इंदौर लेखिका संघ की एक और पहल : 24 वर्षों से संचालित चर्चित शृंखला "समय के हस्ताक्षर " में अब   युवा साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा

पहली  प्रस्तुति  :प्रसिद्ध साहित्यकार  इंदिरा दाँगी जी ने अपने नवीनतम रचना 'पुल' का पाठ किया
इंदौर लेखिका संघ की एक और पहल : 24 वर्षों से संचालित चर्चित शृंखला "समय के हस्ताक्षर " में अब   युवा साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा

मीडियावाला.इन।

प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था  इंदौर लेखिका संघ इंदौर  की संस्थापक साहित्यकार डॉ .स्वाति तिवारी द्वारा विगत 24 वर्षों से संचालित चर्चित शृंखला "समय के हस्ताक्षर " में अब   युवा साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा .इसी क्रम की पहली  प्रस्तुति के क्रम  में  प्रसिद्ध साहित्यकार  इंदिरा दाँगी जी ने अपने नवीनतम रचना 'पुल' की प्रस्तुति के साथ 'इंदौर लेखिका संघ' के चिरपरिचित कार्यक्रम ' समय के हस्ताक्षर' में युवाओं के शामिल किये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की ।युवा लेखिका इंदिरा डांगी समकालीन दौर में अत्यंत अल्प समय में एक विशिष्ट पहचान बनाने वाली लेखिका हैं। इनकी सर्जनात्मक उपस्थिति हिंदी जगत में आशा की एक नई किरण लेकर आई है।पिछले कुछ वर्षों में इंदिरा दाँगी को उनके लेखन के लिए कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया है . 13 फ़रवरी 1980 को मध्यप्रदेश के दतिया में जन्मी इंदिरा की चर्चित पुस्तकें हवेली सनातनपुररानी कमलापतिआचार्य, 150 प्रेमिकाएं ,बारहसिंगे का भुत इत्यादी हैं .लेखन के साथ साथ वे अपनी कथोपकथन शैली के लिए भी जानी  जाती हैं .अपनी विशिष्ठ कथा पाठ शैली में उन्होंने संस्था के लाइव कार्य क्रम में अपनी नवीनताम कहानी पुल का वाचन किया यह कहानी एक रहस्यमयी अंत के साथ बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है .गुंजन पारधी नामक बालक के करंट लगने पर ग्रामीणों द्वारा उसे गोबर और मिट्टी में दबाकर किये जा रहे इलाज के दृश्य के साथ यह आदिवासी जीवन की उन तमाम विडम्बनाओं पर करारा प्रहार करते हुए अभाव ग्रस्त जीवन और योजनाओं की विडम्बनाओं को भी एक शिक्षक के माध्यम से सहज और सरल किन्तु प्रभावी  प्रस्तुतीकरण द्वारा ग्रामीण अंचल में गहराई तक पैठे अंधविश्वासों को तो उजागर करती है ,  साथ ही कहानी के केंद्रीय पात्र स्कूल शिक्षक की घर -परिवार और  ग्रामीण परिवेश की समस्याओं में उलझती-सुलझती मनोव्यथा का भी सुंदर चित्रण किया।कहानी में विश्वास और अंधविश्वास की ऊहापोह को भी बेहद सहजता के साथ  रेखांकित किया । कहानी का अंत एक साए से मुलाक़ात के रूप में आदिवासी लोगों में प्रचलित लोक मान्यताओं को भी दर्शाती है .इंदिरा इस कहानी के अध्यम से आदिवासी समाज की स्थितियों को उजागर करने में सफल होती है .
इंदौर लेखिका संघ के द्वारा आयोजित इस इस कार्यक्रम का  संचालक  संस्था की सदस्य यशोधरा भटनागर ने किया .इंदिरा दाँगी जी का मंच परसभी श्रोताओं द्वारा  स्वागतकियागया .संघ की संस्थापक स्वाति तिवारी ने उनके लेखन की चर्चा  करते हुए कहा कि वे विलक्षण प्रतिभा की धनी ,जमीन से जुड़ी कहानीकार हैं ,यशोधरा  भटनागर ने  सूत्रधार के रूप में इंदिरा दांगी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला .विनीता तिवारी ने आभार प्रकट करते हुएकहा की आज एक एक इसी युवा कहानीकार मंच पर आयी हैं  जिन्होंने अल्प समय में हिंदी साहित्य जगत में अपनी पहचान स्थापित करते हुए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार ,भारतीय ज्ञानपीठ अनुशंसा अवार्ड ,बालकृष्ण शर्मा नवीन अवार्ड , दुष्यंत कुमार अवॉर्ड सहित अनेक अवार्ड प्राप्त किए है।

 संस्थापक अध्यक्ष डॉ. स्वाति तिवारी जी ,अध्यक्ष चेतना भाटी जी और सचिव विनीता तिवारी जी ने आमंत्रित अतिथि इंदिरा दाँगी के केसाहित्य पर टिप्पणी की  ।कार्यक्रम में सुषमा व्यास राजनिधि, संध्या चौधरी, हेमलता शर्मा, सुषमा मुनींद्र, कुसुम सोगानी ,शोभारानी तिवारी, नीति अग्निहोत्री,वंदना पुणतांबेकर,मंजुला भूतड़ा, संध्या जैन, प्रभा जैन, मुन्नी गर्ग,आशा जाकड़,हरजिंदर नारंग, क्षिप्रा अरोरा, ऋचा बियाणी, रश्मि सक्सेना, सीमा शाहजी,गीता नामदेव सहित संस्था की अनेक सदस्य उपस्थित थीं। इस अवसर पर इंदिरा दांगी ने इंदौर लेखिका संघ के इस आयोजन की प्रशंसा करते हुए डॉ स्वाति तिवारीएवं संस्था  को धन्यवाद दिया .

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