Immature love: कच्ची उम्र का उथला “प्रेम”, सेक्स,ब्लैकमेल और धोखा

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Immature love:कच्ची उम्र का उथला “प्रेम”, सेक्स,ब्लैकमेल और धोखा

 घर का धार्मिक वातावरण बचाता है बच्चों और किशोरों को बुरी नजरों से!

वेद माथुर

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विजयनगर ब्लैकमेल कांड ने अजमेर के ब्लैकमेल कांड के घाव फिर से हरे कर दिए जिसमें दर्जनों युवतियों को इसलिए आत्महत्या करनी पड़ी कि उनके दूसरे समुदाय के तथाकथित प्रेमियों ने उनका यौन शोषण, उपयोग एवं ब्लैक मेलिंग करने के बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया।
कच्ची उम्र का कथित प्रेम युवक युवतियों में किशोरावस्था में होने वाले हार्मोन परिवर्तन, अपरिपक्वता और बिना परिश्रम सुख खोजने के कारण होता है।
यह ठीक है कि किशोरावस्था में हार्मोन परिवर्तन के कारण अचानक विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण हो जाता है। बहुत सी युवतियां ऐसी भी होती हैं जो निम्न मध्यमवर्गीय या निम्न परिवारों से आती हैं और अमीर युवकों की ओर आकर्षित हो जाती हैं और इस “प्रेम कहानी” का अंत लोकल अखबार में आत्महत्या की खबर की से होता है।
इस उठने प्रेम में पड़ने से युवक-युवतियों का ध्यान पढ़ाई से हट जाता है और उनमें यह लक्षण दिखाई देने लगते हैं:
सारा दिन बिस्तर पर पड़े रहना,
बार बार रोना,
चिड़चिड़ापन,
मोबाइल का अत्याधिक उपयोग,
क्रोध और आक्रामकता प्रदर्शित करना,
खुद को नुकसान पहुंचाना और/या आत्मघाती विचार
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कच्ची उम्र का यह तथाकथित प्रेम ‘क्रश’ से शुरू होता है और यह कथित प्रेम डेटिंग, लिव इन रिलेशनशिप के रास्ते हुआ अक्सर ब्रेकअप तक पहुंच जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ता है और अक्सर कोई जिंदगी बर्बाद हो जाती है। आखिर समाधान क्या है?
मेरा सुझाव है कि :
अपने बच्चों को समय-समय पर अच्छे साहित्य और अपने संक्षिप्त विचारों के माध्यम से मानसिक रूप से परिपक्व बनाएं।
अपने बच्चों से अधिक से अधिक संवाद करें। बच्चों के साथ नियमित संवाद से विश्वास का एक ऐसा सेतु बनना चाहिए कि वह हरदम अपने अभिभावकों और परिवारजनों की बात पर विश्वास रखें ना कि बाहर किस्तों पर ली गई मोटरसाइकिल पर घूमते आवारा लड़कों पर! उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने दें।
बच्चों को नियमित रूप से योगा और व्यायाम के लिए प्रेरित करें।
बच्चों के सामने माता पिता झगड़ा तो दूर बहस भी ना करें।
बच्चों की भावनाओं और उनकी रुचियों का भी आदर करें हर समय सिर्फ भाषण ही भाषण ना दें।
यह सुनिश्चित करें कि उनके मित्र सुसंस्कृत और सम्मानित परिवारों से हैं।
उन्हें जीवन में करियर, कठोर परिश्रम और सफलता का महत्व बताएं।
घर का वातावरण धार्मिक होना चाहिए भले ही आप सुबह दस मिनट ही सही, पर घर में भजन सुनें और शाम को आरती करें। बच्चों को इस प्रक्रिया में इंवॉल्व करें।
दिन-रात धन और अपने खुद के करियर के पीछे भागने के बजाय बच्चों पर भी पर्याप्त ध्यान दें।
व्हाट्सएप,इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस युग में बच्चों को सही रास्ते पर चलाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हैं। उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बनाना अभिभावकों और अध्यापकों दोनों की जिम्मेदारी है।
इस संबंध में आपके मन में कोई प्रश्न हो तो आप कर सकते हैं !!
फोटो : प्रतीकात्मक