शरद पूर्णिमा पर विशेष : सिंगाजी की पुन्यव

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शरद पूर्णिमा पर विशेष :सिंगाजी की पुन्यव

डॉ. सुमन चौरे

सामान्यतः व्रत त्योहारों के अवसर पर अपने घर और अपने शहर से दूर जाना संभव नहीं हो पाता है; किन्तु किसी विशेष कारणवश इस बार मुझे नवरात्र और दशहरे पर खण्डवा जाना पड़ा। भोपाल लौटते समय रास्ते में कई छोटे-बड़े गाँव पड़े। सूर्यास्त रास्ते में ही हो गया। मैं बहुत खुश थी, रास्ते के गाँवों में, रास, बकेड़ी और संत सिंगाजी के भजन सुनने को मिलेंगे। अवसर था चाँदनी पर्व का। पर क्या दिखा मुझे, गाँवों के चौक-चौराहों पर, कहीं डीजे पर डाँडिया करते लोग, तो कहीं पर आरकेस्ट्रा पार्टी, शोर-शराबा, व्यर्थ की तुकबंदी, चलती गाड़ी से बाहर झाँका, शुभ्रवर्ण चाँदनी फैली थी, जितना उज्ज्वल प्रकाश, फेनिली चाँदनी, उतना ही अंधकार मेरे अन्तस में उतरता चला जा रहा था। क्या हो गया हमारे गाँवों को? यही तो वे गाँव हैं, जहाँ छोटे-बड़े, बूढ़े सबकी ज़बान पर सिंगा के भजन होते थे। आज तो सिंगा की रात है, गरबा की रात है, सुधा रस वृष्टि की रात है।

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गाँवों में तो शरदोत्सव को एक आध्यात्मिक पर्व के रूप में मनाते हैं। रासबिहारी कृष्ण की रास लीला का दिन शरद पूनम की रात्रि, रात, यह तो श्रीकृष्ण की याद करने की रात, ईश्वर में लीन होने की और साधना की रात। गाँवों के हुड़दंग को देखकर मुझे याद आने लगी, मेरे बचपन की वे शरद पूनम की रातें, जब यह पर्व बड़े ही श्रद्धा भाव से मनाया जाता था। शरदोत्सव का पर्व हमारे निमाड़ क्षेत्र में विविध विधाओं से मनाया जाता था।

निमाड़ में शरद पूर्णिमा को कई नामों से जाना जाता है- ‘सिंगाजी की पुन्यवऽ,’ ‘कोजागी पुन्यवऽ’, ‘रास पुन्यवऽ’ और ‘सरद पुन्यवऽ’। इन शब्दों के स्मरण से मेरी स्मृतियाँ रजत-सी चमकने लगीं। आज की रात का अंधकार से क्या सरोकार। आकाश के आँगन से एक भाई के जाते ही, दूसरा भाई प्रकाश फैलाने को खड़ा रहता है।

गाड़ी की घर्र्रघराहट से दूर मेरे कानों में आवाज़ आने लगी – ‘आज पटिलदाजी घर सिंगा महाराजा की कड़ाही छे…, तो आज जानू भाई घर सिंगा म्हाराज का भजन छे…, तो परसाद लेणऽ आवजो, रे भाई नंऽ होण।’ ऐसी आवाज़ गली-चौरस्तों पर खड़े होकर हमारे गाँव का नाई संध्या के पूर्व डोंडी पीट कर सबको सामूहिक निमंत्रण देता था और हम बच्चे हाथ की अँगुलियाँ पकड़ कर याद रखते थे, कि कितने घरों में सिंगाजी का प्रसाद लेने जाना है।

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आज की सुधामय रात हर वय के लोगों के लिए विशेष होती थी। साँझ होते ही हम बच्चों की टोलियाँ बन जाती थीं। लड़कों की अलग और लड़कियों की अलग। फिर झुण्ड के झुण्ड घर-घर, द्वार-द्वार ‘बकेड़ी’ माँगने जाते थे। ‘बकेड़ी’ के गीत गाये जाते थे। लड़कों के द्वारा गाये जाने वाले गीतों में जोश और तुनक मिज़ाजी का स्वभाव दीखता था। लड़कियों द्वारा गाये जाने वाले गीत सौम्य, मधुर और विनयी भाव के होते थे। अपने-अपने घरों के द्वारों पर टोकने में अनाज भरकर लोग बैठ जाते थे। लोगों द्वारा पशुओं के लिए दिया जाने वाला अन्न ही ‘बकेड़ी’ कहलाता है। यह पशुओं के प्रति मानवीय संवेदनाओं का द्योतक हैं। पशुओं के कारण ही घर में नवान्न आता है, अतः उनके नाम से ही बच्चे ‘बकेड़ी’ माँगते हैं और इस अन्न का संग्रह कर गोवर्धन पड़वा के दिन पशुओं की पूजाकर, इस अन्न को पकाकर उन्हें खिलाया जाता है। वस्तुतः यह पशुओं के लिए एक उपकृत भाव है।

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लड़के लोग लोगों के घरों के द्वारों पर खड़े हो जाते हैं और ज़ोर से गाते हैं-

नानी सी गाय गटर गेंगणी

ओ सौ पूळा खायऽ माता

नद्दी को पाणी पेऽऽ

न्हार समोर जायऽ।

साला बोलऽऽ…

दऽ ओ माँयऽ टुलेक दाणा।

भावार्थ: छोटी सी गाय, गठीली, हृष्ट-पुष्ट है। सौ पिंडी घास खाती है, नदी का पानी पीती है और शेर के सामने खड़े होकर उसे ललकारती है। हे माय! उस गाय के लिए एक टुली अनाज दे।

द्वार पर बैठा व्यक्ति हर बच्चे के झोले में अन्न डालता था। ऐसे ही हर घर-द्वार पर लड़कियों के टोले भी जाते थे, और वे बड़े ही मधुर स्वर में विनयावनत लहजे से गाते थे –

गुल्लरियो झरऽ झाप्परियोऽऽ

पातळियो सुहायऽ

नीळई टोपी का दादाजी

दादावन्ती झूलऽ झूलपेलीऽ

ओ गौळेण माँयऽऽ

थारो छोरो अन्नी लायो, पन्नी लायो

इच्छा की जोळई लायो

लाखऽ रूपा की लाड़ी लायो,

दऽ ओ माँय टूलेक दाणाऽ,

भावार्थ: हे पटलन माँय! गूलर के समान झबरीला फलदार तेरा परिवार हो, तेरा नाजु़क पुत्र घर की शोभा है। नीली सुन्दर टोपी वाले दादाजी तेरी बड़ी क़दर करते हैं, तू घर में झूले डालकर राज करती है। तेरा बेटा लाख रूपा बहू लेकर आया है, सोने का हार, चाँदी की बिछिया लाया है। हे भोली-भाली माँ! तू हमें पशुओं के लिए टूली भर अनाज दे।

इतनी मनुहार और मधुर सरस गीत में अपनी प्रशंसा सुनकर कौन गृह स्वामिनी अनाज नहीं देगी! बड़े-बड़े झोले भर अनाज मिल जाता था। हम वजन न सहने के कारण भरे झोले को घर रखकर, दूसरा झोला ले आते थे। यूँ तो बकेड़ी दशहरे के दूसरे दिन से माँगना शुरू कर देते थे; किन्तु हर व्यक्ति हर रोज़ अनाज नहीं देता था, फिर कई पाँचों दिन अनाज देते थे; परन्तु आखरी दिन सब घरों से अनाज मिलता ही था, चाहे मूँग हो, उड़द हो, फल्ली हो, धान हो, जो भी नवान्न हो, मिलता था और उस सब धान्य को इकट्ठा कर रख लिया जाता था, क्योंकि यह पशुओं के हिस्से का अन्न होता था। यह प्रसंग खतम कर हम बच्चे दौड़ पड़ते थे सिंगाजी की कड़ाही का प्रसाद लेने। रात्रि बारह बजे आरती के बाद प्रसाद वितरण होता था। इसमें घी-गुड़ का सीरा होता था। यूँ तो जिनके घर भी पशुधन होता था, वे इस दिन सिंगाजी महाराज की कड़ाही ज़रूर करते और प्रसाद बाँटते थे; किन्तु जिनकी मन्नत पूरी होती थी, वे बड़े पैमाने पर सिंगाजी के भजन कराकर गाँव निमंत्रण कर प्रसाद बाँटते थे। रात के तीसरे पहर तक भजन झाँझ-मृदंग के साथ पूरे गाँव को झंकृत कर देते थे। संत सिंगा निमाड़ में देव तुल्य पूजे जाते हैं, पशु रक्षक देवता के रूप में इनकी पूजा की जाती है। सिंगाजी के निर्गुणिया भजनों में सीख दी गई है। खेती कैसे करना?, हरिनाम की खेती कर पाप के पल्लव बीनकर फेंक दो और कर्म के डंठलों को फेंककर हरिनाम की खेती करो –

खेती खेड़ो रे हरिनाव की, जेमऽऽ मुकतो लाभऽ

पाप का पालवा कटाऽ जो काटी बाहेर राळऽ

कर्म की कासी एचावजो खेती चोखी थाप

तो कई ज्ञान-वैराग्य के भजन चलते थे, जो बचपन में समझ से ऊपर ही होते थे –

रूप नहीं, रेखा नहीं, ना ही है कुल की गौतऽ रेऽ।

बिन देही को सायबो मेरो, झिलमिल देखूँ जोतऽ रेऽ।

भावार्थ: जिसका न रूप है, न रंग है, न रेखा है, न कुल है, न गोत है, ऐसा मेरा बिन देह का साहेब है, फिर भी मैं उसकी झिल मिलाती जोत के दर्शन कर रहा हूँ।

निर्गुण निराकार परब्रह्म को मानने वाले संत सिंगाजी कबीर की विचार धारा के थे। कहाँ अमृतमयी चाँदनी रासबिहारी की लीलामयी रात और कहाँ निर्गुण ब्रह्म, जहाँ संत सिंगाजी के भजन ज्ञान-वैराग्य से, भक्ति से ओतप्रोत हैं, वहीं महिलाओं के गरबे प्रेम मिलन एवं आसक्ति से रसे भरे हुए हैं। हम अपने डाँडिये लेकर महिलाओं के टोल में बीच-बीच में मिलकर डाँडिया करते थे। इन गीतों में गोपी-कृष्ण के मिलन के भाव और तन्मयता का पुट मिलता है। मधुर कंठी स्वर वातावरण में कृष्ण के मिलन को विह्वल कर देते हैं-

शरद पुन्यवऽ की रातऽ सखी ओऽ हाऊँ गरबो खेळणऽ गई

सखी ओऽ मन नतऽ छोगा की खोई

नई मखऽ सुध म्हारा अंग की नऽ

नई मखऽ सुध म्हारा मन्नऽ की

सखी ओऽ मन नतऽ छोगा की खोई

म्हारो प्रितम करऽ बरजोई

भावार्थ: हे सखी! शरद पूनम की रात में मैं गरबा खेल रही थी और इतने आनन्द में लीन हो गई कि मुझे अपने तन मन की सुध ही नहीं रही। हे सखी! ऐसी स्थिति में मेरी नाक की कीमती नथ कहीं खो गई है। मेरा पति मुझसे नाराज़ हो रहा है।

गरबा गीतों में माँ अम्बे भवानी के भक्ति गीत भी गाये जाते हैं।

रात्रि यहीं समाप्त नहीं होती थी। ज्यों-ज्यों रात भरती, त्यों त्यों अमृत की रसधार गाढ़ी होती जाती थी। हम बच्चे लोग अपना खेल शुरू करते थे। न सिंगा में मन लगता, न गरबा में। हमारा मन तो अपने खेलों में रम जाता और इस रात हम जो खेल खेलते, वह एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज का आईना था।

हम लड़कियाँ मिलकर दो टोलियों में बँट जाते थे। एक टोली की लड़कियाँ कन्या पक्ष की होतीं और दूसरे पक्ष की लड़कियाँ वर पक्ष की। हम आमने-सामने खड़े हो जाते थे। एक टोली के पास छोटी कन्या और दूसरी के पास छोटा बालक वर होता। वर पक्ष की लड़कियाँ अपने वस्त्र लड़कों जैसी धोती बाँधती थीं और कन्या पक्ष की लड़कियाँ साड़ी। फिर एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर ऐसे बँध जाते जैसे कड़ियाँ बन गई हों। दोनों टोलियों के बीच दस पंद्रह फीट का फासला होता था। खेल की शुरुआत वर पक्ष से होती थी।

वे आपस में बंधे ठेठ खड़े चलकर गाते आते थे –

पसऽ भरऽ मोती लेवऽ जी लेवऽ

नऽ राजुल बेटी देवऽ जी देवऽ

फिर उनकी बात के उत्तर में कन्या पक्ष की टोली एक-दूसरे के हाथ पकड़ कर, झुककर नम्रतापूर्वक चलकर गाती आती थी –

पसऽ भरऽ मोती नाँ लेवाँ, नऽ राजुल बेटी नाऽ देवाँऽ

सूपऽ भर मोती लेवऽ जी लेवऽ

नऽ राजुल बेटी देवऽ जी देवऽ

भावार्थ: पसभर मोती लो और अपनी कन्या हमें दे दो। सूपभर, टोकनी भर मोती लो और अपनी कन्या का हमारे बेटे से विवाह रचा दो। और वर पक्ष की हर विनती पर कन्या पक्ष की लड़कियाँ विनम्रता से कहती हैं, ‘‘न हमको तुम्हारे माणक-मोती चाहिए और न हम तुम्हें कन्या देंगे। इस क्रम के बाद वे कहती हैं कि तुम मान सम्मान से आवोगे तो तुम्हारे घर हम कन्या देंगे”-

मानऽ का पानऽ लेवऽ जी लेवऽ

नँऽ राजुलऽ बेटी देवऽ जी देवऽ

मानऽ का आगऽ नवाऽ राजऽ

नऽ राजुल बेटी देवाँऽ जी राजऽ

भावार्थ: हे समधी जी! आपने मान से बेटी माँगी है, तो हम अपनी राजदुलारी कन्या तुम्हें देते हैं।

फिर इस खेल में प्रतीक रूप में वस्त्राभूषण और मान-सम्मान कर विवाह रचाया जाता था। विवाह के बाद कन्या की बिदाई नहीं की जाती थी, क्योंकि उस समय कन्या बहुत छोटी होती थी।

फिर नये सिरे से खेल शुरू होता था। वर पक्ष की टोली की लड़कियाँ पैर पटकते कन्या पक्ष के सामने जाती थीं और अपनी बहू की बिदाई की बात कहती थी। कन्या पक्ष की लड़कियाँ उसी क्रम में हाथ से हाथ जकड़े झुककर नाचती जातीं और कन्या की वय का जिक्र कर उसे ससुराल न पहुँचाने की गुहार लगाती थीं –

वर पक्ष- अग्गड़ फोड़ूँ दग्गड़ फोड़ूँ

चकरी का पापड़ऽ फोड़ूँ

नानो भाई पन्नायो छेऽ,

नानी लाड़ी लायो छेऽ,

धनऽ मोकळोजऽ कि नई मोकळता।

भावार्थ – हमारे पास अपार शक्ति है। हम पत्थर, पहाड़ सब तोड़ सकते हैं। आपके घर की बेटी से हमने अपने छोटे भाई का विवाह किया है, आप हमारा धन (बहू) अर्थात् आपकी बेटी हमारे घर भेज रहे हो, कि नहीं ?

कन्या पक्ष की टोली बड़ी विनम्रता से गाती जाती है –

अभी तो झोळई मँऽ सोवती छेऽ सोवती छेऽ

अभी तो अंगणा मँऽ  खेलती छेऽ खेलती छेऽ

अभी तो कुलड़्या मँऽ पाणी भरती छेऽ भरती छेऽ

धन का सायबा हो राजऽ

भावार्थ: हे सम्मानित समधी जी! अभी तो हमारी कन्या झोली में झूलती है, अभी तो हमारी कन्या आँगन में ही खेलती है। अभी तो हमारी कन्या छोटे से लोटे से ही पानी भरती है। हम इतनी छोटी बेटी की विदा नहीं करेंगे।

कन्या की हर उम्र का ज़िक्र इन गीतों की पंक्तियों में होता है और वर पक्ष क्रोधाग्नि से भड़कते पैर पटकते चले जाते हैं। किन्तु जब कन्या वयस्क होती है, सोलह साल की होती है, तो कन्या पक्ष की टोली बड़े आदर से वर पक्ष को आमंत्रित करती है और कहती है – “अब हमारी कन्या तुम्हारे घर और वर के योग्य हो गई है, उसे ले जाइये।” गीत है –

सगा आओ तो सईंऽ, सगा आओ तो सईंऽ

जाजमऽ बिछाई सगा बठो तो सईंऽ।

थाळ परोस्याऽ सगा जीमो तो सईंऽ

भाँगू लाड़ी नँऽ इच्छु काट्यो तो सईंऽ

भावार्थ: हे सगे सम्बंधी! आप आओ। हमने आपके स्वागत में बिछावन किया है, जाजम बिछाई है, थाल परोसे हैं, भोजन करिये और अपनी बहू को ले जाइए, उसे बिच्छु ने काटा है। (बिच्छू का काटना काम-ज्वर और वयस्क होने का प्रतीक है। बड़े धूम-धाम से बगोने में थाली कूटते बेटी की बिदाई की जाती थी।)

यह खेल, मात्र खेल नहीं, इसमें एक परम्परा, एक रीत छिपी है। किन्हीं परिस्थितियों में बाल-विवाह किए जाते थे किन्तु बालिका वधु ससुराल नहीं भेजी जाती थी। जब तक बेटी वयस्क नहीं होती थी, सोलह-सत्रह साल की उम्र में ही उसका गौना कर ससुराल भेजा जाता था। ये खेल सामाजिक मनोवृत्तियों का दर्पण था। समाज में धन-मोती लेने की भी रीत नहीं थी। बुराइयों के विरोध में एक सोच था।

खेलों के माध्यम से जागरूकता की मिसाल थी; किन्तु ऐसे खेल गाँवों से भी विलुप्त हो गए। ‘खेल खतम, पैसा हजम’कर हम भागते थे अपने-अपने घर, क्योंकि आजी माँय प्रतीक्षा कर रही होती थी। बड़े से बगोने में कढ़ा हुआ दूध, जिसमें तुलसीजी का पत्ता डालकर चन्द्रदेव की पूजा आरती की जाती थी और प्रसाद लगाया जाता था। हम आरती के बाद अपने-अपने बड़े-बड़े पीतल के ग्लास लेकर आते, डम्पफुल ग्लास का दूध एक सांस में पीना होता था, फिर दूसरी परीक्षा होती थी। आजी माँय बहुत सी सुइयाँ और धागा लेकर बैठती थीं, हम सब बच्चों को चन्द्रमा की रोशनी में एक बार में ही सुई में धागा डालना होता था। इससे नेत्र ज्योति तेज होती है, ऐसा माँय का सूत्र था।

फिर दौड़ पड़ते थे सिंगाजी की कड़ाही का प्रसाद, घी निथरता, घर के गरम-गरम दूध से पेट इतना भर जाता था कि हिलना डुलना भी मुश्किल होता था, फिर भी होड़ा-होड़ में तेज दौड़ लगाकर ठाकुरजी के मंदिर में पहुँच जाते थे। भले ही पेट का दूध बज रहा हो, फिर भी साक्षात् ठाकुरजी के प्रसाद की रबड़ी खाये बिना शरद पुन्यव कैसे। वहाँ भी झपटकर प्रसाद लेते, फिर गाँवों के जितने घरों में गरबे होते, वहाँ जा-जाकर रात का सब आनन्द उठाते थे। रात्रि के अन्तिम प्रहर में गरबा-घट विसर्जन के लिए नदी पर जाते थे। वहीं से सब महिलाओं के साथ जल में डुबकी लगाते थे, क्योंकि उसी दिन से ही कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता था। वातावरण में थोड़ी सी ठंडक हो जाती थी। फिर भी गीले कपड़ों से नदी से घर तक दौड़ लगाते आते थे। दौड़ लगाने में ठंड गायब हो जाती थी। घर पर आजी माँय भोर की प्रभाती गाते तुलसी क्यारा साफ़ करती मिलती थीं। झट कपड़े बदलते और सो जाते, फिर पता नहीं दिन कब उगा हुआ, और कब डूबा। कोई कितना भी जगाते, जागते नहीं थे। रात को भोजन के लिए ही जगाते थे। नींद खुलते ही हम चाँद देखने दौड़ते थे और सच में देखते आज का चाँद भी हम जैसा ही थका-थका लग रहा होता था। कल की यादें, पूनम की यादें आज तक स्मृति में तरोताज़ा हैं।

यादों में चलते-चलते, न जाने इतना लम्बा रास्ता कब पार हो गया। घर पहुँचकर मैंने सबसे पहले भगवान् चन्द्रदेव की पूजा की तैयारी की। चन्द्रमा नहीं बदला है, वह तो वैसा का वैसा सदियों से चमक रहा है, अमृत बरसा रहा है। मैंने देखा, बारह बजने में कुछ ही घड़ी शेष हैं। दूध चाँदनी में रखा। चंद्रदेव की पूजा की, सबको ग्लास में दूध परोसा और मैं अमृतमयी दूध के साथ अपनी वेदना निगल गई। क्या हो गया है सबको ? हमारी गाड़ी छोटे से छोटे गाँव से गुज़री, शहर से दूर के गाँवों से गुज़री, पर न कोई बकेड़ी माँगता मिला, न कोई खेल-खेलता, न महिलाएँ गरबा घट साथ गरबा रमती मिलीं। कौन निगल गया हमारी संस्कृति को, तेज आवाज़, उन्मत्त जोशीले नृत्य? क्या यूँ ही हमारी संस्कृति दम तोड़ देगी और चारों ओर अपसंस्कृति का गरल धुआँ गुबार उठता नज़र आयगा?

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डॉ. सुमन चौरे, लोक संस्कृतिविद,भोपाल 

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