फार्मा कंपनियों ने मचाई लूट: दवाई का MRP यानी 'मनमाफिक रिटेल प्राइस

फार्मा कंपनियों ने मचाई लूट: दवाई का MRP यानी 'मनमाफिक रिटेल प्राइस

मीडियावाला.इन।

अब फिक्र कोरोना की. लेकिन पहले आपको एक दुखद ख़बर बता दें कि देश में वैक्सीन बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी, जो इस वक्त कोरोना वैक्सीन को लेकर मशहूर है उसके पुणे प्लांट में आज आग लगने से पांच लोगों की मौत हो गई. बताया जाता है कि आग अचानक, इस प्लांट के गेट नंबर एक के पास लगी. देखते ही देखते आग ने बिल्डिंग के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे सीरम इंस्टीट्यूट की इस बिल्डिंग के आख़िरी फ़्लोर पर फंसे पांच लोगों की मौत हो गई. बाकी लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया. इस फ्लोर पर कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था. थोड़ी राहत की ख़बर ये है कि जहां आग लगी वहां वैक्सीन से जुड़ी कोई चीज़ नहीं रखी थी.

अब बात कोरोना से जंग की जिसमें दिन-ब-दिन हिंदुस्तान मजबूत होता जा रहा है और वायरस कमजोर होता दिख रहा है. देश में आज कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीनेशन का छठा दिन था. स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक अब तक देश भर में 9 लाख 99 हज़ार से ज्यादा लोगों को कोरोना वैक्सीन दी जा चुकी है.

तो दूसरी ओर जिस तरह मजबूती से पिछले 1 साल से हिंदुस्तान कोरोना से लड़ रहा है, उसका नतीजा है कि 7 महीने बाद कोरोना के एक्टिव मामले 2 लाख के नीचे पहुंच गए हैं और देश में 8 महीने बाद कोरोना संक्रमण की वजह से 1 दिन में होने वाली मौत का आंकड़ा भी पिछले 3 दिन से 150 के करीब ही आ रहा है.

एक ओर कोरोना वायरस (Corona Virus) पर वैक्सीन का प्रहार जारी है. लगातार बरती जा रही सावधानियों और तैयारियों का नतीजा है कि वायरस के अंत का आगाज हो चुका है और वो दिन दूर नहीं, जब हालात नॉर्मल हो जाएंगे. लेकिन कोरोना वायरस की चपेट में आए लोगों के इलाज में हुए खर्च से उन लोगों और उनके परिवारों की जो आर्थिक सेहत बिगड़ी है, वो नॉर्मल होने में शायद बहुत वक्त लग जाएगा और जब तक सबको वैक्सीन नहीं लग जाती है, तब तक ना जाने कितने लोग आर्थिक तंगी के शिकार हो जाएंगे.

क्योंकि एक विश्लेषण के मुताबिक 80 फीसदी से ज्यादा परिवार किसी एक सदस्य के कोरोना संक्रमित होने के बाद उसके इलाज पर होने वाले खर्च से आर्थिक तंगी का सामना कर सकते हैं. भले ही राज्यों में इलाज के खर्च की एक सीमा तय कर दी गई हो, लेकिन उसके बाद भी 10 दिन के इलाज का बिल उनके मासिक खर्च से कई गुना ज्यादा है.

इस चिंता को इन दिनों बढ़ा दिया है सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक दवा की तस्वीरों और उसमें छपी कीमतों ने ये वो तस्वीर हैं, जिसमें एक दवा के दो पत्ते दिख रहे हैं. ये कोरोना के दौरान दी जाने वाली दवा है. फोटो में आइवरमेक्टिन टैबलेट के दो पत्ते रखे हुए हैं.

एक की मैन्यूफैक्चरिंग डेट सितंबर 2020 है और दूसरे की अक्टूबर 2020. पहले की MRP 195 रुपये है और दूसरे की 350 रुपये. यानी करीब-करीब 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

सोशल मीडिया यूजर्स इस तस्वीर को शेयर करते हुए कोरोना काल में भी जारी लूट के लिए फार्मा कंपनियों, सरकार और सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दवा के दाम तय करने का सरकारी सिस्टम क्या है. कैसे उसकी MRP तय होती है, और कैसे चंद पैसों में बनने वाली एक गोली कई गुना ज्यादा दाम में बिककर आपकी और हमारी जेब पर किसी गोले की तरह गिरती है.

इलाज के कारण लोग गरीबी रेखा से जा रहे नीचे

भारत में दवा मरीजों का इलाज भी करती है और उन्हें मर्ज भी देती है. महंगी दवाएं खाकर भले ही मरीज ठीक हो जाए, लेकिन उसकी और उसके परिवार की आर्थिक सेहत बुरी तरह बिगड़ जाती है. इलाज और दवा पर होने वाले खर्च की वजह से देश में हर साल 3 करोड़ 8 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं. ये दर्द लोगों को उन गोलियों से मिलता है, जो एक ओर उनकी बीमारी दूर करने के काम आती हैं. लेकिन दूसरी ओर जेब पर गोले की तरह गिरकर उन्हें आर्थिक तौर पर बीमार बना देती है और कोरोना काल में भी ये बदस्तूर जारी है.

सोशल मीडिया पर वायरल आइवरमेक्टिन 12 MG टैबलेट के पत्ते की तस्वीरों के मुताबिक सितंबर 2020 मैन्यूफैक्चरिंग डेट वाली एक गोली की कीमत 19 रुपये 50 पैसे बैठती है. जो अक्टूबर 2020 की मैन्युफैक्चरिंग डेट वाले पैक में बढ़कर 35 रुपये प्रति गोली हो जाती है. लेकिन आप चौंक जाएंगे कि इसी आइवरमेक्टिन 12 MG टैबलेट की अलग-अलग कंपनियों में बनी एक गोली की MRP 1 रुपये 70 पैसे से लेकर 58 रुपये पचास पैसे तक है.

सिर्फ 874 दवाओं पर सरकार का कंट्रोल

ये सिर्फ एक दवा की कहानी नहीं है, बल्कि सैकड़ों दवाओं की हैं, जो हिंदुस्तान में बनती हैं, बिकती हैं. देश में दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के लिए NPPA यानी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी है. देश में 10 हजार से ज्यादा दवाइयां बनाई और बेची जाती हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ 874 एसेंशियल ड्रग की कीमतों को सरकार कंट्रोल करती है.

मतलब ये कि 874 को छोड़कर बाकी दवाओं को फार्मास्युटिकल कंपनियां कहने के लिए तो MRP पर बेच रही हैं. लेकिन हकीकत में मनमाफिक दाम वसूल रही हैं. लेकिन ये MRP तय कैसे होता है, अब ये समझ लीजिए. फार्मा कंपनियां दवा बनाती हैं, इनमें से सरकार कुछ दवाओं की MRP तय करती है, कुछ की नहीं. कंपनियां अपनी लागत और मुनाफा जोड़कर डिस्ट्रीब्यूटर को देती हैं. डिस्ट्रीब्यूटर 16% मार्जिन पर रिटेलर्स को देते हैं और रिटेलर्स 8% मार्जिन पर बेचते हैं.

जेनरिक दवा ढूढ़ना क्यों मुश्किल

देश में करीब 3000 फार्मास्यूटिकल कंपनियां दवा बनाती हैं. इनमें 90% से ज्यादा प्राइवेट कंपनियां हैं. इन प्राइवेट कंपनियों के दांव-पेंच इतने शक्तिशाली और सरकार के कानून इतने कमजोर हैं कि भारत में मरीजों का मर्ज से पीछा छूटने के बाद भी महंगी दवाओं का दर्द सालों साल सालता रहता है. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर महंगी दवाओं के जंजाल से आप और हम कैसे बच सकते हैं. तो उसका जवाब है, ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल. आखिर ये जेनेरिक दवाएं क्या हैं. क्या ये ब्रांडेड दवाओं जितनी ही कारगर होती हैं और क्यों जेनेरिक दवा को ढूंढना सागर में से एक मोती चुनने जैसा मुश्किल है. देखिए ये रिपोर्ट.

किसी मरीज का इलाज करते समय डॉक्टर तमाम तरह के परहेज करने की सलाह देते हैं. लेकिन बहुत सारे डॉक्टरों को खुद भी एक चीज से परहेज है और वो है जेनेरिक दवाएं. जेनेरिक दवा, मतलब किसी भी दवा का केमिकल नाम, जिसे साल्ट भी कहा जाता है. मान लीजिए आपको बुखार आया है, आपने पैरासिटामॉल नाम की दवा खाई, तो ये एक जेनरिक दवा हुई. इसके केमिकल का नाम भी पैरासिटामॉल ही है, लेकिन जब पैरासिटामॉल साल्ट से बनी गोलियां पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम वाला रैपर लग जाता है, तो वो ब्रांडेड हो जाती हैं. जो महंगे दामों पर बिकती हैं. जेनेरिक में पैरासिटामॉल की 500mg की 1 गोली 50 पैसे की पड़ती है. लेकिन ब्रांडेड होती इसकी एक गोली की कीमत बढ़कर 1 रुपये हो जाती है.

जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं का ये फर्क बाकी दवाओं में भी देखा जा सकता है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली कुछ और दवाओं के उदाहरण से इसे समझिए. जैसे Ciprofloxacin जो आमतौर पर बैक्टीरियल इंफेक्शन में दी जाती है. इसकी 500mg की एक टैबलेट की कीमत जेनेरिक में 1 रुपये 85 पैसे पड़ती है. जो ब्रांडेड होते ही 4 रुपये की हो जाती है. Diclofenac जोड़ों में दर्द और सूजन के इलाज मे इस्तेमाल होती है, जो ब्रांडेड में 14 रुपये 80 पैसे की पड़ती है, लेकिन जेनेरिक में इसकी कीमत 3 रुपये 30 पैसे पड़ती है. Nimesulide जिसका इस्तेमाल बुखार और दर्द में किया जाता है. उसकी एक गोली की कीमत जेनेरिक में 2 रुपये पड़ती है, जो ब्रांडेड में बढ़कर साढ़े 5 रुपये हो जाती है.

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर एक ही साल्ट से बनने वाली दवाओं के दाम ये फर्क क्यों. आइए अब वो समझिए दवाएं बनाने के लिए केमिकल को दवा की शक्ल में ढालने का काम किया जाता है. एक ही कंपनी जेनरिक और ब्रांडेड दोनों तरह की दवाएं बनाती हैं, लेकिन अपनी कंपनी के बैनर के तले बन रही ब्रांडेड दवा को बेचने के लिए कंपनी पैकेजिंग, सप्लाई और मार्केटिंग पर पूरा जोर लगा देती हैं. लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं. डॉक्टर्स से लेकर केमिस्ट तक को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लालच देकर दवा प्रमोट करने के लिए कहा जाता है. नतीजा ये होता है कि जब मरीज उन डॉक्टरों के पास पहुंचता है, जिन पर दवा कंपनियां मेहरबान होती हैं. तो वो डॉक्टर जेनरिक दवा की जगह ब्रांडेड दवाएं लिखकर दवा कंपनियों का कर्ज उतार देते हैं और दूसरी ओर अगर साधारण केमिस्ट शॉप पर जाकर कोई जेनेरिक दवा मांग ले, तो वो इनकार कर देते हैं.

ब्रांडेड दवाओं जितनी कारगर हैं जेनरिक दवाएं

अपने देश में 6 से 8 लाख मेडिकल स्टोर हैं, उसमें सिर्फ 4-5 हजार जनऔषधि दुकानें हैं. यानी 1 प्रतिशत से कम, अगर आप साधारण मेडिकल स्टोर पर जाएंगे, तो जेनेरिक नाम से मेडिसिन मिलेगी ही नहीं. जेनेरिक दवाओं को कम असरदार बताते हुए, उस कंपनी की दवा थमा देते हैं जिस पर मोटा मार्जिन मिलता है. जबकि सच ये है कि जेनरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवाओं जितनी ही कारगर हैं, वैसा ही इलाज करती हैं जैसा ब्रांडेड दवाएं. लेकिन भारत में वहम की बीमारी और महंगे चीज को ही अच्छा मानने की मानसिकता, दवाओं के नाम पर बेहिसाब मुनाफाखोरी के खत्म नहीं होने की एक बड़ी वजह है.

दूसरी वजह है कुछ डॉक्टरों, केमिस्ट और दवा कंपनियों की सांठगांठ, जिसे आप और हम जेनेरिक दवाओं को अपनाकर तोड़ सकते हैं. दवाओं के दाम से जेब जलने से बचा सकते हैं. ब्रांडेड बनाम जेनेरिक दवा की ये जंग जारी है और इस जंग में अगर जीत जेनरिक की हुईं, तो देश में हर साल दवाओं के दाम चुका-चुकाकर कंगाल हो रहे करोड़ो लोगों को गरीब के दलदल में धंसने से बचाया जा सकेगा.

सरकार भी डॉक्टरों से जेनेरिक दवा लिखने की अपील कर चुकी है और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया भी चेतावनी दे चुकी है कि ऐसा नहीं करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी. लेकिन फिर भी बहुत से डॉक्टर अब भी जेनेरिक दवा लिखने से परहेज कर रहे हैं. यहां पर हम एक बात साफ कर देना चाहते हैं कि देश के सारे डॉक्टर्स ऐसा नहीं करते हैं. इसलिए हम देश के तमाम डॉक्टर्स से अपील करना चाहते हैं कि वो भी मुनाफे के लिए महंगी दवाओं के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए आगे आएं और आप लोग भी जेनेरिक दवाओं को लेकर जागरूक हों.

TV9 भारतवर्ष

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