PM Visit To RSS Headquarter:मोदी का नागपुर दौरा और अफवाहों का दौर

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PM Visit To RSS Headquarter:मोदी का नागपुर दौरा और अफवाहों का दौर

रमण रावल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय क्या गये देश भर में भिन्न-भिन्न चर्चाओं का दौर शुरू हो गया, जिनमें ज्यादातर अफवाह किस्म की हैं। यही कि अब मोदीजी की सेवा निवृत्ति की उम्र(जन्म 17.07.1950) हो गई तो वे सेवा वृद्धि का आग्रह करने गये थे। भाजपा में 75 वर्ष के बाद राजनीति में पद से हटने का आग्रह रहता है। इसे आधार बनाकर वाकई संचार साधनों के अतिरेक वाले इस दौर में चर्चाकारों को किस्म-किस्म के दौरे पड़ रहे हैं, जिसमें हर एक पूरे अधिकार से यह जंचाने का प्रयास कर रहा है कि उनका आकलन ही सबसे सही है। जो लोग बीती एक शताब्दी की संघ की कार्य प्रणाली और स्वयं सेवकों के अनुशासन व समर्पण का क-ख-ग भी जान पाये होंगे,उनके मन में स्पष्ट होगा कि संघ में ऐसा कुछ नहीं होता, जो इस तरह की चर्चाओं का आधार बने। बहरहाल।

यह सही है कि मोदी का संघ मुख्यालय जाना मात्र औपचारिकता नहीं हो सकता। तब क्या वजह थी? यह जिज्ञासा तो स्वाभाविक है, लेकिन अनुमानों के घोड़े दौड़ाने से सही निष्कर्षों पर पहुंच जायें,इतनी आसान तो संघ की कार्य पद्धति कभी नहीं रही। नरेंद्र मोदी देश में भाजपा के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो पूर्ण बहुमत के साथ लगातार दो बार और सतत तीसरी बार इस पद पर पहुंचे हैं। इसलिये उनकी भूमिका पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री याने अटल बिहारी बाजपेयी से तो बेहद भिन्न रहना ही है। सच तो यह है कि दोनों की कार्य पद्धति, स्वभाव,प्राथमिकता में कोई तुलना संभव ही नहीं। इसलिये जब भी संघ प्रणीत प्रधानमंत्री की बात होगी तो अटलजी व मोदीजी की पृथक संदर्भ के साथ ही होगी। तुलनात्मक अध्ययन तो बेमानी ही होगा।

अटलजी व मोदीजी दोनों ही संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे। मोदीजी 16 वर्ष तक बतौर प्रचारक विभिन्न दायित्व निभाते रहे। उसके बाद भाजपा संगठन से जुड़े। उसके बाद का इतिहास सर्वज्ञात है कि कैसे वे बिना विधायक निर्वाचित हुए गुजरात के मुख्यमंत्री बने और बाद में 2013 में बाकायदा प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित होकर उस पद पर पदारूढ़ भी हुए। उसके बाद से ही विपक्ष सहित समूचे देश और दुनिया के बीच यह संदेश भी गया कि मोदीजी संघ की अपेक्षानुरूप कार्य करेंगे। याने जिस तरह से संघ भारत के लिये सोचता रहा, वैसा करेंगे । यह बहुत कुछ हुआ तो बहुत कुछ करना शेष भी है। जो हुआ, वह डंके की चोट हुआ और एक बूंद खून भी नहीं बहा, जिसकी आशंका से विपक्ष आसमान सिर पर उठाये 65 साल घूमता रहा और दुष्प्रचार भी करता रहा, संघ पर प्रतिबंध लगाता रहा।

अब चूंकि विपक्ष,चर्चाकारों,राजनीतिक विश्लेषकों का एक सीमित वर्ग दरजी की तरह चिंदी लेकर दौड़ पड़ा कि मोदी की बिदाई की बेला आ गई तो वे संघम् शरणम् हो रहे हैं। इस भ्रम को पाले रखने से कोई किसी को नहीं रोक सकता, लेकिन संघ में किसी को अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिये किसी सिफारिश, याचना की आवश्यकता नही होती। फिर, भारतीय जनता पार्टी बिना किसी संदेह के संघ प्रणीत राजनीतिक दल है, लेकिन करीब 74 साल जनसंघ (21 अक्टूबर 1951) व भाजपा(6 अप्रैल 1980) की यात्रा के बाद भाजपा और संघ में स्पष्ट समझ व सहमति बन चुकी है कि किसका कहां हस्तक्षेप होगा, कहां नहीं । नियमित कार्यों में हस्तक्षेप न तो संभव है, न वह होता है। इसलिये, यह संभावना तो सिरे से खारिज करने लायक ही है कि मोदीजी का संघ मुख्यालय दौरा सेवा वृद्धि के लिये था। संघ में ऐसा करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है। मुझे नहीं लगता कि मोदीजी जैसे एक निष्णात,अनुभवी,समर्पित पूर्व प्रचारक के लिये इतनी-सी बात समझना मुश्किल रहा होगा।

मोदीजी के इस दौरे को लेकर यदि अनुमान का रथ दौड़ाना ही है तो आने वाले दिनों में इसका स्वरूप सामने आ ही जायेगा। चूंकि संघ-भाजपा की मान्यताओं के अनुसार अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये जाने हैं तो इसका सिलसिला प्रारंभ हो सकता है। तब आप कह सकते हैं कि मोदीजी इसलिये गये थे। अभी तो उनका जाना देश-दुनिया और विशेषकर विपक्ष को यह स्ष्ट संदेश देना हो सकता है कि वे अब भी संघ के निष्ठावान स्वयं सेवक हैं, जिसे बताने-प्रचारित करने में उन्हें कोई परहेज नहीं है। यह ठीक उसी तरह से है कि जिस तरह से शैशव अवस्था से युवावस्था की दहलीज पर पहुंचने तक अभिभावक अपनी संतान का मार्गदर्शन करते हैं,उसे जीवन की बारीकियां बताते हैं। खतरों,चुनौतियों से सचेत करते हैं। वैसा ही संघ भी राजनीति या तमाम अनुषंगी संगठनों में कार्यरत स्वयं सेवकों को बताता भी हैं। फिर,एक सीमा के बाद सभी को अपने दायित्व के निर्वहन की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सर संघ चालक मोहन भागवत को न तो किसी को यह दर्शाने की आवश्यकता है कि मोदीजी उनके अधीन हैं या उनके इशारों पर ही काम करते हैं या वे उन्हें कभी-भी हटा सकते हैं या सेवा वृद्धि की सहमति दे सकते हैं। इतनी आसान-सी बात जो देश भर के अफवाहनशीनों को, प्रचार तंत्र के कलपुर्जों को, बतकही को अपनी खुराक समझने वालों को दिखाई दे रही है, यदि संघ की ऐसी ही कार्य पद्धति होती तो संघ व भाजपा वहां नहीं होते, जिस शिखर पर आज है।