सुप्रीम कोर्ट ही समझेगा, ‘समता’ में छिपा ‘असमता’ का भाव…

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सुप्रीम कोर्ट ही समझेगा, ‘समता’ में छिपा ‘असमता’ का भाव…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

यूजीसी ने 13 जनवरी, 2026 को ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियमन, 2026’ अधिसूचित किए थे। यूजीसी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए ‘समता विनियम 2026’ लेकर आई है। इसमें समान्य वर्ग के लोगों द्वारा एससी, एसटी, ओबीसी के साथ जातिगत भेदभाव करने पर कड़े प्रवाधान बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने नियम का विरोध सड़कों पर हो रहा है। दरअसल समता के नाम पर असमता का डरावना चेहरा सवर्णों को नजर आ रहा है। इसके चलते पिछले पंद्रह दिन से पूरे देश में जगह-जगह न केवल विरोध हो रहा है बल्कि यूजीसी के इस नए फरमान के पीछे छिपी भेदभाव की भावना से आहत सवर्ण हर मंच पर अपना दुख बयाँ कर रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि किसी भी जिम्मेदार ने इस विषय पर अपनी बात रखने का भी फर्ज नहीं निभाया है। ऐसे में अब गेंद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के पाले में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने इस ‘समता विनियम 2026’ में छिपी असमता पर अब सुप्रीम कोर्ट ही गौर करेगा और शायद इससे एक न्यायसंगत रास्ता सामने दिखने लगेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के उस नए विनियमन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है, जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को गैर-समावेशी बताया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये नियम कुछ विशिष्ट श्रेणियों को संस्थागत सुरक्षा के दायरे से बाहर रखते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची की पीठ ने वकील की दलीलों पर गौर किया, जिन्होंने इस मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी। वकील ने दलील दी कि इन नियमों के कारण सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव की संभावना बढ़ गई है। ‘राहुल दीवान एवं अन्य बनाम केंद्र’ नामक इस याचिका पर सीजेआई ने कहा, “हमें पता है कि क्या हो रहा है। कमियां दूर करें, हम इसे सूचीबद्ध करेंगे।” याचिका में कहा गया है कि भेदभाव की इस सीमित परिभाषा के कारण सामान्य या गैर-आरक्षित श्रेणियों के व्यक्ति संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण के अधिकार से वंचित हो गए हैं। याचिका के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों या कर्मचारियों को भी उनकी जातीय पहचान के आधार पर उत्पीड़न या पक्षपात का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन नए नियम उन्हें सुरक्षा नहीं देते।

ये नए नियम 2012 के पुराने दिशानिर्देशों का स्थान लेते हैं, जो केवल सलाहकार प्रकृति के थे। नए नियमों में अनिवार्य किया गया है कि समितियों में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांगजन और महिला सदस्य शामिल हों। लेकिन सवर्ण पूरी तरह से इस नए नियम के निशाने पर नजर आ रहे हैं। तो समता के संवर्धन के लिए बनाए गए यूजीसी के नए फरमान में ‘समता’ के नाम पर छिपी ‘असमता’ पर अब सुप्रीम कोर्ट गौर करेगा, यह राहत से भरी खबर मानी जा सकती है…।

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।