निरापद कोई नहीं है…

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निरापद कोई नहीं है…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

आइए आज हम कविता ‘निरापद कोई नहीं है’ के साथ आगे बढ़ते हैं…

ना निरापद कोई नहीं है

न तुम, न मैं, न वे

न वे, न मैं, न तुम

सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की!

आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है

इसकी दुम पर

पैसा है!

ना निरापद कोई नहीं है

ठीक आदमकद कोई नहीं है

न मैं, न तुम, न वे

न तुम, न मैं, न वे

कोई है कोई है कोई है

जिसकी ज़िंदगी

दूध की धोई है

ना, दूध किसी का धोबी नहीं है

हो तो भी नहीं है!

यहां निरापद शब्द का अर्थ है- जिसे कोई आपदा न हो या जिसे कोई आफत या डर न हो। और यह कविता है 20वीं सदी के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र की। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में हकीकत और

बदलती सोच साफ नजर आती है। उनकी लिखी कविताएँ कल भी प्रासंगिक थीं, आज भी प्रासंगिक हैं और कल भी प्रासंगिक रहेंगी। निरापद कोई नहीं है… कविता इसका ज्वलंत प्रमाण है।

आज हम भवानी प्रसाद मिश्र की बात खासतौर पर इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह मध्य प्रदेश के थे और 20 फरवरी को ही उनका निधन हुआ था। भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च,1913 को टिगरिया गांव जिला होशंगाबाद (वर्तमान नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश) में हुआ था। भवानी प्रसाद मिश्र की प्रारंभिक शिक्षा क्रमश: सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर और जबलपुर में हुई। उन्होंने हिन्दी,अंग्रेज़ी और संस्कृत विषय लेकर बी. ए. पास किया। भवानी प्रसाद मिश्र ने महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर शिक्षा देने के विचार से एक स्कूल खोल लिया और उस स्कूल को चलाते हुए ही आज़ादी की लड़ाई में 1942 में गिरफ्तार होकर 1949 में जेल से रिहा हुए। उसी वर्ष महिलाश्रम वर्धा में शिक्षक की तरह चले गए और चार पाँच साल वर्धा में बिताए।

भवानी प्रसाद मिश्र का कविताएँ लिखने की शुरूआत लगभग 1930 से हो गयी थी और कुछ कविताएँ पंडित ईश्वरी प्रसाद वर्मा के सम्पादन में निकलने वाले ‘हिन्दू पंच’ में हाईस्कूल पास होने के पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं। सन 1932-33 में वे माखनलाल चतुर्वेदी के संपर्क में आए। श्री चतुर्वेदी आग्रहपूर्वक कर्मवीर में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ प्रकाशित करते रहे। हंस में काफ़ी कविताएँ छपीं और फिर अज्ञेय जी ने दूसरे सप्तक में इन्हे प्रकाशित किया। दूसरे सप्तक के प्रकाशन के बाद प्रकाशन क्रम ज्यादा नियमित होता गया। उन्होंने चित्रपट (सिनेमा) के लिए संवाद लिखे और मद्रास के एबीएम में संवाद निर्देशन भी किया। मद्रास से मुम्बई आकाशवाणी के निर्माता बन गए और आकाशवाणी केन्द्र, दिल्ली पर भी काम किया।

भवानी प्रसाद मिश्र की रचनाओं में गीत-फ़रोश, चकित है दुख, गांधी पंचशती, अंधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, व्यक्तिगत, ख़ुश्बू के शिलालेख,परिवर्तन जिए, त्रिकाल संध्या, अनाम तुम आते हो, इंदन मम्, शरीर, कविता, फसलें और फूल, मानसरोवर, दिन,संप्रति, ‘नीली रेखा तक’ आदि कुल 22 पुस्तकें आपकी प्रकाशित हुईं। आपने संस्मरण, निबंध तथा बाल-साहित्य भी रचा।

भवानी प्रसाद मिश्र उन गिने चुने कवियों में थे, जो कविता को ही अपना धर्म मानते थे और आमजनों की बात उनकी भाषा में ही रखते थे। वे ‘कवियों के कवि’ थे। मिश्र जी की कविताओं का प्रमुख गुण कथन की सादगी है। बहुत हल्के-फुलके ढंग से वे बहुत गहरी बात कह देते हैं जिससे उनकी निश्छल अनुभव संपन्नता का आभास मिलता है। इनकी काव्य-शैली हमेशा पाठक और श्रोता को एक बातचीत की तरह सम्मिलित करती चलती है। मिश्र जी ने अपने साहित्यिक जीवन को बहुत प्रचारित और प्रसारित नहीं किया। मिश्र जी मौन निश्छलता के साथ साहित्य-रचना में संलग्न रहे। इसीलिए उनके बहुत कम काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ‘गीत-फ़रोश’ के प्रकाशन के वर्षों बाद ‘चकित है दुख’, और ‘अंधेरी कविताएँ’ नामक दो काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए।

आजादी के बाद भवानी प्रसाद अधिकतर दिल्ली की धूल और धुएं के बीच शहर में रहे। परंतु देश के कल्याण की कामना ने उन्हें कभी दिल्ली की माया में फंसने नहीं दिया। यूं बड़े लोगों के साथ जान-पहचान की कमी न थी।महात्मा गांधी, विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, जैसों के साथ उनका परिचय था। बजाज कुटुम्ब के साथ घरोपा था। श्रीमन्नारायण तो उनके मुक्त प्रशंसक थे परंतु इनके पहचान का खुद लाभ कभी नहीं लिया। विचारों से भवानी बाबू सच्चे गांधीवादी थे, मगर उनका कवि हृदय किसी वाद के खांचे में समा जाए ऐसा न था। इसीलिए वे गांधीवादी कवि बनने के बदले मानववादी कवि बने रहे। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं की समीक्षा करते हुए प्रोफेसर महावीर सरन जैन का कथन है कि, “हिन्दी की नई कविता पर सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि उसमें अतिरिक्त अनास्था, निराशा, विशाद, हताशा, कुंठा और मरणधर्मिता है। उसको पढ़ने के बाद जीने की ललक समाप्त हो जाती है, व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है, मन निराशावादी और मरणासन्न हो जाता है। यह कि नई कविता ने पीड़ा, वेदना, शोक और निराशा को ही जीवन का सत्य मान लिया है। नई कविता भारत की जमीन से प्रेरणा प्राप्त नहीं करती। इसके विपरीत यह पश्चिम की नकल से पैदा हुई है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इन सारे आरोपों को ध्वस्त कर देती हैं।

 

मिश्र जी गाँधीवादी है।भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इसी कारण समाज में जो विपन्न हैं, लाचार हैं, थके हुए हैं, धराशायी हैं उन सबको सहारा देने के लिए प्रेरित करती हैं, उनको उठाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं”। उनकी कविता घरेलू विषयों से लगाकर आध्यात्मिकता के शिखरों तक का भ्रमण करती है। उन्हें ऐहिक सुख की परवाह न थी। वे कहते, ‘सुख अगर मेरे घर में आ जाए तो उसे बैठायेंगे कहां?’ स्वराज के बाद का भारत जिस तरह महात्मा गांधी के दिखाए मार्ग से विचलित हुआ उससे भवानी बाबू का हृदय टीस उठता। 1959 में लिखी एक कविता में उन्होंने इस टीस पहुंचाने वाली दिशा की ओर इंगित करते हुए कहा था-

पहले इतने बुरे नहीं थे तुम

याने इससे अधिक सही थे तुम

किंतु सभी कुछ तुमही करोगे इस इच्छा ने

अथवा और किसी इच्छा ने, आसपास के लोगों ने

या रूस-चीन के चक्कर-टक्कर संयोगों ने

तुम्हें देश की प्रतिभाओं से दूर कर दिया

तुम्हें बड़ी बातों का ज्यादा मोह हो गया

छोटी बातों से संपर्क खो गया

धुनक-पींज कर, कात-बीन कर

अपनी चादर खुद न बनाई

बल्कि दूर से कर्ज़ लेकर मंगाई

और नतीजा चाचा-भतीजा

दोनों के कलपनातीत है

यह कर्जे की चादर जितना ओढ़ो

उतनी कड़ी शीत है।

भवानी बाबू जिस आध्यात्मिक पीठ पर आसीन थे उसने उन्हें कभी निराशा में डूबने नहीं दिया। जैसे सात-सात बार मौत से वे लड़े वैसे ही आज़ादी के पहले ग़ुलामी से लड़े और आज़ादी के बाद तानाशाही से भी लड़े।

भवानी दादा की रचनाओं में पाठक से संवाद करने की क्षमता है। सन् 1972 में आपकी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक पुरस्कारों के साथ-साथ आपने भारत सरकार का पद्म श्री अलंकार भी प्राप्त किया। 1981-82 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के संस्थान सम्मान से सम्मानित हुए और 1983 में उन्हें मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया। 20 फरवरी सन् 1985 को हिन्दी काव्य-जगत् का यह अनमोल सितारा अपनी कविताओं की थाती यहाँ छोड़ हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गया।

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के

लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।