पर ऐसा नहीं कि नरोत्तम मिश्रा अकेले उस पटकथा में शामिल रहे हों. वर्तमान में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया विधायकों और मंत्रियों के एक समूह को लेकर भाजपा में शामिल हुए थे. उसी कारण से तत्कालीन कांग्रेस सरकार गिरी थी अतः उनका नाम भी संभावित दावेदारों में था. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दावा तो मुख्यमंत्री पद पर था ही. ऐसे में एक और नाम राजनीतिक गलियारों में चल रहा था. वह था विधान सभा में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का.
भार्गव को और उनके अनुयायियों को आशा थी कि ना सिर्फ भाजपा के अंदर बल्कि विधानसभा में भी सबसे वरिष्ठ विधायक होने तथा तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उन्हें ही यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी. पर अंततः, चौहान की ताजपोशी एक बार फिर मुख्यमंत्री पद पर की गई.
वर्ष 2023 में भाजपा द्वारा प्रचंड बहुमत के बाद जब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने चौहान के नाम पर पुनः विचार न करने का निश्चय किया तब भी भार्गव एक बार फिर निराशा हाथ लगी.
भाजपा नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में 2003 के चुनाव के बाद से ओबीसी लीडर को मुख्यमंत्री बनाने की परिपाटी पर चलते हुए डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने का निश्चय किया. वर्ष 2003 में उमा भारती, 2004 में बाबूलाल गौर तथा 2005 में शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया. वर्ष 2023 में भार्गव को मुख्यमंत्री बनाना तो दूर रहा उन्हें कैबिनेट में मंत्री पद भी नहीं दिया गया.
पर क्या गोपाल भार्गव का हालिया बयान सिर्फ उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए या उस राजनीतिक परिस्थिति में देखा जाना चाहिए जो उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कथित अपमान, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री द्वारा इस्तीफा तथा शिक्षण संस्थानों में यूजीसी के नए रेगुलेशन को लागू करने के बाद उत्पन्न हुई हैं. यूजीसी के नए रेगुलेशन को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया है पर गोपाल भार्गव के ताजा बयान से लगता है कि यहां सवर्ण बनाम ओबीसी का मुद्दा आने वाले समय में ठंडा होता नहीं दिख रहा है.
पर अगर यह मुद्दा भाजपा के अंदर कोई लाइन खींचता है तो पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का कारण हो सकता है.
एक वायरल वीडियो में गोपाल भार्गव यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि “तमाम संगठनों का एक ही लक्ष्य है – ब्राह्मणों को मारो, दबाओ, इनसे बदला ले लो…सारे नियम-कानून ब्राह्मणों के खिलाफ बन रहे हैं..एकता में शक्ति है, अगर हम साथ खड़े होंगे तो कोई दबा नहीं सकता.” इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही प्रदेश में जातीय बहस तेज हो गई है विशेषकर भाजपा के अंदर.
वैसे ब्राह्मण समुदाय राज्य की आबादी का लगभग 7-8% है, लेकिन बुंदेलखंड, महाकौशल और मालवा क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक और सामाजिक पकड़ मजबूत है.
भाजपा की कोशिश रही है कि वह जातीय संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ती रहे. यही कारण है कि पिछले चुनावों के बाद भाजपा ने राजस्थान में ब्राह्मण मुख्यमंत्री दिया भजनलाल शर्मा के रूप में जबकि राजपूत समुदाय से महंत योगी आदित्यनाथ पहले से ही उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. जातीय संतुलन की इस कड़ी में छत्तीसगढ़ में ट्राइबल लीडर को मुख्यमंत्री बनाया गया जबकि मध्य प्रदेश में ही ब्राह्मण समुदाय से राजेंद्र शुक्ला तथा अनुसूचित जाति से जगदीश देवड़ा को ओबीसी लीडर और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का उप मुख्यमंत्री बनाकर प्रदेश के अंदर जातीय संतुलन बनाने की कोशिश की गई.पर जिस तरह प्रयागराज में माघ मेला के दौरान पुलिस ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वेदपाठी शिष्यों को उनके चोटियों से पकड़कर खींचा तथा उनकी पिटाई की उससे ब्राह्मण समुदाय काफी उद्वेलित हो गया. इसके पहले कि यह मामला ब्राह्मण बनाम राजपूत बनता उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए लाए गए नए यूजीसी रेगुलेशनों ने अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार कर दी क्योंकि इस रेगुलेशन से ऐसा मैसेज गया कि अगड़ी जाति के छात्र ही अन्य छात्रों को प्रताड़ित करते हैं.
पिछले वर्ष मध्य प्रदेश में नवंबर में आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा (अजाक्स प्रमुख) के विवादास्पद बयान कि “आरक्षण तब तक एक व्यक्ति को मिले जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी मेरे बेटे को न दे” – ने पहले से ही ब्राह्मण समुदाय को आक्रोशित किया हुआ है.
भार्गव ने वर्मा को “चरित्रहीन” और “मानसिक रूप से बीमार” बताया था और मांग की थी कि वर्मा की आईएएस सेवा से बाहर किया जाए.
भाजपा के अंदर भले ही गोपाल भार्गव का बयान उनकी निराशा से उपजी अभिव्यक्ति मानी जाए पर वर्तमान परिस्थितियों में उनका बयान पूरे ब्राह्मण समुदाय को उद्वेलित कर सकती है विशेषकर तब जबकि जबकि भाजपा सरकार के केंद्र में तथा उत्तर प्रदेश/ मध्य प्रदेश में उसकी सरकारों के होते हुए यह सब घटनाएं हो रही हैं. भाजपा अगड़ी जातियों के वोटों पर आंख मूंदकर भरोसा करती रही है.
देखना है वर्तमान राजनीतिक स्थिति आगे क्या रूप लेती है. ज्ञातव्य है कि 2018 में मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनावों में भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का वह बयान था कि ‘जब तक मैं जिंदा हूं कोई माई का लाल आरक्षण छीन नहीं सकता’.





