Friday, December 13, 2019
9 अगस्त को भारत बंद में 2 अप्रैल से भी ज्यादा हिंसा होगी, क्या पासवान का यह कथन लोकतांत्रिक है?

9 अगस्त को भारत बंद में 2 अप्रैल से भी ज्यादा हिंसा होगी, क्या पासवान का यह कथन लोकतांत्रिक है?

मीडियावाला.इन। दिल्ली। नरेन्द्र मोदी की केन्द्र सरकार को समर्थन देने वाली लोकजन शक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान के सांसद पुत्र चिराग पासवान ने स्पष्ट कहा है कि दलित वर्ग के 9 अगस्त के भारत बंद में गत 2 अप्रैल को हुए बंद से भी ज्यादा हिंसा होगी। क्योंकि सरकार ने अभी तक भी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की है, जिसमें एससीएसटी वर्ग के लोगों के अधिकारों में कटौती की गई है। चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा है, जिसमें जस्टिस एके गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन के पद से बर्खास्त करने की मांग की गई है। पासवान का कहना है कि जस्टिस गोयल ने ही सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए एससीएसटी के अधिकारों में कटौती का फैसला दिया था। पासवान का यह भी कहना है कि संसद के मानसून सत्र में ही संशोधित विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करवा दिया जाए। पासवान की इस भावना के साथ दलित समाज के सभी सांसद, विधायक, मंत्री हैं। माना जा रहा है कि यदि 9 अगस्त से पहले पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की कार्यवाही नहीं हुई तो भारत बंद के दौरान जमकर हिंसा होगी।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या  दलित के नाम पर आप देश में कुछ भी करेंगे। कानून व्यवस्था का मखौल उड़ाएंगे। सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेंगी। दलित आदिवासियों के अलावा बाकी आबादी चुप रहेगी। और भी बहुत सारे प्रश्न दिमाग में तैर रहे है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

असल में एक जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि एससीएसटी वर्ग का कोई व्यक्ति सामान्य वर्ग के व्यक्ति के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत पुलिस थाने में करता है तो पुलिस किसी भी प्रकार की जांच से पहले आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी की लम्बे समय तक जमानत भी नहीं होती। इस कानून में अग्रिम जमानत का प्रावधान भी नहीं है। जबकि अदालत में सुनवाई के दौरान अधिकांश मामलों में शिकायकर्ता ही मुकर जाता है। अधिकांश मामलों में आरोपी बरी होते हैं। इसलिए शिकायत प्राप्त होने के बाद पुलिस को पहले प्राथमिक जांच करनी चाहिए। इस याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि शिकायत की जांच उच्च अधिकारी से करवाई जावे। सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उन्होंने एससीएसटी के कानून में कोई बदलाव नहीं किया है। कानून में गिरफ्तारी से लेकर सजा तक के जो प्रावधान है उसे कायम रखा है। 

कौन सुनेगा सामान्य वर्ग कीः

पूरे देश ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ गत 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान जमकर हिंसा हुई। न केवल तोड़ फोड़ की गई, बल्कि राह चलते लोगों को बुरी तरह पीटा गया। यहां तक कि सरकारी सम्पत्ति को भी नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस ने हिंसा के आरोपियों के विरुद्ध जो मुकदमे दर्ज किए उन सभी को राजस्थान सहित सभी सरकारों ने वापस ले लिया। बंद के दौरान जो सरकारी अधिकारी कर्मचारी हड़ताल पर थे, उन्हें भी ड्यूटी पर मान लिया गया। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला वापस ले ले। इसके लिए सरकार के अटाॅर्नी जनरल ने चीफ जस्टिस से भी आग्रह किया है। यह सही है कि एससीएसटी वर्ग के अधिकारों में कोई कटौती नहीं हो सकती। किसी भी राजनीतिक दल में इतनी हिम्मत नहीं कि वह कटौती के बारे में सोच सकें। लेकिन सवाल यह भी है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामान्य वर्ग की कौन सुनेगा? जब दहेज प्रताड़ना के मामले में एससी एसटी वर्ग के किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति पर आरोप लगता है तो प्राथमिक जांच की बात कही जाती है। क्या यही भावना इस वर्ग की शिकायत पर लागू नहीं होनी चाहिए?

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