Monday, December 09, 2019
कटारे को श्रीलाल शुक्ल 'इफ्को' सम्मान

कटारे को श्रीलाल शुक्ल 'इफ्को' सम्मान

मीडियावाला.इन।

मेरे पास खुश होने के अवसर आते-जाते रहते हैं ,लेकिन आज मै बहुत अधिक खुश हूँ क्योंकि अग्रज लेखक महेश कटारे को इस वर्ष के श्रीलाल शुक्ल इफ्को सम्मान से अलंकृत किये जाने की खबर आ गयी है ।अब्बल तो श्रीलाल शुक्ल मेरे प्रिय लेखक हैं इसलिए उनके नाम से स्थापित सम्मान ही मुझे प्रिय लगता है लेकिन ये सम्मान मेरे प्रिय साथी को मिल रहा है इसलिए मै बहुत खुश हूँ ।
कथाकार महेश कटारे का और मेरा साथ कोई 45  साल पुराना है।वे तब 26  के थे और मै 16  वर्ष का ।मैंने उन्हें कथाकार बनते देखा और उन्होंने मुझे पत्रकार और कथित रूप से गजलकार बनते ।हम दोनों एक-दुसरे की रचना प्रक्रिया के साक्षी हैं इसलिए इस नए सम्मान की घोषणा से जितना ज्यादा मुदित कटारे जी होंगे उससे कहीं ज्यादा मुदित मै हूँ ।इस पुरस्कार के साथ मेरे प्रिय लेखक का नाम और साथ में 11  लाख रूपये की रकम का जुड़ा होना भी मेरी प्रसन्नता का कारण है। प्रसन्नता इसलिए की ये रकम कटारे के शेष जीवन के लिए बहुत काम आएगी ,क्योंकि उन्हें पेंशन नहीं मिलती ।कटारे पेशे से शिक्षक  और जन्म से किसान हैं ।
महेश कटारे की रचना प्रक्रिया और उनकी जीवन शैली को जानने वाले जानते होंगे कि वे सचमुच के लेखक हैं और ऐसे लेखक हैं जो अहमन्यता से कोसों दूर हैं ।नदी किनारे बेस मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव बिल्हेटी [ग्वालियर] में जन्मे महेश कटारे का देश के राष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी पहचान बना लेना कोई आसान काम नहीं है ।वे जितने खांटी के अध्येता हैं उतने ही खांटी के लेखक ,लेखक के साथ उनका शिक्षक होना भी उनकी सबसे बड़ी पूँजी है अन्यथा उनका परिवेश उन्हें लेखक बनने की इजाजत नहीं देता ।कटारे ने आरम्भ में कहानियां लिखीं और उनका पहला कहानी संग्रह 'समर शेष है 'जब छप कर आया तब हमें यकीन ही नहीं होता था कि वे सचमुच एक लेखक के रूप में स्थापित होने जा रहे हैं ।
हम दोनों साइकिल पर सवार होकर लश्कर से मुरार तक तुकें मिलाते जाते थे।वे मेरी रचना प्रक्रिया के गवाह थे और मै उनकी रचना प्रक्रिया का। महेश कटारे की कहानियों के अनेक पात्र हमारे जाने-पहचाने होते थे ।वे स्कूल में पढ़ते रहे और खुद पढ़ते-लिखते रहे।ये प्रक्रिया सतत बनी रही ।अनेक बाधाओं के बावजूद कभी उनका पढ़ना-लिखना रुका नहीं ।इसी लेखन -पाठन के बीच उन्होंने अपने लिए प्रगतिशील लेखन धारा को चुना और फिर निरनतर आगे बढ़ते चले गए,कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं या देखने का अवसर नहीं मिला ।ऐसा कम ही होता है और कम लोगों के साथ होता है ।
महेश कटारे ने जमकर कहानियां लिखीं,उनके अनेक कहानी संग्रह जैसे -'समर शेष है, इतिकथा - अथकथा, मुर्दा स्थगित, पहरुआ, छछिया भर छाछ आये,उन्होंने  नाटक भी लिखे जैसे -'महासगर का साक्षी, अँधेरे युगांत के',वे यात्रा वृत्तांत लिखने से भी नहीं चुके और 'पहियों पर रात-दिन'लिख बैठे लेकिन उन्होंने जो सबसे बड़ा और यादगार काम किया वो था राजा भरथरी पर दो खंडो का उपन्यास -'कामनी काय कांतारे ',उपन्यास तो उन्होंने और भी लिखे किन्तु कामनी काय कांतारे ने उन्हें एक नयी स्थापना दी ।कटारे के हिस्से में अनेक सम्मान आये  जिनमें -'सारिका सर्व भाषा कथा पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार, गजानन माधव मुक्तिबोध पुरस्कार, सुभद्रा कुमार चौहान कथा पुरस्कार, शमशेर सम्मांन, चक्रधर सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार की यद् तो मुझे भी है ।

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।