SC/ST Act: सामाजिक न्याय या कानूनी आतंक?

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SC/ST Act: सामाजिक न्याय या कानूनी आतंक?

वरिष्ठ पत्रकार के के झा की खोजपरक रिपोर्ट

हरिनगर, बिहार के दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र का एक ब्राह्मण-बहुल गाँव, आज किसी सांप्रदायिक या जातीय संघर्ष के कारण नहीं, बल्कि एक कानून के प्रयोग और दुरुपयोग के कारण राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम—जिसे सामाजिक न्याय का सबसे सशक्त औज़ार माना जाता है—इसी गाँव में भय, पलायन और सामाजिक विघटन का कारण बनता दिख रहा है।

इस गाँव के लगभग 70 ब्राह्मणों को SC/ST एक्ट में नामजद किया गया है, जबकि 100 से 150 अज्ञात लोगों को भी एफआईआर में शामिल कर लिया गया। नतीजा यह हुआ कि गिरफ्तारी की आशंका से गाँव के अधिकांश पुरुष घर छोड़कर चले गए। पीछे रह गईं महिलाएँ, बुजुर्ग और युवतियाँ—डर, असुरक्षा और अनिश्चितता के साए में। गाँव में पुलिस बल की तैनाती है, शांति समिति की बैठकें हो रही हैं, लेकिन न्याय कहीं दिखाई नहीं देता।

मजदूरी विवाद से ‘अत्याचार’ तक

पुलिस स्वयं यह स्वीकार कर चुकी है कि पूरा विवाद एक पुराने मजदूरी झगड़े से शुरू हुआ। विवाद के दो पक्ष हैं—एक ब्राह्मण और दूसरा पासवान समुदाय का। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि मामला आपराधिक अत्याचार से अधिक एक स्थानीय सामाजिक-आर्थिक टकराव का था।

इसके बावजूद SC/ST एक्ट के प्रयोग ने इस विवाद को एकतरफा बना दिया—जहाँ एक पक्ष स्वतः अपराधी और दूसरा स्वतः पीड़ित मान लिया गया। यह भी सामने आया है कि कई ऐसे ब्राह्मणों पर एफआईआर दर्ज की गई जो घटना के समय गाँव में मौजूद ही नहीं थे। इससे कानून की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

विडंबना यह है कि प्रारंभिक मारपीट एक ब्राह्मण के साथ हुई थी। ब्राह्मणों को गाली-गलौच और हिंसा का सामना करना पड़ा। उन्होंने भी शिकायत दर्ज कराई थी और उस पर एफआईआर भी हुई। लेकिन उनके पास SC/ST एक्ट जैसा कोई ‘कवच’ नहीं था। यही इस पूरे प्रकरण की केन्द्रीय विडंबना है—कानून की असमान शक्ति।

पुलिस की विवशता या प्रणाली की विफलता?

स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब पुलिस जानती है कि मामला मजदूरी विवाद से जुड़ा है, तो क्या SC/ST एक्ट जैसे अत्यंत कठोर कानून का प्रयोग अपरिहार्य था? पुलिस ‘कानूनी बाध्यता’ का हवाला देती है, लेकिन यह बाध्यता चयनात्मक क्यों दिखती है?

यदि यही घटना उलटी होती—यदि ब्राह्मण टोले पर पासवानों के समूह ने हमला किया होता—तो क्या उसी कठोरता से कार्रवाई होती? अनुभव और व्यवस्था का व्यवहार बताता है कि उत्तर ‘नहीं’ है। यही ‘नहीं’ संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और न्याय के सिद्धांत को खोखला करता है।

जब कानून स्थायी पीड़ित और स्थायी अपराधी तय कर दे

SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का जन्म सामाजिक न्याय की भावना से हुआ। इसका उद्देश्य सदियों से उत्पीड़न झेल रहे समाज को सुरक्षा देना था। लेकिन हरिनगर जैसे मामले बताते हैं कि यह कानून कई बार संरक्षण का नहीं, बल्कि दुरुपयोग का औज़ार बन जाता है।

यह कोई छुपा हुआ सत्य नहीं है। अदालतें जानती हैं, पुलिस जानती है, समाज जानता है। फिर भी कानून बनाने वाले मौन क्यों हैं? कारण स्पष्ट है—राजनीतिक लाभ और दबाव की राजनीति। लेकिन इतिहास गवाह है कि मौन रहने वाली राजनीति न तो मजबूत होती है, न न्यायपूर्ण।

कानून की विशेषता ही उसकी सबसे बड़ी समस्या

SC/ST एक्ट की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं—

तत्काल गिरफ्तारी

जमानत पर कठोर रोक

शिकायत को प्रथम दृष्टया सत्य मानना

ये प्रावधान पीड़ित की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। लेकिन व्यवहार में यह कानून व्यक्तिगत रंजिश, भूमि विवाद, ठेके, नौकरी, और राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार बन चुका है।

बरी होना भी जीवन नहीं लौटा पाता

इस दुरुपयोग की कीमत केवल कानूनी नहीं, मानवीय भी है।

विष्णु तिवारी का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है। भूमि विवाद में SC/ST एक्ट के तहत फँसाए गए विष्णु तिवारी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरी किया, लेकिन तब तक वे 20 वर्ष जेल में काट चुके थे। माता-पिता और भाई सब गुजर चुके थे। वे अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सके।

इसी तरह लाल सिंह को गेहूँ पिसाई के पैसे के विवाद में इस कानून के तहत फँसाया गया। राजस्थान हाई कोर्ट से बरी होने में उन्हें 32 साल लग गए। सवाल यह है कि बरी होने के बाद क्या कोई उनका खोया हुआ जीवन लौटा सकता है?

सवाल उठाना अपराध नहीं

इन मामलों पर प्रश्न उठाने वालों को अक्सर ‘संवेदनहीन’ या ‘सवर्ण वर्चस्ववादी’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन न्याय की बुनियाद ही सवालों पर टिकी होती है। बिना सवाल के कोई कानून न्यायपूर्ण नहीं रह सकता।

2018 का सुप्रीम कोर्ट फैसला और दबाव की राजनीति

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई और प्रारंभिक जाँच का सुझाव दिया। इसके विरोध में संगठित दबाव खड़ा हुआ। अदालत को ‘दलित विरोधी’ बताया गया और सरकार को संशोधन कर कोर्ट के निर्देशों को निष्प्रभावी करना पड़ा।

आज यही पैटर्न अन्य मामलों में भी दिखता है—जहाँ तर्क और संतुलन की जगह भावनात्मक दबाव और राजनीतिक शोर निर्णय तय करता है।

न्याय का अर्थ संतुलन है, पक्षपात नहीं

भेदभाव एक कटु सत्य है और उससे बचाने के लिए कठोर कानून जरूरी हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर शिकायत सच्ची नहीं होती और हर आरोपित अपराधी नहीं होता। यदि कानून निर्दोष को भी अपराधी की तरह ट्रीट करे, तो वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक बन जाता है।

समाधान क्या है?

यह लेख SC/ST एक्ट को समाप्त करने की माँग नहीं करता। लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहता है कि—

झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई हो

प्रारंभिक जाँच का प्रावधान बहाल किया जाए

पुलिस को विवेकाधिकार मिले

कानून को राजनीतिक हथियार बनने से रोका जाए

भारतीय परंपरा में न्याय को धर्म कहा गया है। न्याय अंधा नहीं, विवेकशील होता है। जो कानून विवेक खो दे, वह धर्म नहीं, दंड बन जाता है।

अंतिम बात

यदि पासवान टोले पर ब्राह्मणों के हमले पर SC/ST एक्ट लागू होता है, तो उससे पहले ब्राह्मण पर पासवानों के हमले पर भी उतनी ही गंभीर धाराएँ लगनी चाहिए थीं। यही समानता है। यही न्याय है।

SC/ST एक्ट पर सवाल उठाना अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। क्योंकि न्याय का उद्देश्य बदला नहीं, संतुलन होता है।

और जो कानून निर्दोष को भी अपराधी बना दे—वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक होता है।