6000 फीट की बर्फ में मोर:पहाड़ों के लिए खतरे की घंटी

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6000 फीट की बर्फ में मोर:पहाड़ों के लिए खतरे की घंटी

Kullu: हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय संतुलन को लेकर एक चौंकाने वाला संकेत सामने आया है। मनाली के समीप स्थित जगतसुख गांव में लगभग 6000 फीट की ऊंचाई पर बर्फ से ढके जंगलों के बीच मोरों का जोड़ा दिखाई देना सिर्फ एक दुर्लभ दृश्य नहीं, बल्कि बदलते मौसम और पहाड़ों की सेहत पर बड़ा सवाल है। आमतौर पर गर्म और मैदानी इलाकों में रहने वाला यह राष्ट्रीय पक्षी अब ठंडे हिमालयी क्षेत्र में दिख रहा है, जिसे वैज्ञानिक असामान्य मान रहे हैं।

जहां बर्फ होती है, वहां मोर नहीं होते

वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक मोर सामान्यतः 300 मीटर से 1000 मीटर की ऊंचाई तक पाए जाते हैं। कुछ मामलों में वे 1500 मीटर तक देखे गए हैं, लेकिन 1800 मीटर से ऊपर बर्फीले जंगलों में मोरों की मौजूदगी जैव विविधता के स्वाभाविक नियमों के खिलाफ मानी जाती है। जगतसुख क्षेत्र सर्दियों में पूरी तरह हिमाच्छादित रहता है, जहां तापमान शून्य से नीचे चला जाता है।

स्थानीय लोगों के लिए यह शुभ नहीं, बल्कि चिंता का कारण

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने जीवन में पहली बार बर्फ में मोर देखे हैं। ग्रामीणों में चर्चा है कि जब प्रकृति अपने नियम तोड़ने लगे तो यह किसी बड़े बदलाव का संकेत होता है। कुछ लोग इसे अनहोनी से जोड़ रहे हैं, तो कुछ इसे पहाड़ों के बिगड़ते मौसम का परिणाम मान रहे हैं।

वन विभाग की पुष्टि, छह महीने से मौजूद हैं मोर

कुल्लू वन मंडल के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर मोरों की स्थिति का आकलन किया। जांच में यह सामने आया कि दोनों पक्षी स्वस्थ हैं और उड़ान भी सामान्य है। स्थानीय जानकारी के अनुसार यह जोड़ा पिछले छह महीने से इसी इलाके में देखा जा रहा है, जो इस घटना को और गंभीर बनाता है।

● गर्म होते पहाड़, बदलता रहवास

वन्यजीव संरक्षकों का कहना है कि पिछले एक दशक में कुल्लू-मनाली क्षेत्र का तापमान उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। कभी जहां घरों में पंखों की जरूरत नहीं पड़ती थी, आज वहां गर्मी के मौसम में पंखे और कूलर आम हो गए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऊंचाई वाले क्षेत्र अब पहले जैसे ठंडे नहीं रहे, इसलिए मोर जैसे पक्षी यहां खुद को अनुकूल पाते हैं।

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भोजन और दबाव भी हो सकता है कारण

निचले पहाड़ी क्षेत्रों में मोरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। खेतों, जंगलों और मानव बस्तियों के बीच बढ़ते टकराव के कारण भोजन की तलाश में ये पक्षी ऊंचाई की ओर पलायन कर रहे हैं। हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह बदलाव सामान्य नहीं है।

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● पहले भी दिखे संकेत, अब तस्वीर साफ हो रही है

करीब दो वर्ष पहले मनाली के डोभी क्षेत्र में 2000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मोर दिखा था। रायसन और त्रिसादी गांवों के आसपास भी मोरनी देखे जाने की पुष्टि हुई है। इतना ही नहीं, लाल जंगली मुर्गा जैसी प्रजाति, जो सामान्यतः गर्म इलाकों तक सीमित रहती है, अब ऊंचे जंगलों में नजर आ रही है।

124 साल में 1.5 डिग्री बढ़ा हिमाचल का तापमान

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़े इस बदलाव को और मजबूती देते हैं। वर्ष 1901 से अब तक हिमाचल प्रदेश के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। अधिकतम तापमान 2.18 डिग्री तक बढ़ा है, जबकि न्यूनतम तापमान में 0.84 डिग्री की वृद्धि हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यही बदलाव वन्यजीवों के व्यवहार और प्रवास को प्रभावित कर रहा है।

प्रकृति का स्पष्ट संदेश

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह घटना किसी अफवाह या अंधविश्वास का विषय नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर तापमान वृद्धि की यही रफ्तार रही, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की पहचान ही बदल सकती है।

यह सिर्फ मोरों के बर्फ में दिखने की खबर नहीं है, बल्कि यह उस बदलाव की दस्तक है, जिसे अब नजरअंदाज करना पहाड़ों के लिए भारी पड़ सकता है।