
पढ़ना जारी रखें
बड़नगर में चढ़ा दिया ओ पॉजिटिव ब्लड
महिला के पति राहुल ने बताया कि हम उज्जैन जिले के ग्राम करोंदिया के रहने वाले हैं। पत्नी को रक्तस्त्राव की समस्या के चलते बड़नगर के सिटी अस्पताल में इलाज के लिए लेकर गए थे। यहां ऑपरेशन किया और दो यूनिट ओ पॉजिटिव ब्लड ग्रुप चढ़ा दिया। इसके बाद तबीयत और बिगड़ने लगी। जिसके बाद हम इलाज के लिए इंदौर लेकर आए। यहां पता चला कि गलत ब्लड ग्रुप चढ़ा दिया गया, जिससे किडनी में समस्या हो गई। अभी उसकी डायलिसिस भी हो रही है। इंदौर से हमें काफी सहयोग मिला है, यहां ब्लड ग्रुप नहीं होने पर बाहर से बुलाकर पत्नी की जान बचा ली है।
1952 में बाम्बे में हुई थी इसकी खोज
जानकारी अनुसार रेयर ब्लड ग्रुप में शामिल बाम्बे ब्लड ग्रुप की खोज वर्ष 1952 में डॉ वाईएम भेंडे ने की थी। क्योंकि, यह खोज उस वक्त बाम्बे में हुई थी, इस वजह से इसे ‘बाम्बे ब्लड ग्रुप’ का नाम दिया गया। दूसरी वजह यह सबसे पहले बाम्बे के कुछ लोगों में पाया गया था। यह ब्लड ग्रुप ज्यादातर भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व क्षेत्र के कुछ हिस्सों में पाया जाता है।
किसे दें और किससे ले सकते हैं खून
विशेषज्ञों के मुताबिक इस ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति सिर्फ दूसरे बाम्बे ब्लड ग्रुप वाले से ही ब्लड ले सकते हैं। इसलिए इस ब्लड ग्रुप का जो भी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता है, उसे स्टोर कर लिया जाता है। बाम्बे ब्लड ग्रुप बहुत दुर्लभ है, इसलिए डोनर को ढूंढना बहुत मुश्किल हो सकता है। किसी दूसरे ग्रुप का खून चढ़ाने पर बाम्बे ब्लड ग्रुप के मरीज की जान खतरे में आ सकती है।