
Nisha Bangre: SDM से सड़क तक, सत्ता के भरोसे की कीमत
राजेश जयंत
BHOPAL: मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ घटनाएं केवल व्यक्ति की नहीं होतीं, वे व्यवस्था की आत्मा को उजागर कर देती हैं। पूर्व SDM निशा बांगरे की कहानी ऐसी ही है। यह कहानी है एक दलित महिला अधिकारी की, जिसने प्रशासनिक सुरक्षा छोड़कर राजनीति की अनिश्चित जमीन पर कदम रखा। यह कहानी साहस की है, लेकिन उससे भी ज्यादा यह भरोसे, नेतृत्व और सिस्टम की चुप्पी की कहानी है। यहां गलती सिर्फ व्यक्ति की नहीं, सवाल पूरे राजनीतिक तंत्र पर खड़े होते हैं।

▪️प्रशासनिक सेवा से बदलाव की चाह
छतरपुर जिले में एसडीएम के रूप में कार्यरत रहीं निशा बांगरे का प्रशासनिक सफर साधारण नहीं था। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाली निशा बांगरे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो पीढ़ियों के संघर्ष के बाद व्यवस्था के भीतर पहुंची। उनके पिता कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई कर लेक्चरर बने। उसी संघर्ष की दूसरी पीढ़ी के रूप में निशा बांगरे गांव की पहली लड़की बनीं जिन्होंने इंजीनियरिंग की और फिर 2018 में MPPSC के माध्यम से डिप्टी कलेक्टर बनीं। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने देखा कि योजनाएं हैं, नियम हैं, लेकिन निर्णय की शक्ति कहीं और केंद्रित है। जमीन, सामाजिक न्याय, दलित अधिकार और गरीबों की समस्याएं अक्सर प्रशासनिक सीमाओं में अटक जाती हैं। यहीं से उनके भीतर यह सोच मजबूत हुई कि असली बदलाव सत्ता और नीति के स्तर से ही संभव है।
▪️कांग्रेस की ओर झुकाव और राजनीतिक सक्रियता
निशा बांगरे का राजनीतिक झुकाव आकस्मिक नहीं था। वैचारिक रूप से वे कांग्रेस की सामाजिक न्याय और संवैधानिक राजनीति से खुद को जुड़ा हुआ मानती थीं। यह झुकाव प्रशासनिक सेवा के दौरान ही स्पष्ट होने लगा था। इस्तीफे के बाद यह झुकाव खुलकर सामने आया। वे कांग्रेस के कार्यक्रमों, आंदोलनों और सार्वजनिक मंचों पर सक्रिय रहीं। उन्हें पार्टी के भीतर एक पढ़ी-लिखी, प्रशासनिक अनुभव वाली और दलित समाज से आने वाली महिला चेहरे के रूप में देखा जाने लगा। समर्थकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह धारणा बनने लगी कि वे विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार होंगी।

▪️कमलनाथ की केंद्रीय भूमिका और भरोसे की राजनीति
यहीं से इस कहानी में कमलनाथ का प्रवेश होता है — और वे इस पूरे घटनाक्रम के प्रमुख पात्र बन जाते हैं।
निशा बांगरे का राजनीति में आने का फैसला केवल वैचारिक उत्साह का नतीजा नहीं था। यह फैसला शीर्ष नेतृत्व से संवाद, संकेत और भरोसे के आधार पर लिया गया। सार्वजनिक चर्चाओं और खुद निशा बांगरे के बयानों के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व, विशेष रूप से कमलनाथ से उनके सीधे संवाद हुए। उन्हें यह भरोसा मिला कि यदि वे प्रशासनिक सेवा से बाहर आती हैं, तो उनके राजनीतिक भविष्य पर विचार किया जाएगा।
यही भरोसा निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने एक सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थायी प्रशासनिक पद छोड़ने का जोखिम उठाया।
▪️इस्तीफा और प्रशासनिक देरी का जाल
विधानसभा चुनाव से पहले निशा बांगरे ने डिप्टी कलेक्टर पद से इस्तीफा दिया। लेकिन यहां से व्यवस्था की असली परीक्षा शुरू होती है। उनका इस्तीफा समय पर प्रभावी नहीं हो पाया। प्रशासनिक प्रक्रियाएं लंबी खिंचती चली गईं।

इसी बीच टिकट वितरण की प्रक्रिया पूरी हो गई। लेकिन उनका नाम उम्मीदवारों की सूची में नहीं आया। न इस्तीफा पूरी तरह स्वीकार हुआ, न चुनाव लड़ने का अवसर मिला। वे दो व्यवस्थाओं के बीच फंस गईं — न अफसर रहीं, न नेता बन पाईं।
▪️नेतृत्व का मौन और राजनीतिक असहायता
इस पूरे दौर में सबसे बड़ा सवाल कमलनाथ की भूमिका को लेकर उठा। जिनके भरोसे पर यह फैसला लिया गया था, वही नेतृत्व निर्णायक रूप से सामने नहीं आया। न सार्वजनिक समर्थन, न संगठनात्मक हस्तक्षेप। यही मौन इस कहानी का सबसे भारी पहलू है। राजनीति में कई बार कुछ न कहना भी बहुत कुछ कह जाता है।

▪️आंदोलन, गिरफ्तारी और खुला टकराव
निशा बांगरे ने चुपचाप यह स्थिति स्वीकार नहीं की। उन्होंने पदयात्रा की, धरना दिया और प्रशासनिक देरी को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया। उनका सवाल सीधा था – क्या एक अधिकारी को राजनीति में आने से तकनीकी देरी के जरिए रोका जा सकता है।

इस संघर्ष के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई। यह गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं थी, बल्कि उस सवाल की थी जो सत्ता से जवाब मांग रहा था।
▪️आज की स्थिति, एक अधूरी पहचान
आज निशा बांगरे न प्रशासनिक सेवा में हैं और न किसी निर्वाचित पद पर। एक छोटे बच्चे की मां होने के नाते वे आर्थिक और सामाजिक अनिश्चितता से जूझ रही हैं। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि यह फैसला उन्हें कई साल पीछे ले गया। राजनीतिक पहचान अधूरी है, प्रशासनिक रास्ता बंद हो चुका है और भरोसे की राजनीति की कीमत उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर चुकानी पड़ रही है।

▪️निष्कर्ष
निशा बांगरे की कहानी केवल एक महिला अफसर की नहीं है। यह उस राजनीति की कहानी है जहां संकेत और भरोसे पर फैसले तो लिए जाते हैं, लेकिन जब परिणाम की घड़ी आती है तो नेतृत्व पीछे हट जाता है। कमलनाथ इस पूरे घटनाक्रम में इसलिए केंद्रीय पात्र हैं क्योंकि उनकी चुप्पी ने इस संघर्ष को और गहरा किया।
यह कहानी आने वाले समय के उन सभी अधिकारियों के लिए चेतावनी है, जो राजनीति में आने से पहले नेतृत्व के भरोसे पर अपना भविष्य दांव पर लगाने की सोच रहे हैं।
यह सवाल अब भी खड़ा है- क्या व्यवस्था ऐसे साहस की कीमत चुकाने को तैयार है।





