समय के साथ बदला है हमारा मीडिया: सामाजिक सरोकारों को छोड़कर पत्रकारिता संभव नहीं

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समय के साथ बदला है हमारा मीडिया: सामाजिक सरोकारों को छोड़कर पत्रकारिता संभव नहीं

-प्रो.संजय द्विवेदी

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वक्त का काम है बदलना,वह बदलेगा। समय आगे ही जाएगा,यही उसकी नैसर्गिक वृत्ति है। ऐसे में पत्रकारिता भी अब बहुत बदली है। वह एक सक्षम उद्योग है, जिस पर निर्भर तमाम जिंदगियां बहुत अच्छा जीवन जी रही हैं। परिवर्तन कई तरह के हैं। तकनीक के हैं, भाषा के हैं, प्रस्तुति के भी हैं, छाप-छपाई के हैं,काम करने की शैली के हैं । हर क्षेत्र में हमने प्रगति की है। आज दुनिया के बेहतर अखबारों के समानांतर समाचार पत्र हमारे यहां छप रहे हैं। वे अपनी गुणवत्ता, प्रस्तुति, छाप-छपाई में कहीं कमजोर नहीं हैं। टीवी और इंटरनेट आधारित मीडिया में हमने बहुत प्रगति की है। यह प्रगति विस्मय में डालती है। काम के तरीके में परिवर्तन आया है, तकनीक के सहारे ज्यादा काम हो रहा है। किंतु विचार और गुणवत्ता की जगह तकनीक नहीं ले सकती। यह मानना ही चाहिए।मीडिया की मजबूरी है कि वह समाज निरपेक्ष नहीं हो सकता। उसे प्रथमतः और अंततःजनता के दुख-दर्द के साथ होना होगा।
हाल के उदाहरण देखें तो कोरोना संकट-एक और दो दोनों संकटों पर जिस तरह मीडिया ने आम जनता के दुख-दर्द उनकी तकलीफों को बताया। समाज को संबल दिया वह बात बताती है कि मीडिया की मुक्ति कहां है। वह विचारधारा के आधार पर पक्ष लेता है। कुछ के प्रति ज्यादा कड़ा या नरम हो सकता है। पर यह बात बहुलांश पर लागू नहीं होती। ज्यादातर मीडिया अपेक्षित तटस्थता और ईमानदारी के साथ काम करता है। दूसरी बात मीडिया के पाठक वर्ग की है जो उनका पाठक है, उनकी बात ज्यादा रहेगी। मीडिया मूलतः महानगर केंद्रित है। शहर केंद्रित है। पर अब छोटे स्थानों को भी जगह मिल रही है। गांवों तक अखबार जा रहे हैं। उनकी भी खबरें आने लगी हैं। हर अखबार के स्थानीय संस्करण अपने स्थानीयताबोध और माटी की महक के नाते ही स्वीकारे जा रहे हैं।

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मीडिया का आकार-प्रकार बहुत बढ़ गया है। अखबारों के पेज बढ़े हैं, संस्करण बढ़े हैं। जिले-जिले के पेज बनते हैं। टीवी न्यूज चैनल चौबीस घंटे समाचार देते हैं, न्यू मीडिया पल-प्रतिपल अपडेट होता है। ऐसे में खबरों की उमर ज्यादा नहीं रहती। एक जाती है तो तुरंत दूसरी आती है। ऐसे में किसी खबर पर महीनों चर्चा हो यह संभव नहीं है। दोपहर की खबर पर शाम को चैनल चर्चा करते हैं। सुबह अखबारों में संपादकीय, विश्लेषण और लेख आ जाते हैं। इससे ज्यादा क्या चाहिए? गति बढ़ी है तो इससे सारा कुछ बदल गया है। जहां तक अखबार बेचने की बात है, स्कीम दी जाती है, सच है। यह स्पर्धा के नाते है। आज अखबारों में लाखों में छपते और बिकते हैं। चीन, जापान और भारत आज भी प्रिंट के बड़े बाजार हैं। यहां ग्रोथ निरंतर है। ऐसे में अपना प्रसार बढ़ाने की स्पर्धा में स्कीम आदि के कार्य होते हैं। इसमें गलत क्या है? आप सीमित संख्या में छपना और बिकना चाहते हैं, तो स्कीम नहीं चाहिए। आपको ज्यादा प्रसार चाहिए तो कुछ आकर्षण देना पड़ेगा। वे इवेंट हों, इनाम हों, स्कीम हो कुछ भी हो। जहां तक उम्मीद की बात है, तो भरोसा तो रखना पड़ेगा। आप मीडिया पर भरोसा नहीं करेगें तो किस पर करेगें? कहां जाएंगें?

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इसी तरह टीवी चैनल लोगों के निशाने पर हैं। जबकि टीवी ड्रामे का माध्यम है, वहां दृश्य रचने होते हैं। इसलिए यह सब चलता है। कल तक नाग-नागिन की शादी, काल-कपाल-महाकाल,स्वर्ग की सीढ़ी, राजू श्रीवास्तव-राखी सावंत-रामदेव से निकलकर ये टीवी चैनल बहस पर आए हैं। कल खबरों पर भी आएंगें। थोड़ा धीरज रखना ही चाहिए। गंभीर चैनल भी हैं पर उन्हें देखा नहीं जाता। दर्शकों और पाठकों को भी मीडिया साक्षर बनाने की सोचिए। सारा ठीकरा मीडिया पर मत फोड़िए। डीजी न्यूज खबरें दिखाता है, देखिए। हमें पाठक और दर्शक की सुरूचि का विकास भी करना होगा। वह गंभीर मुद्दों पर स्वस्थ संवाद के लिए तैयार किया जाना चाहिए। अभी इसमें समय लगेगा। नहीं होगा, ऐसा नहीं है। समझ का विकास समय लेता है। लोकतंत्र के लिए वैसे भी कहते हैं कि वह सौ साल में साकार होता है। हमें इंतजार करना होगा।
सामाजिक सरोकार छोड़कर कोई पत्रकारिता नहीं हो सकती। न्यूज मीडिया अलग है और मनोरंजन का मीडिया अलग है। दोनों को मिलाइए मत। दोनों चलेंगें। एक आपको आनंद देता है, दूसरा खबरें और विचार देता है। दोनों अपना-अपना काम कर रहे हैं। इसमें गलत क्या है? मनोरंजन का मीडिया भी जरूरी है। खबर मीडिया भी जरूरी है। कुछ खुद को इंफोटेनमेंट चैनल कहते हैं, यानि दोनों काम करते हैं। इसलिए बाजार है, तो बाजार में हर तरह के उत्पाद हैं। यहां पोर्न और सेमीपोर्न भी है। किंतु हमें न्यूज मीडिया की जिम्मेदारियों और उसकी बेहतरी की बात करनी चाहिए। यही हमारी दुनिया है। शेष से हमारी स्पर्धा नहीं है। यह तय मानिए मनोरंजन, ओटीटी और फिल्म की दुनिया से न्यूज के दर्शक कम ही रहेंगे, इस पर विलाप करने की जरूरत नहीं है। हम खास हैं, यह मानिए। इसलिए हमारे पास खास दर्शक या पाठक समूह हैं, हमें भीड़ आवश्यक्ता नहीं है।
इतने भारी-भरकम और खर्चीले मीडिया को कारपोरेट के अलावा कौन चला सकता है? सरकार चलाएगी तो उस पर कोई भरोसा नहीं करेगा। समाज या पाठक को मुफ्त का अखबार चाहिए। आप अगर सस्ता अखबार और पत्रिकाएं चाहते हैं तो उसकी निर्भरता तो विज्ञापनों पर रहेगी। विज्ञापन देने वाला कुछ तो अपनी भी बात रखेगा। यानि अगर मीडिया को आजाद होना है, तो उसकी विज्ञापनों पर निर्भरता कम होनी चाहिए। ऐसे में पाठक और दर्शक उसका खर्च उठाएं। अगर आप अच्छी, सच्ची, शोधपरक खबरें पढ़ना चाहते हैं तो खर्च कीजिए। आज भी हमारे पास बहुत अच्छे अखबार, वेबसाइट, न्यूज चैनल हैं, जो दबाव से मुक्त होकर बातें कहते हैं। लेकिन उन्हें जनसहयोग नहीं होगा, आर्थिक संबल नहीं होगा तो कब तक यह भूमिका निभाएंगें कहा नहीं जा सकता। बावजूद इसके निराशाजनक हालात नहीं हैं। सारी व्यवस्था विरोधी खबरें भी यही कारपोरेट मीडिया लेकर आ रहा है। मीडिया के वजूद को बचाना है तो जनपक्ष अनिवार्य है। थोड़ा बहुत एजेंडा सेंटिंग सब करते हैं। जो सत्ता में हैं,मंत्री हैं उनकी बात ज्यादा आएगी। लेकिन प्रतिपक्ष को जगह नहीं मिलती, यह कहना गलत है। संतुलन बनाने की दृष्टि से भी मीडिया को यह करना होता है। कई बार पत्रकार खुद एक पक्ष हो जाता है, यह बात जरूर चिंता में डालती है। अगर पार्टियों के प्रवक्ताओं का काम एंकर या पत्रकार ही करने लगेंगें तो हमारे इतने सारे प्रतिभाशाली प्रवक्तागण बेरोजगार हो जाएंगें। कुछ लोगों को अपेक्षित संयम रखने की जरूरत है। यह नहीं होना चाहिए कि मैं मुंह खोलूंगा तो क्या बोलूंगा, यह दर्शक को पहले से पता हो। मैं कोई लेख लिखता हूं तो वह इस उम्मीद से पढ़ा जाए कि आज संजय द्विवेदी ने क्या लिखा होगा। यह नहीं कि मेरी फोटो और नाम देखकर ही पाठक लेख का कथ्य ही समझ जाए कि मैंने क्या लिखा होगा। यह किसी पत्रकार की विफलता है,किंतु सब ऐसे नहीं हैं। बहुलांश में लोग अपना काम अपेक्षित तटस्थता से ही करते हैं। प्रभाष जोशी जी कहते थे- “पत्रकार की पोलिटिकल लाइन होना गलत नहीं है, गलत है पार्टी लाइन होना।”
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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