पहले ही मैच में शतक ठोका तो इनाम में मिले शॉर्ट्स, भारत को दूसरे मैच में हार से बचाया और तीसरे में जिताया, फिर भी 6 महीने में करियर खत्म

पहले ही मैच में शतक ठोका तो इनाम में मिले शॉर्ट्स, भारत को दूसरे मैच में हार से बचाया और तीसरे में जिताया, फिर भी 6 महीने में करियर खत्म

मीडियावाला.इन।

भारत के एक ऐसे पूर्व क्रिकेटर का आज बर्थडे है जिन्होंने अपने फर्स्ट क्लास करियर की शुरुआत शतक के साथ की थी. इसके चलते उन्हें इनाम में शॉर्ट्स मिले थे. बाद में वह टीम इंडिया के लिए भी खेले और दूसरे ही मैच में भारत को हार से बचाने वाली पारी खेली. इसके बावजूद उनका इंटरनेशनल करियर छह महीने की चल सका. बाद में वे बीसीसीआई के बागी हो गए और इंडियन क्रिकेट लीग में खेलने लगे. इसके चलते सजा झेली और बैन लगा. मगर फिर माफी हो गई और वे फिर से बीसीसीआई के घरेलू टूर्नामेंट का हिस्सा बन गए. यहां बात हो रही है दीप दासगुप्ता (Deep Dasgupta) की. बंगाल से आने वाले विकेटकीपर बल्लेबाज दीप दासगुप्ता का आज जन्मदिन है. 7 जून 1977 को कलकता में उनका जन्म हुआ था. हालांकि क्रिकेट के खेल में उनकी दिलचस्पी और शुरुआती दिन दिल्ली में बीते. यहीं से उन्होंने क्रिकेट की राह पकड़ी और आगे बढ़े.

दीप दासगुप्ता बचपन में जिम्नास्ट थे. लेकिन क्रिकेट में उनकी बराबर रुचि थी. ऐसे में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट की कोच सुनीता शर्मा ने दीप की क्रिकेट में दिलचस्पी को देखते हुए उन्हें द्रोणाचार्य अवार्जी गुरशरण सिंह के पास भेज दिया. यहीं पर उन्होंने क्रिकेट की बारीकियां सीखीं और खुद को मांजा. इसके चलते वे दिल्ली की अंडर-16 टीम का हिस्सा बन गए. कुछ साल यहां खेलने के बाद वे बंगाल अपने घर लौट गए. फिर वहीं से खेलने लगे. शुरू में वे स्पेशलिस्ट बल्लेबाज के रूप में खेला करते थे. इसी की रूप में उन्होंने 1998-99 में बंगाल की ओर से बड़ौदा के लिए रणजी ट्रॉफी डेब्यू किया. इस मैच में उन्होंने शतक लगाया. इस पारी की बदौलत उन्हें अपने साथी खिलाड़ी श्रीकांत कल्याणी से गिफ्ट में शॉर्ट्स मिले थे.

3 मैच के बाद टीम इंडिया के संभावितों में चुने गए

इस बारे में दीप दासगुप्ता ने कहा था कि कल्याणी की खुद की स्पोर्ट्सवियर कंपनी थी. तो मैच से पहले उन्होंने शॉर्ट्स मांगे थे. इस पर कल्याणी ने कहा था कि अगर शतक लगाया तो शॉर्ट्स गिफ्ट मिलेंगे. बाद में ऐसा ही हुआ. हालांकि पहले मैच में शतक के बाद भी दीप दासगुप्ता की बंगाल टीम में जगह पक्की नहीं हुई. क्योंकि उस समय सबा करीम बंगाल के कप्तान थे और वे कीपिंग भी किया करते थे. ऐसे में सबा करीम के रिटायर होने तक दीप दासगुप्ता ने इंतजार किया. उनके जाने पर वे टीम में आ गए. तीन फर्स्ट क्लास मैच के बाद ही वे भारतीय क्रिकेट टीम के जिम्बाब्वे दौरे के संभावितों में चुन लिए गए. हालांकि उन्हें फाइनल टीम में जगह नहीं मिली.

दूसरे ही टेस्ट में टीम इंडिया के काम आए

फिर साल 2001 में टीम इंडिया के विकेटकीपर समीर दिघे के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद दीप को दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए चुन लिया गया. पहले उन्होंने पांच वनडे की सीरीज खेली. लेकिन इसमें बैट से वे बुरी तरह नाकाम रहे. नाबाद 24 रन उनका सर्वोच्च स्कोर रहा. साथ ही विकेट के पीछे उनके हिस्से दो कैच और एक स्टंपिंग आई. फिर टेस्ट सीरीज की बारी आई. यहां पोर्ट एलिजाबेथ टेस्ट में उन्होंने चौथी पारी में 63 रन की पारी खेलकर भारत के हार टालने में अहम भूमिका निभाई. यह पारी उन्होंने ओपन करते हुए खेली थी. यह पारी उन्होंने शॉन पॉलक, मखाया एनटिनी, जैक कैलिस जैसे गेंदबाजों के सामने खेली थी. इसके चलते उन्हें इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू टेस्ट टीम के लिए भी चुन लिया गया.

6 महीने के अंदर इंटरनेशनल करियर खत्म

इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने पहले ही टेस्ट में शतक लगाया. यह उनके इंटरनेशनल करियर का इकलौता शतक रहा. फिर अहमदाबाद में दीप दासगुप्ता ने दूसरे टेस्ट की दूसरी पारी में भी 60 रन की पारी खेली. मगर इसके बाद जिम्बाब्वे और वेस्ट इंडीज दौरे पर नाकामी के बाद वे बाहर कर दिए गए और कभी टीम इंडिया में नहीं आ सके. उन्होंने आठ टेस्ट के करियर में 28.66 की औसत से 344 रन बनाए. साथ ही 13 कैच लिए. इस तरह अक्टूबर 2001 से शुरू हुआ इंटरनेशनल करियर अप्रैल 2002 में सिमट गया.

फिर दीप घरेलू क्रिकेट में बिजी हो गए. लेकिन साल 2007 में इंडियन क्रिकेट लीग में शामिल होकर चौंका दिया. इसके चलते वे बैन हो गए. दो साल बाद 2009 में वे इस लीग से हट गए और रणजी खेलने लगे. उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 83 मैच में 30.20 की औसत से 3806 रन बनाए. यहां छह शतक और 21 अर्धशतक उनके नाम रहे. विकेटों के पीछे उन्होंने 190 कैच और 22 स्टंपिंग की.

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