
महंगी हुई चांदी ने फीकी की भगोरिया की चमक: पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी समाज की परंपराओं पर असर
बड़वानी/खरगोन : पश्चिमी मध्य प्रदेश के भील, भिलाला और बारेला आदिवासी समुदायों में चांदी केवल धातु नहीं, बल्कि पहचान, परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। पीढ़ियों से इन समुदायों ने सोने की बजाय चांदी को प्राथमिकता दी है। लेकिन इस वर्ष चांदी की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने भगोरिया जैसे पारंपरिक त्योहार की रौनक को फीका कर दिया ।
स्थानीय स्वर्णकार स्वप्निल सोनी, जिनका परिवार करीब सात दशक से आदिवासी ग्राहकों से जुड़ा है, बताते हैं कि इस सीजन में चांदी के गहनों की मांग में भारी गिरावट आई है।
उन्हीने बताया “पिछले साल तिवारिया बाजारों के दौरान क्षेत्र में करीब पांच क्विंटल चांदी के गहने बिके थे। इस बार बिक्री एक क्विंटल से भी कम रही है। भगोरिया हाट में तो पूछताछ तक नहीं के बराबर है।
तिवारिया बाजार, जो भगोरिया से लगभग एक सप्ताह पहले लगते हैं, आदिवासी समाज के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इन्हीं बाजारों में वे पारंपरिक गहने, कपड़े, बर्तन और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदते हैं। लेकिन इस बार बाजारों में वह उत्साह दिखाई नहीं दिया, जो पहले हुआ करता था।
सेंधवा के स्वर्णकार चंचल सोनी और राजपुर के ओम सोनी के अनुसार, परंपरागत रूप से आदिवासी परिवार त्योहारों और शादियों में सिर से पांव तक 31 प्रकार के चांदी के गहने पहनते हैं। महिलाएं भगोरिया, इंदल, दिवाली और होली जैसे अवसरों पर 5 से 8 किलोग्राम तक वजनी गहनों से खुद को सजाती हैं। ये गहने न केवल सौंदर्य का प्रतीक हैं, बल्कि समृद्धि, गर्व और सांस्कृतिक निरंतरता का भी संदेश देते हैं।
बारेला समुदाय में चांदी का धार्मिक महत्व भी विशेष है। समुदाय की कुल देवी देवमोगरा देवी को चांदी के गहने और वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसी आस्था के कारण लोग सोने की बजाय स्वयं भी चांदी धारण करना पसंद करते हैं। आदिवासी मामलों के जानकार डॉ. रेलाश सेनानी बताते हैं कि ऐतिहासिक रूप से चांदी अपेक्षाकृत सस्ती और सुरक्षित मानी जाती रही है। दूर-दराज के वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए सोना महंगा और जोखिमपूर्ण विकल्प होता है, जबकि चांदी रफ टफ, टिकाऊ और व्यवहारिक रही।
वे बताते हैं कि आदिवासी सगाई की रस्म “जोड़ावनी” में दुल्हन को एक से पांच किलो तक चांदी उपहार में दी जाती है। एक सामान्य दुल्हन के गहनों के संग्रह में सिर से लेकर पैर तक के अलग-अलग आभूषण शामिल होते हैं। आम तौर पर महिलाएं केवल नाक की सोने की अंगूठी पहनती हैं, शेष सभी गहने चांदी के होते हैं।
प्रचलित गहनों में मोटी पायल (कड़ी), वाकला, पिंजने, बाजूबंद (वाला, वहाला, बहतिया, हेपला), कमरबंद (कुरदुड़ा), छिबड़ा (सिक्कों का हार), तगली और पटली जैसे हार शामिल हैं। पुरुष भी चांदी के कड़े पहनते हैं, जबकि संपन्न पुरुष कभी-कभी सोने के झुमके (गोखरू) धारण करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर लोग जर्मन सिल्वर जैसे सफेद मिश्रधातु का विकल्प चुनते हैं।
समाजशास्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. एमएल वर्मा ‘निकुंज’ का कहना है कि चांदी पहनना एक पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है। “सोना बड़ी मात्रा में रखना न केवल महंगा, बल्कि असुरक्षित भी रहा है। चांदी उनके जीवन की व्यावहारिक जरूरतों से जुड़ी रही है,” वे बताते हैं। वे यह भी जोड़ते हैं कि परंपरागत रूप से विधवा होने के बाद महिलाएं गहने धारण नहीं करतीं।
हालांकि, अब चांदी की कीमतों में आई उछाल ने सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कीमतें करीब 2.5 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई हैं। जोबट विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक सेना महेश पटेल ने भी यह मुद्दा उठाते हुए कहा था कि आदिवासी समाज में विवाह के अवसर पर दुल्हन को दो से तीन किलो चांदी देना सामाजिक परंपरा है, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवार शादियों का खर्च उठाने में असमर्थ हो रहे हैं।
जहां पहले चांदी आर्थिक सुरक्षा का माध्यम मानी जाती थी, वहीं अब वही परंपरा कई परिवारों पर बोझ बनती दिख रही है। फिर भी, आदिवासी समाज में चांदी का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व कम नहीं हुआ है। यह केवल आभूषण नहीं, बल्कि उनकी अस्मिता और विरासत की चमक है ,जो बाजार की कीमतों से कहीं अधिक मूल्यवान है।





