अब भारतीय चांदी का सिक्का विश्व राजनीति में 

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अब भारतीय चांदी का सिक्का विश्व राजनीति में 

आलोक मेहता

पश्चिम एशिया के युद्ध से बने वैश्विक संकट में भारत का सिक्का कितना जम रहा ? इसका उत्तर तो स्थितियां सुधरने के बाद पता चलेगा | लेकिन यह याद दिलाना जरुरी है कि 1950 के दशक में चीन के कुछ क्षेत्रों में भारतीय चांदी का बड़ा सिक्का खूब चलता था | सो अब आने वाले वर्षों में भारत की साख सोने की चिड़िया की न सही चांदी के सिक्के वाली कूटनीति से तो बढ़ा सकते हैं | बशर्त लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद व्यापक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय हितों पर राजनीतिक सहमति बनती रहे | ईरान इजराइल अमेरिकी युद्ध में प्रतिपक्ष या पुराने विचार वाले मीडिया मुग़ल बार बार सवाल उठा रहे हैं कि भारत खुलकर ईरान का समर्थन क्यों नहीं करता या क्यों नहीं सीधे अमेरिका इजराइल के प्रति झुकाव दिखाता है ? मैं नेहरु इंदिरा युग की नहीं कांग्रेस के ही प्रधान मंत्री नरसिम्हा राव के सत्ता काल में ईरान के साथ गहरे रिश्तों के बावजूद 1992 – 93 में इसराइल को भारत में पूर्ण दूतावास के साथ राजदूत रखने की अनुमति की याद दिला सकता हूँ | उसी समय इस्राईल के नए राजदूत के नई दिल्ली के बाराखंभा रोड की एक बिल्डिंग के एक फ्लोर पर मैंने दैनिक हिंदुस्तान के लिए इंटरव्यू किया था | यही नहीं कुछ समय बाद राव सरकार की जानकारी में ईरान की अयातुल्ला सरकार ने मुझ जैसे तीन चार सम्पादकों को एक सप्ताह के लिए ईरान आमंत्रित किया था | इनमें नेशनल हेराल्ड के संपादक श्रीराम शर्मा शामिल थे | इस यात्रा के बाद हिंदुस्तान अख़बार में ही मैंने एक पूरे पेज का लेख लिखा था | इसी तरह पश्चिमी प्रभाव के बावजूद राव साहब ने 1993 में बीजिंग जाकर चीन से पहला बड़ा मैत्री समझौता किया था | संयोग से तब भी मैं वहां उपस्थित था |तो संतुलन का सिलसिला हर तरफ चलता रहा है |

वर्तमान विश्व राजनीतिक सामरिक संकट पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सीमित सार्वजनिक बयान और एक हद तक मौन पर भी कुछ सवाल उठ रहे हैं | इसी सन्दर्भ में मुझे आधुनिक राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले नरसिम्हा राव द्वारा विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ सहयोगी राजनयिक श्याम शरण से कही गई एक बात याद आती है | किसी अच्छे मूड में राव साहब ने श्याम शरणजी से कहा – ” जानते हैं भारत में सबसे सफल नेता कौन हो सकता है ? ” शरण कोई उत्तर सोच सकें इससे पहले ही राव साहब ने खुद बता दिया – ‘ सबसे सफल राजनेता को निर्मम होने के साथ तपस्वी की तरह भी शांत रहना होगा | ‘ श्याम शरणजी ने अपनी एक किताब में भी इस बात का उल्लेख पहले किया है | इस दृष्टि से युद्ध और ऊर्जा पैट्रॉल गैस इत्यादि के संकट में भारत की असली तटस्थता ही सही पुरानी गुट निरपेक्षता ( नॉन एलाइनमेंट समूह ) का रुप है |

यों उस समय गुट निरपेक्ष देशों के समूह में अधिकांश सोवियत रुस के समर्थक देश थे | एक दो उदाहरण की ओर ध्यान दिलाया जा सकता है | 1983 में सातवां नॉन एलाइनमेंट सम्मेलन दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ और इसका उद्घाटन क्यूबा के राष्ट्रपपति फिदेल कास्त्रो ने किया | यही नहीं फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात सर्वाधिक महत्व पा रहे थे | एक मौके पर वह जॉर्डन को लेकर भड़के तो उन्हें श्रीमती इंदिरा गांधी ने किसी तरह मनाकर बहिष्कार से रोका | तब भी ईरान इराक और कम्पूचिया के विवाद गंभीर थे | बहरहाल वर्तमान परिदृश्य में भी ईरान इसराइल , अमेरिका , रुस , चीन और यूरोप के साथ संबंधों के तार जोड़कर मोदी सरकार भारतीय हितों और दूरगामी आर्थिक संबधों की रक्षा का प्रयास कर रही है |स्वतंत्रता के बाद भारत ने विदेश नीति को तीन आधारों पर रखा: गुटनिरपेक्षता , उपनिवेशवाद-विरोध , अरब देशों और फ़िलिस्तीन के समर्थन |इसी कारण शुरुआती दशकों में भारत ने इज़राइल से दूरी और ईरान व अरब देशों से निकटता बनाए रखी।भारत और ईरान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिकसंबंध हजारों वर्षों पुराने हैं: फ़ारसी भाषा का भारतीय प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव रहा | सूफी परंपरा और साहित्यिक संबंध रहे | 1950–70 के दशक में ईरान, अमेरिका के करीब था |भारत गुटनिरपेक्ष रहा, लेकिन दोनों के बीच व्यापार चलता रहा |ऊर्जा (तेल) का बड़ा स्रोत ईरान बना | इस्लामिक क्रांति के बाद (1979) ईरानी इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान पश्चिम विरोधी हो गया |भारत ने संतुलन बनाए रखा | दोनों देशों के संबंध जारी रहे 1990 के बाद सोवियत संघ के पतन के साथ भारत और ईरान ने सहयोग बढ़ाया | चाबहार बंदरगाह परियोजना योजना उसीका हिस्सा है |चाबहार पोर्ट भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान तक पहुँच देता है। ऊर्जा और आर्थिक संबंध ईरान भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा | अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण व्यापार प्रभावित हुआ |फिर भी भारत ने संतुलित नीति रखी भारत ईरान से संबंध बनाए रखता है लेकिन अमेरिका और इज़राइल के साथ संबंधों को ध्यान में रखते हुए सावधानी रखता है | इसलिए वर्तमान युद्ध के क्षेत्रीय तनाव में भी भारत ने “संयम और संवाद” की अपील की

दूसरी तरफ भारत ने 1950 में इज़राइल को मान्यता दी , लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं बनाए थे , क्योंकि अरब देशों से संबंध और फ़िलिस्तीन का समर्थन जारी था |फिर भी गुप्त सहयोग जारी रहा | 1962, 1965, 1971 युद्धों में इज़राइल ने मदद की प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के सत्ता में आने पर 1992 में बड़ा बदलाव हुआ |29 जनवरी 1992 को पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए | नई दिल्ली में इज़राइल दूतावास खुला | यह भारत की विदेश नीति में ऐतिहासिक मोड़ था। 1990–२०१० रणनीतिक साझेदारी के तहत रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा |1999 कारगिल युद्ध में इज़राइल ने हथियार दिए | मिसाइल, ड्रोन, निगरानी तकनीक में सहयोग दिया |2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में मजबूत सम्बन्ध होने लगे | 2017 में पहली बार भारतीय प्रधान मंत्री का इज़राइल दौरा हुआ |रक्षा, कृषि, तकनीक, ए आई में सहयोग के समझौते हुए | इज़राइल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार बना भारत हर साल अरबों डॉलर के रक्षा उपकरण खरीदता है |2020 के बाद तो सामरिक संबंध ( “Strategic Partnership”) बन चुके हैं | संतुलन – ईरान और इज़राइल दोनों के साथ भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता ईरान और इज़राइल दोनों के साथ संतुलन है | जरूरी है यह संतुलन क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा (ईरान) रक्षा और तकनीक (इज़राइल)पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासी , और वैश्विक राजनीति में संतुलन का रुख अपनाना |