SC-ST-OBC conference: मुद्दों से भटकी बहस, विवादित भाषा ने बढ़ाया राजनीतिक ताप

65

SC-ST-OBC conference: मुद्दों से भटकी बहस, विवादित भाषा ने बढ़ाया राजनीतिक ताप

BHOPAL: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रविवार को आयोजित एससी-एसटी-ओबीसी संगठनों के संयुक्त सम्मेलन ने सामाजिक न्याय, आरक्षण और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों के बजाय विवादित बयानों और अमर्यादित भाषा के कारण प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया। भेल दशहरा मैदान में हुए इस सम्मेलन में जहां हजारों लोग अपनी संवैधानिक मांगों को लेकर जुटे, वहीं मंच से दिए गए कुछ बयानों ने पूरे आयोजन की दिशा और उद्देश्य पर सवाल खड़े कर दिए।

 

● सम्मेलन का उद्देश्य और आयोजन की पृष्ठभूमि

एससी-एसटी-ओबीसी संगठनों के संयुक्त मोर्चा द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में प्रदेशभर से लगभग 10 हजार से अधिक लोग शामिल हुए। ओबीसी महासभा, आजाद समाज पार्टी, भीम आर्मी, जयस सहित कई संगठनों के नेता मंच पर मौजूद रहे। सम्मेलन का घोषित उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना था।

● रोजगार और आरक्षण से जुड़ी प्रमुख मांगें

सम्मेलन में तीन लाख बैकलॉग पदों पर तत्काल भर्ती, ओबीसी वर्ग के होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पदों को बहाल करने और ओबीसी को 52 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने जैसी मांगें प्रमुख रूप से उठाई गईं। वक्ताओं ने कहा कि लंबे समय से संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद इन वर्गों को उनका पूरा अधिकार नहीं मिल पा रहा है।

● आईएएस संतोष वर्मा प्रकरण और सम्मेलन की अहम मांग

सम्मेलन का एक प्रमुख बिंदु आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा से जुड़ा मामला रहा। वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि संतोष वर्मा अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं और उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। मंच से यह आरोप लगाया गया कि पूर्व में उनके एक बयान को लेकर जिस तरह का विरोध हुआ, वह सामाजिक दबाव और वर्गीय मानसिकता का परिणाम है। गौरतलब है कि संतोष वर्मा द्वारा पूर्व में ब्राह्मण समाज की बेटियों को लेकर की गई टिप्पणी के बाद प्रदेश में विरोध हुआ था। ब्राह्मण समाज ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी और इस मामले में प्रदेश सरकार स्तर पर भी सख्त प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। रविवार के सम्मेलन में वक्ताओं ने इसी पृष्ठभूमि में कहा कि संतोष वर्मा को निशाना बनाना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

● धार्मिक हस्तियों को लेकर बयानबाज़ी से बढ़ा विवाद

सम्मेलन के दौरान बहस का रुख अचानक धार्मिक कथावाचकों और संतों की ओर मुड़ गया। छतरपुर जिले के चांदला से भाजपा के पूर्व विधायक आरडी प्रजापति ने मंच से जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य के एक पुराने वीडियो का हवाला देते हुए तीखी और व्यक्तिगत टिप्पणी की।

उन्होंने कथावाचकों द्वारा महिलाओं को लेकर दिए गए कथित बयानों पर आपत्ति जताई, लेकिन विरोध की भाषा इतनी आक्रामक रही कि उसने सार्वजनिक मर्यादा की सीमाएं लांघ दीं। मंच से दिए गए इन बयानों पर सभा स्थल पर मौजूद लोगों के बीच भी असहजता देखी गई।

● धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर भी तीखा हमला

दलित पिछड़ा समाज संगठन के संस्थापक दामोदर यादव ने कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर भी मंच से अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने शास्त्री द्वारा किए गए चमत्कारों के दावों पर सवाल उठाते हुए व्यक्तिगत टिप्पणी की और उनके धार्मिक प्रभाव पर तंज कसा।

● मुद्दे पीछे, बयान आगे

सम्मेलन में रोजगार, आरक्षण और बैकलॉग भर्ती जैसे गंभीर और नीतिगत मुद्दे मौजूद थे, लेकिन मंच से दिए गए विवादित बयानों ने इन मांगों को पूरी तरह पृष्ठभूमि में धकेल दिया। चर्चा का केंद्र सामाजिक न्याय से हटकर व्यक्तियों, धार्मिक पहचान और बयानबाज़ी पर आ गया।

● राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

सम्मेलन के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई वर्गों ने कहा कि लोकतांत्रिक मंचों पर विरोध और असहमति जरूरी है, लेकिन भाषा की मर्यादा टूटने से आंदोलन की गंभीरता और विश्वसनीयता कमजोर होती है। कुछ संगठनों ने सम्मेलन के उद्देश्य से भटकने पर भी सवाल उठाए।

● प्रशासनिक स्तर पर स्थिति

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रशासन या पुलिस की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। न तो किसी शिकायत के पंजीकरण की पुष्टि हुई है और न ही किसी कानूनी कार्रवाई की जानकारी सामने आई है।

● क्या संकेत देता है यह पूरा घटनाक्रम

भोपाल का यह सम्मेलन एक बड़ा संकेत देता है कि जब सामाजिक आंदोलनों में संयम और दिशा कमजोर पड़ती है, तो असली मुद्दे दब जाते हैं। सामाजिक न्याय की लड़ाई तभी प्रभावी हो सकती है, जब भाषा मर्यादित हो, तथ्य स्पष्ट हों और फोकस अधिकारों पर बना रहे, न कि विवादों पर।