
वरिष्ठ पत्रकार रमण रावल का पहला काव्य संग्रह- सुनो, तुमने शांति को कहीं देखा है?’
डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
वरिष्ठ पत्रकार रमण रावल का पहला काव्य संग्रह आ गया है, जिसका नाम है- ‘सुनो, तुमने शांति को कहीं देखा है?’
काव्य संग्रह की भूमिका में रमण रावल बेहद साफगोई से लिखते हैं कि पत्रकारिता करते हुए 46 वर्ष हो गए। पत्रकारिता हो या कविता, गीत, निबंध, शेरो – शायरी लेखन, ये सभी साहित्य की एक विधा है। तो मैंने भी कविता लेखन का प्रयास कर डाला। कविता यानी छंद और और तुकबंदी होती है।
कुछ विद्वान मानते हैं, कि इसके बिना भी कविता हो सकती है। जिसमें भाव हो, संदेश हो, जो मानव मन के दर्द, खुशी, तड़प, आनंद या किसी भी तरह के विचार का प्रतिनिधित्व करती हो, जो प्राणी मात्र के क्रियाकलापों को रेखांकित करती हो – वह कविता होती है। मैंने अपने मन के भावों को रेखांकित करते हुए कुछ पंक्तियां कविता के तौर पर लिखने का प्रयास किया है. वह वास्तविक अर्थों में कविता है भी या नहीं, यह हमें सचमुच नहीं जानता।
रमण रावल में यह काव्य संग्रह अपनी धर्मपत्नी रेखा रावल, पुत्री और दामाद श्यामसलोनी और उत्सव तथा बेटे अक्षत और बहू कविता को समर्पित किया है।
इस संग्रह में 1981 से लेकर अब तक लिखी गई रमण रावल की कविताएं संकलित है। उनकी कविताएं एक तरह से उनका पत्रकारीय वक्तव्य भी है। कविताओं के शीर्षक हैं – ख़ाक छानते हैं, बदहाल है सड़क, जीवन की परिभाषा, सपनों के सौदागर, उनकी औकात, जिंदगी, निष्कर्ष, लोग, चुनाव आ गए, घुमक्कड़, अभिव्यक्ति, भूख, तलाश, भलमनसाहत, ये भी दिवाली है, सुनो – तुमने शांति को कहीं देखा है?, मनुष्य की फितरत, शीशे से दोस्ती, फितरत, सोच का फर्क, कोरोना में जो मैंने देखा, कुछ अपना सा, इस हाथ दे उस यहहाथ ले, शायरी तो नहीं है, परी हो तुम, भेरू, हे सखी वे कह कर तो जाते, राह के पत्थर, हस्ताक्ष, वजूद, खामखा, इतना सोचना भी क्यों? नदी के किनारे, समूचा संसार है…, सवाल और सवाल, जीवन और मौत भूलभुलैया है, हल्ला सच ही जंचता है, चलाचली की बेला है, चमचागीरी की बातें करते हैं, मैं कभी था ही नहीं, तेरा क्यों यह हाल है, यह कविता नहीं भारतीयों के मन का भाव है, सुनो बे भाड़े के टट्टुओं, कुछ ना होना, जो ताजिंदगी करते हैं मन्नतें, राम में प्राण बसते हैं, रजामंदी जरूरी तो नहीं, कोई कद्र नहीं करता, सबसे सस्ता शौक, चल मेरे साथ चल, अकेला हूं, मैं जो होना था वह तो है होना, गौरैया, झांकों अपने भीतर, आज फिर जीने की तमन्ना है, भूल जा सब जकड़न, किसी पर यकीं आएगा या नहीं, दिलों में रहते नहीं दिलबर, ज्यादा दखल ना दें पंडित- काजी, ताकतवर का कमजोर पर प्रहार, जीवन में जरूरी है बस एक बसेरा और अंतिम कविता है फर्क।
रमण रावण की ये रचनाएं गद्य की तरह ही है। ये कवितायें लिखने के क्रम से प्रकाशित की गई है। वे अपने समाज की, अपने समय की और अपनी बात करती हैं. सुनो, तुमने शांति को कहीं देखा है एक लंबी कविता है जिसमें शांति के बारे में वैश्विक प्रयासों और घटनाक्रमों की चर्चा है।
जिस तरह रमण रावल ने पत्रकारिता के क्षेत्र में झंडा गाड़ा है, उम्मीद है कि वे कविता के चित्र में भी वैसे ही झंडा गाड़ेंगे।
*मीडियावाला परिवार की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं कवि रमण रावल को।*





