उज्जैन में लोक साहित्य और संस्कृति पर राष्ट्रीय मंथन :वेदों से लोक तक भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्रों पर गहन विमर्श, राजपुरोहित और सहगल सम्मानित

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उज्जैन में लोक साहित्य और संस्कृति पर राष्ट्रीय मंथन:
वेदों से लोक तक भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्रों पर गहन विमर्श, राजपुरोहित और सहगल सम्मानित

Ujjain: सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला में 20 फरवरी से चार दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वान, शोधकर्ता, साहित्यकार और लोक संस्कृति के अध्येता सहभागी हो रहे हैं। “लोक साहित्य और संस्कृति: अवधारणा, स्वरूप और विविध आयाम” विषय पर केंद्रित यह आयोजन पीएम उषा योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में भारतीय लोक परंपरा, भाषा, जनजातीय संस्कृति और ज्ञान विरासत के विविध आयामों पर गंभीर चिंतन हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी थे, जबकि अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने की। सारस्वत अतिथि के रूप में पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, लोक मनीषी डॉ. पूरन सहगल, कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. रामचंद्र ठाकुर, डॉ. शिव चौरसिया तथा प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा सहित अनेक विद्वान मंचासीन रहे। समारोह में पद्मश्री डॉ. राजपुरोहित और डॉ. सहगल को अंगवस्त्र, पगड़ी, साहित्य और पुष्पमालाओं से सम्मानित कर “लोक मनीषी सम्मान” से अलंकृत किया गया।

● वेदों और प्राचीन ग्रंथों में लोक तत्वों की उपस्थिति
मुख्य अतिथि आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि वेदों और प्राचीन ग्रंथों में लोक परंपराओं के अनेक तत्व समाहित हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान परंपरा का आधार भाषा है और भाषा की जड़ें लोक में होती हैं। यदि भावी पीढ़ी लोक में प्रचलित शब्दों, प्रतीकों और परंपराओं पर गहन शोध करे तो भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को समझना संभव होगा।

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● शास्त्र से लोक और लोक से जीवन तक शब्दों की यात्रा
पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने कहा कि वेदों और शास्त्रों से अनेक शब्द लोक में आते हैं और लोक उन्हें अपने अनुभवों के अनुरूप नया रूप देता है। उन्होंने कहा कि लोक परंपरा वास्तव में अतीत और वर्तमान के बीच जीवंत सेतु है।

● लोक एवं जनजातीय संस्कृति भारतीयता का प्राणाधार
कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि लोक और जनजातीय संस्कृति भारतीय संस्कृति की मूल आधारशिला है, जिसका विकास सहस्राब्दियों से विभिन्न समुदायों की अंतःक्रिया से हुआ है। भारत को यदि समग्र रूप में समझना हो तो लोक संस्कृति के दृष्टिकोण से देखना सबसे अधिक सार्थक है।
● बोलियां और लोक साहित्य का अविभाज्य संबंध
लोक मनीषी डॉ. पूरन सहगल ने कहा कि जहां तक मानव जीवन का विस्तार है, वहीं तक लोक का अस्तित्व है। उन्होंने बोलियों को लोक साहित्य का प्रमुख संवाहक बताते हुए उनके संरक्षण और संवर्धन पर बल दिया।
वरिष्ठ कवि डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि लोक संस्कृति ही प्राचीन परंपराओं का संरक्षण करती आई है। लोक जीवन से ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती है।

● कहावतों, परंपराओं और प्रतीकों में लोक ज्ञान
तकनीकी सत्र के अध्यक्ष डॉ. आर. सी. ठाकुर, महिदपुर ने कहा कि लोक परंपराओं में प्रचलित कहावतें जीवन के गहन अनुभवों से जन्मी होती हैं और वे समाज को व्यवहारिक शिक्षा देती हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन मुद्राओं में भी लोक संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं।

● प्रदर्शनी, लोकगीत और शोधपत्रों से सजी संगोष्ठी
कार्यक्रम का शुभारंभ वाग्देवी तथा पद्मश्री वि. श्री वाकणकर के चित्र पर पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। इस अवसर पर युवा चित्रकारों की “श्री विशाला” कला प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया गया। लोक गायिका मायारानी बधेका (थाईलैंड), कैलाश गहलोत, दयाराम सारोलिया (देवास) सहित कलाकारों ने लोकगीत प्रस्तुत किए और लोक परंपराओं पर अपने विचार रखे।
देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए शोधकर्ताओं- प्रीति शर्मा (दिल्ली), डॉ. नेत्रा रावणकर (महाराष्ट्र), अर्पिता सांखला (मेवाड़), पलाश चौधरी (वीरभूमि, पश्चिम बंगाल), रणधीर आठिया आदि ने अपने-अपने क्षेत्रों के लोक साहित्य पर शोधपत्र प्रस्तुत किए।

● बड़ी संख्या में विद्वानों और संस्कृति प्रेमियों की सहभागिता
कार्यक्रम में लोक संगीतज्ञ सुंदरलाल मालवीय, सतीश दवे, डॉ. मोहन बैरागी, संतोष सुपेकर, रामचंद्र गांगोलिया, डॉ. महेंद्र पंड्या, डॉ. लक्ष्मीनारायण सिंहरोड़िया, डॉ. महिमा मरमट, डॉ. विष्णुप्रसाद मीणा सहित अनेक शिक्षाविद्, कलाकार और लोक संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा और पूजा परमार ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा ने व्यक्त किया।
चार दिनों तक चलने वाली यह संगोष्ठी भारतीय लोक परंपराओं, भाषाई विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता पर गंभीर अकादमिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच बनकर उभर रही है, जहां अतीत की परंपराएं और वर्तमान का बौद्धिक चिंतन एक साथ प्रतिध्वनित हो रहे हैं।