बाइपोलर डिसऑर्डर: एक ऐसी बीमारी, जो बन सकती है आत्महत्या की वजह

बाइपोलर डिसऑर्डर: एक ऐसी बीमारी, जो बन सकती है आत्महत्या की वजह

मीडियावाला.इन।

अनिल( बदला हुआ नाम) जब तकरीबन 11-12 साल के रहे होंगे तो उन्हें इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी मां पर हाथ उठा दिया। अनिल का ये बर्ताव उनकी मां ने पहली बार नहीं देखा था। वो पहले भी गुस्से में आकर चीजें फेंक देते थे, छोटे भाई को धक्का देना या थप्पड़ मारना भी होता था। कभी इतने हिंसक हो जाते थे कि कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता था। स्कूल से भी दूसरे दोस्तों के साथ झगड़े और मारपीट की शिकायत आती थी। वहीं कभी उनके मूड का दूसरा रूप भी देखने को मिलता था, जब वो एकदम शांत हो जाते थे, किसी भी बात का जवाब ही नहीं देते थे। कई बार बिना किसी कारण के रोने लग जाते थे और खुद को कमरे में बंद कर लेते थे।  

पहले तो मां ने बच्चा समझ कर इस बर्ताव को नजरअंदाज किया, फिर लगा कि इस उम्र में हार्मोन में बदलाव होना शायद इसकी वजह है। लेकिन धीरे-धीरे मां को ये अंदाजा तो होने लगा था कि अनिल का बर्ताव कुछ अलग है। उनके मूड के उतार-चढ़ाव में उन्हें एक पैटर्न दिखने लगा था और ऐसा अब बार-बार हो रहा था। जिस दिन अनिल ने उन पर हाथ उठाया तो वो समझ गई अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। वो डरने लगी थीं कि कहीं आवेश में आकर उनका बेटा खुद को ही नुकसान न पहुंचा ले। वे घबराने लगीं और उन्होंने डॉक्टरी सलाह लेने की सोची। मनोचिकित्सक डॉक्टर मनीषा सिंघल से बात करने पर मां को पता चला कि उनके बेटे को बाइपोलर डिसऑर्डर है। 

क्या है बाइपोलर डिसऑर्डर?

डॉक्टरों के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर एक तरह का मानसिक विकार होता है जो डोपामाइन हार्मोन में असंतुलन होने के कारण होता है। इस असंतुलन की वजह से एक व्यक्ति के मूड या बर्ताव में बदलाव आने लगते हैं। अगर कोई व्यक्ति बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित होता है तो उसे मेनिया या डिप्रेशन के दौरे पड़ते हैं यानी उसका मूड या तो बहुत हाई या लो रहता है। 

बाइपोलर वन में मेनिया यानी तेजी के दौरे आते हैं। इस डिसऑर्डर में व्यक्ति बड़ी-बड़ी बातें करता है, लगातार काम करता है, उसे नींद की न के बराबर जरूरत महसूस होती और उसके बावजूद वो चुस्त-दुरुस्त रहता है। इस डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति जरूरत से ज्यादा खर्च करता है और कोई भी फैसला बिना सोचे समझे ले लेता है। उसका मन एक जगह पर स्थिर नहीं रहता है। 

मनोचिकित्सक डॉक्टर पूजाशिवम जेटली इसी डिसऑर्डर से पीड़ित एक मरीज का जिक्र करते हुए बताती हैं कि वो व्यक्ति कारोबारी परिवार से थे और उन्होंने बिजनेस में कई अतार्किक फैसले लेने शुरू कर दिए थे। वो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगे थे और बहुत खर्चीले हो गए थे। उन्हें नींद आनी बंद हो गई थी और खुद को सबसे ताकतवर समझने लगे थे। इन सबके साथ ही उनकी 'सेक्स ड्राइव' भी बढ़ गई थी। जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया तो वहां भी वो लोगों को नौकरी देने और अपनी संपत्ति उनके नाम करने जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते थे। वो बताती हैं कि ऐसे लोगों का वास्तविकता से नाता बिल्कुल टूट जाता है। ऐसे में अगर ऐसे लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा रहते हैं तो उसे 'मेनिया' या तेजी का दौरा कहा जाता है। 

टाइप टू बाइपोलर(हाइपोमेनिया) - इसमें उदासी के दौरे आते है। इस डिसऑर्डर में मन उदास रहता है और बिना किसी कारण के रोते रहने का मन करने, किसी काम में बिल्कुल मन नहीं लगने, नींद न आने के बावजूद बिस्तर पर पड़े रहने का मन करने, नींद बहुत कम या ज्यादा आना जैसे लक्षण होते हैं। इससे पीड़ित मरीज ऊर्जा में कमी महसूस करता है। इस डिसऑर्डर से प्रभावित लोग मिलना-जुलना बंद कर देते हैं। 

कब सचेत हो जाना चाहिए?

हालांकि आम जीवन में आप और हम इसी तरह के भाव से अक्सर गुजरते होंगे, लेकिन इससे आप और हम दो या तीन दिन में उबर जाते हैं लेकिन अगर ऐसी स्थिति दो हफ्ते तक बनी रहती है तो ये हाइपोमेनिया में बदल सकता है। डॉक्टर मनीषा सिंघल के अनुसार, इनमें से अगर किसी भी लक्षण का दौरा एक बार पड़ता है तो समझ आ जाता है कि वो व्यक्ति बाइपोलर डिसऑर्डर का शिकार है। 

डॉक्टरों के अनुसार, बाइपोलर किसी भी उम्र के व्यक्ति में हो सकता है, लेकिन इस डिसऑर्डर के औसतन 20-30 की उम्र में ज्यादा मामले सामने आते हैं। हालांकि आजकल यह भी देखा जा रहा है कि अब 20 से कम उम्र में या 'अर्ली बाइपोलर डिसऑर्डर' के मामले भी सामने आ रहे हैं। 

दिल्ली स्थित सेंट स्टीफन अस्पताल में मनोचिकित्सक डॉक्टर रूपाली शिवलकर कहती है, 'हालांकि ये बीमारी बहुत पुरानी है, लेकिन अब इस बीमारी की सही पहचान होने लगी है। लोग इस बारे में जागरूक हुए हैं और इसलिए ये बीमारी सामने भी आने लगी है। आज के समय में ये बीमारी बहुत आम हो चली है और 100 में से तीन या पांच प्रतिशत लोगों में ये डिसऑर्डर है।'

वो बताती हैं कि अगर किसी व्यक्ति में 40 साल की उम्र के बाद पहली बार ऐसा डिसऑर्डर दिखाई देता है तो कई बार उसका सीधा संबंध मष्तिष्क में बदलाव से हो सकता है जिसे 'ऑर्गेनिक मूड डिसऑर्डर' कहा जाता है। इसमें देखा जाता है कि कहीं मष्तिष्क की संरचना में बदलाव या कोई खराबी तो नहीं आ गई है। 

बाइपोलर और आत्महत्या का ख्याल

बच्चे जब किशोरावस्था में पहुंच रहे होते हैं तो हॉर्मोन्स में हो रहे बदलाव की वजह से उनके मूड में भी बदलाव होने लगते हैं। जैसे, वो किसी भी बात पर चिढ़ जाते है, नाराज या गुस्सा हो जाते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रहती। ऐसे मामले 'सायक्लोथायमिक डिसऑर्डर' में आते हैं, जहां किसी भी तरह का भाव चाहे वो गुस्सा हो या उदासी, वो माइल्ड (कम) होता है। ऐसा आमतौर पर किशोरावस्था में देखा जाता है और इसे नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन अगर किसी बच्चे में बाइपोलर डिसऑर्डर होता है तो वो 'क्लासिकल मेनिया' या डिप्रेशन के तौर पर आता है। 

इसमें लंबे समय तक उदासी, बहुत गुस्सा होना, आक्रामकता, नींद की जरूरत महसूस न होना, जरूरत से ज्यादा बातें या खर्च करना और सेक्शुअल कॉन्टेन्ट से सामान्य से ज्यादा आकर्षित होना शामिल है। अगर ऐसे लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा समय तक चलते हैं तो बाइपोलर की आशंका हो सकती है। 

हाल ही में बॉलीवुड के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी की खबर के बाद मीडिया में ऐसी भी चर्चाएं तेज हो गईं थीं कि वो बाइपोलर डिसऑर्डर से जूझ रहे थे। मनोचिकित्सक डॉक्टर पूजाशिवम जेटली का कहना है, 'मेनिया या उदासी के एपिसोड में आत्महत्या करने की कोशिश की आशंका रहती है, क्योंकि दोनों ही स्थिति में व्यक्ति का वास्तविकता से नाता छूट जाता है। मेनिया में मरीज को लगता है वो जो चाहे कर सकते हैं, उसके सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो जाती है। ऐसे में मरीज ऐसे एक्स्ट्रीम कदम उठा सकता है। वहीं बाइपोलर डिप्रेशन में आत्महत्या की आशंका सबसे ज्यादा होती है और अगर ऐसा व्यक्ति कभी आत्महत्या या नाउम्मीदी की बात करता है तो ये एक 'रेड सिग्नल' हो सकता है और उसका तुरंत इलाज कराया जाना चाहिए।' 

बीमारी को नियंत्रित करना मुमकिन है

डॉक्टर रूपाली शिवलकर भी मानती हैं कि जब भी बाइपोलर डिसऑर्डर का कोई मरीज आता है तो वो इस बात को लेकर विशेष तौर पर सजग रहते हैं कि कहीं उसमें आत्महत्या के विचार तो नहीं आ रहे हैं। वो बताती हैं कि बाइपोलर ताउम्र रहने वाली बीमारी है। थाइरॉइड, उच्च-रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और मानसिक बीमारियां... ये सब 'नॉन कम्युनिकेबल' डिजीज में गिनी जाती हैं। इन बीमारियों पर आप नियंत्रण पा सकते हैं और सामान्य जीवन जी सकते हैं, लेकिन इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। 

मनोचिकित्सक डॉक्टर मनीषा सिंघल का कहना है, 'ये दिमागी बीमारियां जेनेटिक (आनुवांशिक) भी होती है। अगर आपके परिवार में किसी को कभी किसी तरह का मानसिक रोग रहा हो तो आगे जाकर बच्चों में इसके लक्षण दिख सकते हैं। दिमागी बीमारियों में से बाइपोलर एक ऐसी बीमारी होती है, जिसमें जब मरीज की स्थिति कंट्रोल में आ जाती है तो वे सामान्य जीवन जीने लगता है। ऐसे में उसे, उसकी बीमारी के बारे में बताया जा सकता है ताकि आगे जब ये लगे कि उसकी स्थिति खराब हो रही है, उसके मूड में बदलाव हो रहे हो तो वो उसे समझ सके और डॉक्टर के पास आकर सलाह ले सकता है।' 

डॉक्टरों के अनुसार, इसके इलाज के लिए 'मूड स्टेबिलाइजर' या मष्तिष्क की झिल्ली (मेम्ब्रेन) में स्टेबिलाइजर का इस्तेमाल किया जाता है ताकि डोपमाइन की मात्रा को संतुलित किया जा सके और बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके। डॉक्टरों का कहना कि बाइपोलर डिसऑर्डर के मरीजों का किसी भी तरह के रचनात्मक काम में शामिल होना उनकी मदद कर सकता है। ऐसे मरीजों को ज्यादा देखभाल और प्यार की जरूरत होती है। मेनिया में कई बार लोग बहुत गलत फैसले ले लेते हैं, लेकिन जब वो सामान्य होने लगते हैं तो उन्हें अपनी गलती का अहसास और पछतावा होता है। ऐसे में उन्हें शांति और प्यार से समझाने की जरूरत होती है।वहीं इस बात का भी ध्यान देना होता है कि वे दिमाग को शांत रखें और उसे थकाएं नहीं। ऐसे मरीजों को लोगों से मिलने-जुलने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए।  

नोट: दवा और थेरेपी के जरिए मानसिक बीमारियों का इलाज संभव है। इसके लिए आपको किसी मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए। अगर आपमें या आपके किसी करीबी में किसी तरह की मानसिक तकलीफ के लक्षण हैं तो इन हेल्पलाइन नंबरों पर फोन करके मदद ली जा सकती है: 
सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय-1800-599-0019
इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज- 9868396824, 9868396841, 011-22574820
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज- 080 - 26995000
विद्यासागर इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड एलाइड साइंसेज, 24X7 हेल्पलाइन-011 2980 2980 

 

 

 

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