इसलिए खुश हूं कि इस्लामी-जिहादी-आतंकवादी समूह हार गया…

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इसलिए खुश हूं कि इस्लामी-जिहादी-आतंकवादी समूह हार गया…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

बांग्लादेश चुनाव में तारिक रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने प्रचंड जीत हासिल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को जीत की बधाई दी। बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान का पीएम बनना तय हो गया है। बांग्लादेश चुनाव में जमात-ए-इस्लामी की हार और बीएनपी की जीत भारत के लिए अच्छा माना जा रहा है। जमात ए इस्लामी को पाकिस्तान का पक्षधर माना जाता है। जमात ए इस्लामी ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। वहीं, बीएनपी भारत के साथ संबंधों को बेहतर कर आगे बढ़ा सकती है। ढाका में सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर फहमीदा खातून ने आगे कहा कि बांग्लादेश का चुनाव पड़ोसी भारत समेत “कई ग्लोबल प्लेयर्स” के हित में है। खातून ने कहा, “बांग्लादेश के भारत के साथ लंबे समय से डिप्लोमैटिक और इकोनॉमिक रिश्ते हैं। लेकिन 2024 में राजनीतिक बदलाव या बगावत के बाद, कई मामलों में, यह एक नया दौर शुरू हुआ है।” बांग्लादेश चुनाव की एक बड़ी खासियत यह भी है कि बांग्लादेश में पहली बार संसदीय चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी कराया गया और पहली बार डाक पत्र से मतदान की व्यवस्था की गई। बांग्लादेश में मुख्य मुकाबला बीएनपी के तारिक रहमान और जमात के शफीकुर्रहमान के बीच था, इसमें तारिक रहमान ने बाजी मारी है।

बांग्लादेश में संसदीय चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो बीएनपी ने 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी ने 68, एनसीपी ने 6, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस ने 2, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने 1, गण अधिकार ने 1, बीजेपी ने 1, गण संघित ने 1, खिलाफत मजलिस ने 1 और निर्दलीयों ने 7 सीटें जीतीं हैं। चुनाव नतीजों और बांग्लादेश की नई सरकार के भारत के साथ संबंधों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।ढाका में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सिकरी ने बांग्लादेश के चुनाव नतीजों पर कहा, ‘शेख हसीना 15 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहीं। उन्होंने भारत के साथ संबंधों को बहुत सफलतापूर्वक संभाला क्योंकि उन्होंने भारत की सुरक्षा संबंधी सीमाओं को स्वीकार किया था और इसी वजह से आर्थिक सहयोग बढ़ा, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था विकसित हुई और वे काफी समृद्ध हुए। अगर अवामी लीग सत्ता में नहीं होती तो धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ 18 महीनों तक लगातार हिंसा होती रही और लोग सचमुच घुटनों पर आ गए थे। बांग्लादेश में चुनाव अंतरिम सरकार द्वारा आयोजित किए गए थे और यह वास्तव में कोई निर्वाचित सरकार नहीं थी। अंतरिम सरकार को नियुक्त किया गया था और वह भी संविधान के आधार पर नहीं, यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का एक अभियान था।’

बांग्लादेश में बंपर जीत के बाद बीएनपी ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत से प्रत्यर्पण को लेकर बयान दिया है। बीएनपी के सीनियर नेता सलाहुद्दीन अहमद ने कहा कि विदेश मंत्री पहले ही उनके प्रत्यर्पण के लिए तर्क दे चुके हैं, और हम भी इसका समर्थन करते हैं। उन्होंने आगे कहा, ‘हम हमेशा कानून के अनुसार उनके प्रत्यर्पण के लिए दबाव डालते हैं। यह दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों का मामला है। हमने भारत सरकार से भी अनुरोध किया है कि कृपया उन्हें बांग्लादेश में मुकदमे का सामना करने के लिए वापस भेज दें।’

तो भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले मौलाना ममूनल हक को करारी हार का सामना करना पड़ा है। ढ़ाका 13 सीट से बांग्लादेश खिलाफत मजलिस का प्रत्याशी ममूनल हक अपना चुनाव हार गया। यहां से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बॉबी हजाज चुनाव जीते हैं। यह इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश के मतदाताओं ने सड़ी-गली मानसिकता को पूरी तरह से नकार दिया है। और आने वाले दिनों में बेहतर बांग्लादेश की उम्मीद की जा सकती है। भारत के साथ बांग्लादेश के अच्छे संबंधों की उम्मीद भी की जा सकती है। एक लोकतांत्रिक सरकार के जनहितैषी होने का प्रमाण बांग्लादेश में मिल सकता है। अल्पसंख्यक हिन्दुओं के प्रति भी सुरक्षा का भाव देखने को मिल सकता है।

बाकी विश्लेषण तो होते रहेंगे लेकिन बांग्लादेश चुनाव के नतीजों पर सबसे खास प्रतिक्रिया जानी मानी लेखिका तसलीमा नसरीन की आई है। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में मैं बीएनपी की जीत से खुश नहीं हूं, बल्कि इसलिए खुश हूं कि इस्लामी-जिहादी-आतंकवादी समूह हार गया। पिछले डेढ़ साल में उन्होंने बेशर्मी से अपना दबदबा कायम किया। लाखों समर्थकों के साथ रैलियां कीं, दिन-रात जब मन चाहा हिंसा की। जिसे चाहा मारा-पीटा और यातनाएँ दीं, हिंदू घरों में आग लगाई, हिंदुओं को पीट-पीटकर जला दिया और एक भी महिला को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी। इस बेहद महिला-विरोधी पार्टी ने कामकाजी महिलाओं को वेश्या कहकर उनका अपमान किया। महिला नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई। महिलाओं को बुर्का और नकाब के अंधेरे में धकेल दिया। महिलाओं को पुरुषों की गुलाम और यौन गुलाम समझा और महिला-विरोधी शरिया कानून लागू करने का सपना देखा। जनता ने जमात-ए-इस्लामी को सत्ता में नहीं आने दिया। और शायद तसलीमा नसरीन की इस प्रतिक्रिया में ही बांग्लादेश चुनाव का पूरा विश्लेषण समाया हुआ है। तसलीमा की इस टिप्पणी से मैं सौ फीसदी सहमत हूँ कि इस चुनाव में मैं बीएनपी की जीत से खुश नहीं हूं, बल्कि इसलिए खुश हूं कि इस्लामी-जिहादी-आतंकवादी समूह हार गया… उम्मीद यही है कि वैलेंटाइन डे पर बांग्लादेश में रहमान सरकार की बागडोर संभालें और देश व पड़ोसियों के साथ पारस्परिक प्रेम और सौहार्दता भी फले-फूले।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।