Silver Screen: रेल के पहियों पर सवार फिल्मों का सफर

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 हिंदी सिनेमा का इतिहास सिर्फ समय के साथ ही नहीं बदला! वक़्त के साथ उसमें नए-नए किस्से-कहानियां भी जुड़ते गए, जिन्होंने सिनेमा को रोचक बनाया। ऐसा ही एक माध्यम बना रेल, जिसके बिना सिनेमा का इतिहास कभी पूरा नहीं हो सकता। एक समय ट्रेन का सफर स्टेटस सिंबल बना था, उसी समय सिनेमा में भी इसे अपनी कहानियों में शामिल किया। रेलों पर अफसाने लिखे जाने लगे और ट्रेन के सफर में मिलन के दृश्य फिल्माए गए।
सिनेमा और रेल का रिश्ता तो सिनेमा के जन्म के साथ ही जुड़ गया था। क्योंकि, लुमियर बंधुओं की शुरूआती लघु फिल्मों में प्लेटफार्म पर रेल के रुकने और यात्रियों के चढ़ने-उतरने के दृश्य थे। वास्तव में रेल कई लोगों के जीवन से बहुत गहराई से जुड़ी है। हर किसी के पास रेल सफर से जुड़ी कई खट्टी-मीठी यादें होती हैं। जब यही दृश्य उसे फिल्म में दिखाई देते हैं, तो वो इससे कनेक्ट होता है।
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ऐसे कई फिल्मकार हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों में रेल के सफर को हिस्सा बनाया। फिल्में समाज का आईना होती हैं और इसीलिए फिल्मकारों ने रेल को खूबसूरती से अपनी कहानी में पिरोया। कई अहम फिल्में जिनकी कहानी रेल से शुरू हुई या रेल के दृश्य ने फिल्म को एक अलग दिशा में मोड़ दिया! इसलिए कि कहानी को सरल ढंग से बयां करने के लिए रेल बहुत महत्वपूर्ण है। एक्शन, रोमांस, इमोशन सभी तरह के दृश्य बड़े सहज ढंग से ट्रेनों पर फिल्माए गए। कई फिल्में हैं, जिन्हें आज भी सिर्फ रेल पर फिल्माए गए सीन के कारण याद किया जाता है।
   बीते जमाने की बात करें, तो 1934 में पहली बार ‘तूफान’ फिल्म में रेल का सीन फिल्माया गया था। इसके बाद तो रेल पर फिल्मों का सफर चलने लगा। ये वो दौर था, जब रेल और फ़िल्में लोगों के जीवन का हिस्सा बन रही थीं। इसके बाद 1936 में बनी ‘अछूत कन्या’ की कहानी तो रेल ट्रैक के आसपास ही घूमती है। क्योंकि, नायिका का पिता रेलवे क्रॉसिंग पर हरी झंडी दिखाने का काम करता है। 1955 में आई एक फिल्म का नाम ही ‘रेलवे प्लेटफार्म’ था।
इसके मुख्य कलाकार सुनील दत्त और नलिनी जयवंत थे। 1942 में महबूब खान की फिल्म ‘रोटी’ में भी रेल के दृश्य थे। 1958 की फिल्म ’16वां साल’ में ‘है अपना दिल तो आवारा’ गीत को देवानंद और वहीदा रहमान पर ट्रेन में फिल्माया गया था। गीत को काफी पसंद इसलिए किया गया क्योंकि पहली बार किसी नायक ने सबके सामने अपने दिल का हाल बयां किया था। 1960 में आई फिल्म ‘काला बाजार’ में भी एक गीत रेल की बोगी में फिल्माया, जिसमें देव आनंद नीचे वाली और वहीदा रहमान ऊपर वाली सीट पर होती है।
1969 में आई ‘आराधना’ में ‘मेरे सपनों की रानी’ गीत का फिल्मांकन रेल में हुआ था। 1988 में अमिताभ बच्चन और मीनाक्षी शेषाद्री की फिल्म ‘गंगा-जमुना-सरस्वती’ का गाना ‘साजन मेरा उस पार है’ भी रेल में फिल्माया था। कमाल अमरोही की कालजयी फिल्म ‘पाकीज़ा’ में रेल का एक महत्वपूर्ण दृश्य था, जो मीना कुमारी और राजकुमार पर फिल्माया था। इस अकेले दृश्य में जीवंतता लाने के लिए कमाल अमरोही ने कमालिस्तान स्टूडियो में ट्रेन की पटरी बिछवाई और रेल का डिब्बा बनवाया था।
   यश चोपड़ा को तो रोमांटिक फिल्मों का बादशाह कहा जाता रहा! लेकिन, उनकी ज्यादातर फिल्मों में रोमांस के दृश्य इन्हीं रेलों में फिल्माए गए। क्योंकि, यश चोपड़ा फिल्मों में रेलवे का बखूबी चित्रण करते थे। ‘मशाल’ (1984) में उन्होंने एक गाने ‘मुझे तुम याद रखना’ की शूटिंग ट्रेनों के इर्द-गिर्द की थी। इसके बाद शाहरुख खान के साथ फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (1995) बनाई। इसमें शाहरुख और काजोल के बीच ऐसे यादगार सीन फिल्माए, जो दर्शक कभी भूल नहीं सकते!
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इस फिल्म का वो सीन जिसमें नायिका नायक से मिलने के लिए स्टेशन पर काफी दूर तक दौड़ती है। उनकी फिल्म ‘वीरजारा’ (2004) में भी ट्रेन का बेहतरीन चित्रण किया गया। शाहरुख खान ने फिल्म ‘दिल से’ (1998) में मलाइका अरोड़ा खान के साथ एक गाने ‘छइयां छइयां’ की शूटिंग चलती ट्रेन की छत पर की, जो खासा लोकप्रिय हुआ। ‘स्वदेश’ में भी शाहरुख़ रेल पर बैठे हुए दिखाई दिए। यह फिल्म भले ही हिट नहीं हो सकी, लेकिन इसकी काफी तारीफ हुई। इसके बाद शाहरुख की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ने भी धमाल मचाया। फिल्म की शुरुआत भी रेल से होती है।
    70 के दशक में लगभग हर फिल्म में कोई कोई सीन रेल से जुड़ा जरूर होता था। शोले (1975) में पुलिस अफसर बने संजीव कुमार की जय-वीरू से पहली मुलाकात रेल में ही होती है। फिल्म में डाकुओं और पुलिस के बीच लम्बी लड़ाई दिखाई गई। ‘द बर्निग ट्रेन’ (1980) का तो कथानक ही ट्रेन से जुड़ा था। इसमें पहली बार चलने वाली एक ट्रेन में आग लगने के बाद उसे बुझाने की कोशिशें दिखाई गई थी। जब बी मेट, चेन्नई एक्सप्रेस, बंटी और बबली, 1.40 की लास्ट लोकल जैसी कई ऐसी फिल्में आई, जिनका सफर रेलों के साथ ही पूरा हुआ। रेल में कई ऐसे सीन शूट किए गए, जिसे लोग काफी पसंद किया।
‘गदर’ का वो दृश्य जिसमें हीरो अपनी प्रेमिका को पाकिस्तान से ला रहा है और रेल पर पाक फौजी उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। आमिर खान तो फिल्म ‘गुलाम’ के एक दृश्य में रेल से रेस लगाते हैं। करीना कपूर और शाहिद कपूर की फिल्म ‘जब वी मेट’ के तो ज्यादातर दृश्य रेल में ही फिल्माए, जो काफी यादगार रहे। ऐसी ही 2013 की फिल्म ‘राजधानी एक्सप्रेस’ थी, जिसके जरिए टेनिस लिएंडर पेस ने बॉलीवुड में कदम रखा। लेकिन, ये रेल पटरी से उतर गई। फिल्म में पेस ने दमदार भूमिका निभाई, लेकिन उनका यह अंदाज लोगों को पसंद नहीं आया। खुशवंत सिंह के उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ से प्रेरित होकर पामेला रुक्स ने भी फिल्म बनाई थी।
    राजकपूर के बारे में कहा जाता है कि वे ‘रिश्वत’ नाम की एक कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे, पर वे बना नहीं सके! इस कहानी में रेल की बोगी को मुख्य आधार बनाया गया था। कहानी का नायक एक रिटायर्ड शिक्षक होता है, जो अपने केंद्रीय मंत्री बने बेटे से मिलने दिल्ली जाता है। पूरी फिल्म रेल के एक डिब्बे में बनना थी।
कथानक का आधार था कि रेल का एक डिब्बा देश की विविधता का ऐसा प्रतीक है, जिसमें कई धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं के लोग एक साथ यात्रा करते हैं। कहानी में ये भी था कि डिब्बे में कितनी भी भीड़ हो, जैसे ही सफर शुरू होता है, सभी को जगह मिल जाती है। सीट पर बैठे यात्री भी अपनी सीट में खड़े यात्रियों को जगह देते हैं। राजकपूर इस फिल्म के जरिए अपनी फिल्म ‘जागते रहो’ की तरह देश की विसंगतियों और विषमताओं के बीच आम आदमी के कष्ट की कहानी दिखाना चाहते थे, पर उनकी ये इच्छा अधूरी रह गई।
   कई फिल्मों में रेल डकैती के दृश्य फिल्माए गए। दिलीप कुमार की ‘गंगा-जमुना’ में रेल डकैती का दृश्य बहुत रोमांचक बन पड़ा था। ‘शोले’ में भी उसी तर्ज का एक दृश्य था। फिल्म ‘प्लेयर्स’ में भी चलती ट्रेन में डकैती डालते हुए दिखाया गया है। हालांकि यह फिल्म एक हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित थी। लेकिन ‘प्लेयर्स’ में अभिषेक बच्चन समेत कई कलाकार करोड़ों के सोने के लिए चलती ट्रेन में लूटपाट करते हैं।
एक्शन फिल्मों से करियर की शुरुआत करने वाले अक्षय कुमार की 2004 में आई फिल्म ‘खाकी’ में भी ट्रेन का अहम किरदार रहा। इस फिल्म में बदमाशों से बदला लेने के लिए पुलिस की टीम ट्रेन का सहारा लेती है। बोनी कपूर ने अपनी फिल्म ‘रूप की रानी, चोरों का राजा’ में रेल में डकैती का बेहद रोमांचक दृश्य था। नायक हेलिकॉप्टर से चलती रेल पर उतरता है और मालगाड़ी के डिब्बे का दरवाजा खोलकर सारा माल बाहर फेंकता है। उसके साथी फेंके माल को ट्रक में भरकर ले जाते हैं। यह किसी हिंदी फिल्म में रेल डकैती का श्रेष्ठ दृश्य बन पड़ा था।
एक फिल्म में रेल के कूपे में तलाकशुदा पति-पत्नी सालों बाद मिलते हैं। लंबी यात्रा के दौरान वे नजदीक आते हैं और उनका टूटा रिश्ता फिर जुड़ जाता है। राजेश खन्ना की फिल्म ‘रोटी’ में चलती ट्रेन को दिखाया गया था। सलमान खान भी रेल के खासे दीवाने रहे। उनकी कई सफल फिल्मों जैसे तेरे नाम, दबंग, वांटेड की शूटिंग रेलवे प्लेटफार्म व ट्रैक पर हुई। 2008 में आई कई ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर में भी चलती ट्रेन को फिल्माया था।
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    शम्मी कपूर की पहली फिल्म का तो नाम ही ‘रेल का डिब्बा’ था। राजेश खन्ना ने भी ‘द ट्रेन’ में काम किया, पर फिल्म की कहानी में ट्रेन का कोई जिक्र नहीं था। ‘अजनबी’ में जरूर उन्होंने स्टेशन मास्टर की भूमिका निभाते हुए मालगाड़ी के डिब्बे पर जीनत के साथ ‘हम दोनो दो प्रेमी’ गाना गाकर दर्शकों को लुभाया था। रेल और रेल पर फिल्माए जाने वाले गीतों में ‘आशीर्वाद’ का अशोक कुमार पर फिल्माया एक गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था।
‘प्रोफेसर’ का मैं चली में चली, ‘मेरे हुजूर’ का रुख से जरा नकाब हटाओ, ‘विधाता’ में शम्मी कपूर ने इंजन ड्राइवर बनकर ‘हाथों की चंद लकीरों का’ गीत गाया था। ‘जब प्यार किसी से होता है’ का जिया ओ जिया कुछ बोल दो, ‘खूबसूरत’ का इंजन की सिटी में म्हारो मन डोले, ‘दीवाना’ का हम तो जाते अपने गांव और ‘लाट साहब’ का सवेरे वाली गाड़ी से चले जाएंगे उल्लेखनीय है।
   मिलन और बिछुड़ने के दृश्यों में भी फिल्मकारों ने रेल और प्लेटफॉर्म का अच्छा उपयोग किया है। ‘दो उस्ताद’ में राज कपूर और शेख मुख्तार बचपन में मालगाड़ी के अलग-अलग रैक पर चढ जाते हैं। रास्ते में मालगाड़ी के रैक कटकर अलग-अलग दिशाओं में चले जाते हैं।
इसकी नकल करके सलीम जावेद ने ‘हेराफेरी लिखी’ तो इस दृश्य को ज्यों का त्यों उठा लिया था। ‘तीसरी कसम’ और ‘सदमा’ दो ऐसी फिल्में हैं, जिनके अंतिम दृश्य में रेल में बैठकर नायिका की बिदाई के दृश्य इतने मार्मिक थे कि दर्शक नम आँखे लिए सिनेमा हॉल से बाहर आता है। ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का रेल पकड़ने को बेचैन बेटी का हाथ छोड़कर भीगी आंखों और रुंआसी आवाज में कहा गया अमरीश पुरी का संवाद ‘जा सिमरन, बना लें अपनी जिंदगी’ दर्शक कभी नहीं भूल पाएंगे।
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हेमंत पाल

चार दशक से हिंदी पत्रकारिता से जुड़े हेमंत पाल ने देश के सभी प्रतिष्ठित अख़बारों और पत्रिकाओं में कई विषयों पर अपनी लेखनी चलाई। लेकिन, राजनीति और फिल्म पर लेखन उनके प्रिय विषय हैं। दो दशक से ज्यादा समय तक 'नईदुनिया' में पत्रकारिता की, लम्बे समय तक 'चुनाव डेस्क' के प्रभारी रहे। वे 'जनसत्ता' (मुंबई) में भी रहे और सभी संस्करणों के लिए फिल्म/टीवी पेज के प्रभारी के रूप में काम किया। फ़िलहाल 'सुबह सवेरे' इंदौर संस्करण के स्थानीय संपादक हैं।

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