Mythological Female Characters: इंदौर लेखिका संघ द्वारा ‘भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं ‘विषय पर परिसंवाद ,आज कैकयी पर चर्चा

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Mythological Female Characters: इंदौर लेखिका संघ द्वारा ‘भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं ‘विषय पर परिसंवाद 

परिसंवाद : इंदौर लेखिका संघ द्वारा ‘भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं ‘विषय पर परिसंवाद  आयोजित किया गया .इस रौचक विषय पर सदस्यों ने उत्साह पूर्वक भाग लेकर भारतीय पौराणिक कथाओं में उल्लेखित विभीन्न  महिलाएं पात्रीं पर अपनी कलम चलाते हुए उनके व्यक्तित्व और उनके कार्यों पर प्रकाश डाला .हम इस परिसंवाद के शृंखला के रूप में यहाँ प्रकाशित करने जा रहे हैं ,प्रतिदिन एक  पात्र यहाँ प्रकाशित किये जायंगे –

सभी हिंदू धर्मग्रंथ स्त्री को ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का अवतार बताते हैं  स्त्री ईश्वर के उस स्त्रीत्व स्वरूप को प्रतिबिंबित करती है जिससे उन्होंने इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की है, और ईश्वर ने ही स्त्री में प्रेम, सद्गुण, सामर्थ्य, सौंदर्य और त्याग जैसे दिव्य गुण समाहित किए हैं।हिंदू धर्मग्रंथों, पौराणिक कथाओं या मिथकों के अनुसार, वैदिक काल महिलाओं के लिए समृद्ध युग था। गार्गी और मैत्रेयी जैसी महान महिलाएँ थीं। महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता था और परिवार ‘मातृ-सतत्त्व वाले’ (महिला प्रधान परिवार) होते थे। महिलाओं को सुंदर, बलवान, रचनात्मक और कामुक प्राणी के रूप में सम्मानित किया जाता था।

भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं केवल पात्र नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं. गार्गी और मैत्रेयी जैसे विदुषी शास्त्रार्थ में ऋषियों को हराती थीं, तो सीता और द्रौपदी ने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस और दृढ़ता का परिचय दिया। सावित्री ने मृत्यु से अपने पति को वापस लौटाया, जो अटूट प्रेम और संकल्प का प्रतीक है।

आज से हम इस परिसंवाद में रेखांकित एक पात्र पर चर्चा करेंगे —–

1.कैकयी रामायण का एक उपेक्षित पात्र है 

  निर्मला मुंदडा

कैकेई , केकेय देश के राजा अश्वपति और शुभलक्षणा की कन्या एवं कोसलनरेश दशरथ की कनिष्ठ किंतु अत्यंत प्रिय पत्नी का नाम है। इसके गर्भ से भरत का जन्म हुआ था। जब राजा दशरथ देवदानव युद्ध में देवताओं के सहायतार्थ गए थे तब कैकेई भी उनके साथ गई थी। युद्ध में दशरथ के रथ का धुरा टूट गया उस समय कैकेई ने धुरे में अपना हाथ लगाकर रथ को टूटने से बचाया और दशरथ युद्ध करते रहे। युद्ध समाप्त होने पर जब दशरथ को इस बात का पता लगा, तो प्रसन्न होकर कैकेई को दो वर माँगने के लिए कहा। कैकेयी ने उसे यथासमय माँगने के लिए रख छोड़ा। जब राम को युवराज बनाने की चर्चा उठी तब मंथरा नाम की दासी के बहकावे मे आकर कैकेई ने दशरथ से अपने उन दो वरों के रूप में राम के लिए १४ वर्ष का वनवास और भरत के लिए राज्य की माँग की। कैकेई के वरदान माँगने से श्री राम की मृत्यु टली,क्योंकि वह जानती थी कि राजा दशरथ की मृत्यु पुत्र विलाप में होगी और उसके सिर्फ़ दो ही तरीके है या तो राम जी की मृत्यु या उनका वनवास। तदनुसार राम वन को गए पर भरत ने राज्य ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, माता की भर्त्सना की और राम को लौटा लाने के लिए वन गए। उस समय कैकेई भी उनके साथ गई।-सम्पादक

Kaikeyi Blog

यदि कैकयी नहीं होती तो राम ना तो असुरों को मार सकते थे ,ना ही पुल बना सकते थे

कैकयी रामायण का एक उपेक्षित पात्र है । सबके मन में उसके लिए एक उपेक्षा का भाव है । कारण यह कि उसने राम वनवास दिया ।जबकि रामायण को महाकाव्य बनाने वाली सिर्फ और सिर्फ कैकयी थी।
यदि कैकयी नहीं होती तो रामायण महाकाव्य नहीं बन पाता। कैकयी सबसे ज्यादा राम को प्यार करती थी।राम राज्य का सुनकर सबसे ज्यादा प्रसन्न वही थी।उसके वनवास देने के पीछे कारण था ।जिस सुबह राम का अभिषेक होना था,
उस रात स्वर्ग के सारे देवता कैकई के पास आए थे।
महारानी आपके होते यह अनर्थ कैसे हो रहा है ?
यदि राम को राज्य दे दिया तो राम का जन्म का कोई औचित्य ही नहीं रहेगा ।
क्योंकि राम का जन्म राज्य करने के लिए नहीं हुआ है।
उनका जन्म तो असुरों का नाश करने के लिए हुआ है।यदि राम राज्य करेंगे तो यह सब कौन करेगा !!
इसके लिए आपको बुराई झेलना पड़ेगी। राम को वनवास दिलवाना पड़ेगा । तभी राम का जन्म सार्थक होगा।
क्या मैं राम को वनवास दिलवाऊं ?यह संभव नहीं है ;
राम मेरे जिगर का टुकड़ा है ।
यह अनर्थ मुझसे नहीं हो पाएगा।
तभी अचानक वहां राम भी आ गए । माता मेरे लिए आपको यह अनर्थ करना ही होगा।आपके अलावा इतना दुष्कर कार्य और कोई नहीं कर सकता
है । जितनी वीरता और हिम्मत आपके पास है ,दूसरे किसी के पास नहीं।
आप पिताजी के साथ युद्ध लड़ सकती है ।पिताजी के रथ का पहिया टूट गया ,उसमें अपनी उंगली लगाकर दर्द सदन कर सकती हैं तो मुझे वनवास देना कठिन बात नहीं है ।मैं जानता हूं इसके लिए आपको युगों युगों तक बदनामी का दंश झेलना पड़ेगा !और इसके लिए आपको हो सकता है ,और भी बलिदान देना पड़े ।
लोग आपको गालियां भी देंगे और कहेंगे,कैकयी अच्छी मां सिद्ध नहीं हो पाई ।परंतु अपने राम के लिए आपको जहर का घूंट पीना ही पड़ेगा ।
मां आपको मेरे लिए यह करना ही पड़ेगा ।
राम ने रोते-रोते माता के चरण पकड़ लिए । सिर्फ और सिर्फ में आपसे यही मांगता हूं ,और मां आपको मुझे वचन देना ही पड़ेगा ।
कैकई ने कहा पुत्र यह क्या मांग रहे हो?यह मेरे लिए असंभव है !
वोनहीं मां आपको मेरी सौगंध,आपको मेरे लिए यह करना ही होगा ।नहीं तो राक्षसों का विनाश कैसे होगा!!आपके अलावा दूसरा कोई नहीं है ,
जो यह दुष्कर कार्य कर सके
और बदनामी झेल सके।
रोते-रोते कैकई ने राम को और देवताओं को हां कहा।
इसके बाद की जो घटना घटित हुई वह हम सभी जानते हैं।वाकई में कैकई का चरित्र बहुत ही महान है यदि कैकयी नहीं होती तो राम रावण का वध नहीं कर पाते ।
और हम सभी जानते हैं,
राम की मां कौशल्या होने के बाद भी वे सबसे ज्यादा कैकयी को प्यार करते थे ।
जब राम भरत मिलन हुआ तब सर्वप्रथम उन्होंने कैकई के चरण स्पर्श किए ।वनवास से जब लौटे तब भी उन्होंने कैकई को ही याद किया।
राम का चरित्र निर्माण करने में कैकयी सर्वश्रेष्ठ भूमिका है। कैकयी यह जानती थी की राम को वनवास देने से मेरे सुहाग पर भी आंच आ सकती है। परंतु उसने फिर भी यह कठिन निर्णय लिया।
रामायण का सबसे महत्वपूर्ण पात्र हैं कैकयी, मेरी नजरों में कैकई को सम्मान मिलना चाहिए ।क्योंकि यदि कैकयी नहीं होती तो राम ना तो असुरों को मार सकते थे ,ना ही पुल बना सकते थे ।अतः यह सब कैकई के सहयोग के कारण ही हुआ ।
रामायण के एक-एक व्यक्ति की भूमिका सराहनीय है। सीता यदि राम के साथ थी,तो उर्मिला 14 सालों तक पति की प्रतीक्षा आरती की थाली लेकर करती रही ।
क्या यह तपस्या नहीं थी!!
इसी प्रकार मांडवी और श्रुति कीर्ति भी अपनी अपनी जगह पति की प्रतीक्षा करती रही।
क्योंकि उन दोनों के पति भी राम की तपस्या में लीन थे।
और माता के तो 14 वर्षों तक आंसू ही नहीं सुखे ,यह किसी तपस्या से कम नहीं । रामायण का एक-एक पात्र  सराहनीय है ।
सबसे बड़ा त्याग कैकयी का है। जिसने पति भी खोया और अपने पुत्र को भी खोया । भरत जैसे पुत्र ने मां से बात नहीं करने की कसम खाई थी ।सिर्फ राम के कहने पर ही उन्होंने अपनी मां को माफ किया था ।
यह कैकयी का विलक्षण चरित्र था ,जो इतने अपमान के बाद भी सब कुछ सहन करती रही । हम आज भी कैकई का नाम बुराई के साथ ही लेते हैं।
परंतु यदि कैकयी नहीं होती तो रामायण ही नहीं हो पाती ।
यह कैकयी का सबसे उच्च चरित्र है ।

निर्मला मुंदडा,सदस्य इंदौर लेखिका संघ 

2. माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं

       आशा शर्मा 

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माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं।उन्हें राजनीति का भी सम्यक ज्ञान था।
इसीलिए वे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की सारथी बनकर उनके साथ रहीं।जब महाराज दशरथ घायल हो गए, तो कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थी।एक युद्ध में रावण ने जब उनके रुप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कहा कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य दे गा।

समय बीतता गया जब भगवान राम का अवतार हुआ कैकयी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। वे जानती थी कि यह नारायण हैं। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम वे राम से करती थी। जब रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो वे माता कैकेई से बोले मां आप मुझसे कितना प्रेम करती हैं। मैं कुछ मांगूं तो मना तो नहीं करोगी। मां ने कहा राम तुम मेरे प्राण भी मांगों तो मैं सहर्ष स्वीकार कर लूंगी। मेरा राम मूझसे मांगे तो सही।
भगवान राम ने कहा मां मैं उससे भी अधिक मांगूं तो,उसे से आपका संसार में अपयश होगा, हो सकता है आपको वैधव्य सहना पड़े,भरत के कटु वचन सहना पड़े और भी तिरस्कार सहना पड़े, क्या फिर भी आप मेरी मांग पूरी करेंगी।कैकेई सब जानती थी कि रावण का वध राम ही के हाथों होगा, यदि राजा बन गये तो मेरा वचन मिथ्या होजाएगा।वे मुस्कुराते हुए बोली राम मुझे तुम्हारे लिए सब स्वीकार है,तूम मांगों तो सही। भगवान राम जानते थे कि मां को बहुत दुःख होगा इसलिए पहले मां सरस्वती से मन-ही-मन प्रार्थना की हे मां आप माता की जिव्हा पर विराजमान हो कर मेरा कार्य कीजिए। वे मेरे लिए वनवास और भरत के लिए राज्यमांग लें,तभी मेरे जन्म का उद्देश्य और माता कि वचन पूरा हो सकेगा।

फिर मां शारदा ने बहुत विचार किया कैकयी से यह करवाया जाना कठिन है।तब उन्होंने मंथरा की सहायता से कैकेई की बुद्धि पर ताला लगा दिया और कैकयी ने दो वरदान जो देवासुर संग्राम में राजा दशरथ ने उन्हें दिए थे मांग लिए।भरत को राज्य और राम को चौदह वर्ष का वनवास,इस प्रकार कैकयी ने भगवान राम की लीला में सहयोग किया है।वे आदरणीय हैं। वे लोग जो उन्हें दोषी कहते हैं नादान हैं।इतना बड़ा त्याग तो तपस्या से भी बढ़कर है।यही उनके आदर्श जीवन का सत्य है।इसीलिए कैकेई केबाद दूसरी कोई कैकेई हो ही नहीं सकती थी।सत्य वचन है रामायण में वर्णित है।
संकलन कर्ता —
आशा शर्मा 
 इंदौर एवं लेखिका संघ इंदौर मध्यप्रदेश