आश्वासनों से नहीं सुधरेगी बालिकाओं की स्थिति, कुछ नए कदम जरूरी

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  देश में हर साल ‘बालिका दिवस’ मनाया जाता है। लड़कियों की तरक्की के बड़े-बड़े वादे और दावे किए जाते हैं। उनके सम्मान में कसीदें पढ़े जाते हैं। मंचों से राजनेता लड़कियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणाएं करते नही थकते, पर होता कुछ नहीं! ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब लड़कियों पर हो रहे अत्याचार सुर्खियां न बनते हों! लैंगिग असमानता, बलात्कार, दुर्व्यवहार और ऐसे अनगिनत अपराध बालिकाओं के हिस्से में हर भोर की पहली किरण के साथ लिखे जाते हैं, जिससे समाज के हर वर्ग की लड़कियों को जूझना पड़ता है।
देश में 2008 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा बालिकाओं में फैली लैगिंग असमानता और अधिकारों के प्रति जागरूकता को बढ़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ की शुरुआत की गई थी। पर, आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां लड़कियों ने अपने हुनर का लोहा न मनवाया हो! विडंबना देखिए कि आज भी लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। भले ही आज समाज में महिला समानता का ढिंढोरा पीटा जा रहा हो लेकिन ऐसा कोई क्षेत्र नजर नहीं आता जहां बेटियों को बराबरी का अधिकार दिया गया हो।
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    हमारे अपने देश में एक तरफ तो लड़कियों को देवी मानकर पूजे जाने की प्रथा है। दूसरी तरफ़ जब अपने घर में बेटियां पैदा होती है, तो मातम पसर जाता है। बेटियों को अभिशाप समझा जाता है। आंकड़ों पर ही गौर करें, तो जून 2020 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) द्वारा जारी वैश्विक आबादी की स्थिति 2020 की रिपोर्ट में 2013 से 2017 के बीच करीब 12 लाख लड़कियां के जन्म के समय ही लापता होने की बात कही गई।
वहीं, भारत में भी प्रतिवर्ष 4 लाख 60 हजार लड़कियां जन्म के समय ही लापता हो जाती है। यही वजह है कि हमारे देश में लिंगानुपात की गहरी खाई बन गई। यूएन की रिपोर्ट की माने तो हमारे देश में प्रत्येक वर्ष 7,50,000 लड़कियों को मां के पेट में ही मार दिया जाता है। देश में गर्भपात के आंकड़ो में पिछले वर्ष की तुलना में 80 प्रतिशत वृद्धि हुई, वो अलग। भले ही कन्या भ्रूण हत्या में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्य अग्रणी रहे हो, लेकिन अमूमन पूरे देश में ही कन्या भ्रूण हत्या की तस्वीरे चौंकाने वाली हैं।
   उल्लेखनीय है कि मेलिंडा गेट्स ने कहा था ‘जब आप किसी लड़की को स्कूल भेजते हैं, तो इस भले काम का असर हमेशा के लिए रहता है।’ इतना ही नहीं उनका यह भी कहना था ‘यह पहल पीढ़ियों तक जनहित के तमाम कार्यों को आगे बढ़ाने का काम करती है, स्वास्थ्य से लेकर आर्थिक लाभ, लैंगिक समता और राष्ट्रीय समृद्धि तक।’
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अब सोचिए अगर एक बालिका के स्कूल जाने मात्र से इतनी चीजें समृद्ध होती है, फ़िर आज की 21वीं सदी में भी हमारी सोच दकियानूसी क्यों? आज भी अधिकांश बच्चियां स्कूलों का मुंह देखने से वंचित रह जाती हैं, और जो स्कूल का मुंह देखती भी हैं वह आगे की पढ़ाई जारी क्यों नहीं रख पाती! ऐसे में एक बात तो स्पष्ट है कि इस एक दिन दिवस मना लेने से स्थिति में बदलाव नहीं आने वाला। उसके लिए समग्र स्तर पर और सामाजिक चेतना का विकास करना जरूरी है।
आज विश्व भर में जलवायु परिवर्तन की गूंज सुनाई दे रही है। साथ ही साथ इससे होने वाले आर्थिक और सामाजिक नुकसान की भी चर्चा आम बात हो गई है। पर इन समस्याओं से भी बड़ी समस्या है आधी आबादी के साथ हो रहे लैगिंक दुर्व्यवहार, लेकिन इसपर चर्चा न होना एक दुःखद एहसास कराता हैं। वर्ष 2030 तक विश्व के लगभग सभी देश एक सुर में गरीबी उन्मूलन, भुखमरी, असमानता और लैगिंक न्याय जैसी तमाम बुराइयों को समाप्त करने की बात करते है।
लेकिन, जलवायु परिवर्तन के कारण उपजे संकट से इन लक्ष्यों को प्राप्त करने की राह को और कठिन बना दिया। महिलाओं को कभी धर्म-परम्पराओं के नाम पर तो कभी आर्थिक विषमता के नाम पर लैगिंक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और तो और जलवायु परिवर्तन ने लैगिंक समस्या को और विकराल बना दिया है। जलवायु परिवर्तन ने स्वच्छ भोजन, पानी यहां तक की समानता के अधिकार को भी प्रभावित किया है। जिसका असर हर वर्ग की महिलाओं पर साफ देखा जा रहा है।
बात कोविड-19 महामारी के दौर की करे तो आज इस वैश्विक महामारी में ऑनलाइन प्लेटफार्म का चलन बढ़ गया है। साथ ही कनेक्टिविटी और ऑनलाइन सुरक्षा के मामले ने भी लिंग विभाजन को और अधिक गहरा किया है। लड़कियों को इंटरनेट और डिवाइस के लिए आर्थिक और सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। ये सच है कि वक़्त बदल रहा है, लेकिन आज भी समाज में महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा।
एक आंकड़े के माध्यम से भारत में बालिकाओं की स्थिति को समझें, तो लड़कियों की साक्षरता दर, उनके साथ भेदभाव, कन्या भ्रूण हत्या देश में आज भी एक बड़ी समस्या है। साक्षरता दर भी एशिया में सबसे कम है। एक सर्वे के मुताबिक, भारत में 42% लड़कियों को दिन में एक घंटे से कम समय के लिए मोबाइल फोन इस्तेमाल की इजाजत दी जाती है। इस वैश्विक महामारी के दौर में शिक्षण संस्थान तक ऑनलाइन हो गए है। वहां लड़कियों के साथ इस तरह का व्यवहार कहाँ तक न्यायोचित है! इस सोच का निकाल भी अभी बहुत जरूरी!
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सोनम लववंशी

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर होने के साथ महिलाओं और सामाजिक मुद्दों की बेबाक लेखिका है। उन्होंने पत्रकारिता के कई संस्थानों में कार्य किया है।