मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन 24 पुजारियों का राम मंदिर के लिए सिलेक्शन हुआ है। इनमें से दो अनुसूचित जाति (SC) व एक पिछड़ा वर्ग (OBC) से होंगे। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, क्योंकि इससे पहले राम मंदिर के मुख्य पुजारी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
इस फैसले के जरिए एक सामाजिक समरसता का उदाहरण भी पेश किया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती इस पर स्वामी रामानंद का एक दोहा याद करते हैं, “जाति पाति पूछे न कोई, हरि का भजे सो हरि का होई…”
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती कहते हैं, “प्राणप्रतिष्ठा के साथ ही समाज को भी एक नया संदेश देने के लिए तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने यह पहल की है।” साथ ही इससे एक संदेश भी दिया जा रहा है कि पुजारियों का चयन सिर्फ योग्यता के आधार पर किया गया है, न कि उनकी जाति को देखते हुए।
एक तथ्य ये भी है कि इस तरह का चलन ज्यादातर दक्षिण भारत में भी देखने को मिलता है। वहां के मंदिरों में 70 फीसदी पुजारी गैर ब्राह्मण हैं।
कैसे हो रही पुजारियों की ट्रेनिंग?
मंदिर में पूजन के लिए राम मंदिर के महंत मिथिलेश नंदिनी शरण और महंत सत्यनारायण दास पौरोहित्य और कर्मकांड का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
इसके लिए 300 पुजारियों का इंटरव्यू लिया गया था और नवंबर में इनमें से सिर्फ 24 लोगों का चयन किया गया। इन सभी को 14 मुश्किल सवालों के जवाब देने के बाद ही चुना गया है। इन सभी पुजारियों की रामानंगी परंपरा के अनुसार तीन महीने तक ट्रेनिंग चलेगी।
इस दौरान ये युवा पुजारी गुरुकुल के नियमों का पालन करेंगे। नियम इतने कड़े हैं कि इनमें से न तो कोई मोबाइल का इस्तेमाल कर सकता है और न ही किसी बाहरी व्यक्ति से कोई संपर्क कर सकता है।
ट्रेनिंग के दौरान फ्री में रहना और भोजना सुविधा मुहैया कराई गई है। इस दौरान उन्हें रहने और खाने सुविधा मिल रही है। इसके साथ ही 2000 रुपए मासिक भत्ता भी दिया जा रहा है।