23 जनवरी बसंत पंचमी पर विशेष:ज्ञान, बुद्धि ,कला और संगीत की देवी मां सरस्वती के उपासना का दिवस

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23 जनवरी बसंत पंचमी पर विशेष:ज्ञान, बुद्धि ,कला और संगीत की देवी मां सरस्वती के उपासना का दिवस

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*डॉ बी आर नलवाया* 

*शिक्षाविद एवं पूर्व प्राचार्य* 

_( प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर )_

 

भारत में माघ शुक्ल की पंचमी को बसंतोत्सव का त्यौहार बसंत का मौसम आने की खुशी में मनाया जाता है। शरद ऋतु का अवसान और ग्रीष्म ऋतु का शुभारंभ , इसी दिन से होता हैं। बसंत पंचमी के दिन जगह- जगह माँ सरस्वती-शारदा की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले किया था । तब से सरस्वती पूजन प्रचलन बसंत पंचमी के दिन मनाने‌ की परंपरा चली आ रही है। ‌इस दिन को पर्व की रूप में मनाने का एक कारण सरस्वती जयंती का दिन होता है।

 

बसंत पंच‌मी का त्योहार पश्चिम बंगाल व उड़ीसा राज्य में “श्री पंचमी” के नाम से मनाया जाता है। बंगाल के निवासियों का कहना है– कि यह प्रथा यहाँ प्राचीन काल से चली आ रही, इस पर्व का यह महत्व है ,कि बसंत ऋतु आते ही‌ प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। इसी दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना के साथ भारत के लोग अपनी कलम, वाद्य यंत्र की पूजा कर माँ की आराधना करते हैं। यह बसंत पंचमी पर्व दक्षिण एशिया- के

भारत, बाग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रो में बड़े उल्लास से मनायी जाती है।

शास्त्रों में बंसत पंचमी को ऋषि पंचमी से ,तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग- अलग ढंग से चित्रण करने का उल्लेख मिलता है।

 

वसंत और बसंत एक ही शब्द है ,बसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पांचवे दिन एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है, जिसमें विष्णु ओर कामदेव की पूजा होती है।

सरस्वती के 108 नामों में इन्हें शिवानुजा (शिव की छोटी बहन) कहकर भी संबोधित किया जाता है।

सरस्वती को वाणी,शारदा, वागेश्वरी, भगवती सहित अनेक नामों से संबोधित किया जाता है। ये सभी प्रकार के ब्रह्म, विद्या- बुद्धि एवं वाक् प्रदाता है। संगीत की उत्पति करने के कारण ये संगीत का अधिष्ठात्री देवी

भी कहलाती है।

 

बौद्ध व दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार श्रुत पंचमी पर्व, ज्ञान की आराधना का महान पर्व है जो भाई-बधुओ को वीतरागी संतों की वाणी सुनने ,आराधना करने, और प्रभावना बांटने का संदेश देता है , वही सरस्वती का उल्लेख वैदिक साहित्य में एक नदी और एक देवी

दोनों रूपो में आता है, वाक देवी के रूप में वह हिन्दू बौद्ध, जैन के लिये समान रूप में पूज्य है। हंस या वाहन मयूर पर सरस्वती जैन । परंपरा में ऋतुदेवी के नाम से विख्यात है।आराधना के पूर्व – सरस्वती साधकों को साधना शुद्धता के साथ चरित्रवान होना चाहिए। मांस-मद्द जैसे तामसिक पदार्थों के सेवन का त्याग करना चाहिए।

भारत में प्राचीन काल से ही विद्या और बुद्धि कौशल प्रखरता हेतु “गायत्री मंत्र” का विधान प्रचलित रहा है। पौराणिक काल में उतरने पर सावित्री यानी गायत्री, और सरस्वती देवी में तत्वतः भेद नहीं रहा। दोनो की उपासनाओं का एक ही मूल – फल है-बुद्धि का विकास । अतः सरस्वती साधना के दिन से गायत्री मंत्र का पाठ और भावार्थ भी बच्चों को समझाया जाना चाहिए।

 

*क्यों होता है सरस्वती पूजन? —-*

 

मान्यता है कि भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया। इस निर्माण में उन्हें कुछ कमी लगी, तब ब्रह्मा ने अपने कंमडल से जल छिड़का। तब एक सुंदर चतुर्भुजी स्त्री का प्राकट्य हुआ। जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे में पुस्तक, तीसरे में माला व चौथा हाथ वर मुद्रा में था। जैसे ही उन्होंने वीणा का मधुरनाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। संगीत की उत्पत्ति भी सरस्वती देवी के द्वारा ही हुई, इसलिए इन्हें वाणी व संगीत की देवी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर सरस्वती को यह वरदान दिया कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी पूजा की जाएगी। तब से इस दिन सरस्वती की आराधना की जाती है।

 

*मंडप बनाकर करें पूजन—*

 

सरस्वती पूजन के लिए पीली झंडी का मंडप बनाएं। इसके बाद गाय के गोबर से लेपकर उस स्थान पर स्वास्तिक बनाकर देवी के लिए आसन बनाएं। विग्रह को पंचामृत स्नान करवाकर पूजन शुरू करें। देवी को हल्दी मिले जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें कुमकुम, चावल, हल्दी चढ़ाएं। फिर पीले फल, पीले मिष्ठान्न के अतिरिक्त धूप, दीप व नैवेद्य तथा सुहाग का सामान चढ़ाएं और प्रार्थना व आरती करें।

 

*विद्यार्थी छू सकते हैं नई ऊचाइयों को*

“ऊ हीं क्लीं सोम सरस्वत्यै नमः”—–

इस मंत्र का जाप विद्यार्थियों के लिए बेहद लाभदायक है। इस मंत्र के जाप से शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं। इस मंत्र के जाप के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का माना गया है। इसके लिए सुबह स्नान करके 108 माला का जाप प्रतिदिन करना चाहिए। छात्र अपनी किताबें और कलम देवी के चरणों में रखते हैं,और वाद्य यंत्र की भी पूजा करते हैं।

यह दिन सृजनात्मकता के प्रतीक पीले रंग की वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। लोग पीले वस्त्र पहनते है, पीले पुष्य. भगवान को चढ़ाते है,घर में पीले पकवान बनते है। इस समय खेतों मैं भी पीली सरसों लहलहा रही होती है। जिससे समूचे भारतवर्ष में बांसती उत्सव की बहार रहती है। इन दिन सरस्वती पूजन का मुख्य रूप से बड़ा महत्व होता है।