छत्तीसगढ़ की ऐसी अदालत, जहाँ देवी–देवताओं पर चलाया जाता मुकदमा और दी जाती है सजा

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छत्तीसगढ़ की ऐसी अदालत, जहाँ देवी–देवताओं पर चलाया जाता मुकदमा और दी जाती है सजा

अनिल तंवर की विशेष रिपोर्ट

आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ राज्य जहाँ नक्सलवाद से प्रभावित माना जाता है वहीं यहाँ की आदिवासी संस्कृति, रीति रिवाज, पूजा अनुष्ठान भी अनूठे होकर रहस्य-रोमांच से भरपूर है. यहां हर कदम पर ऐसे आश्चर्यजनक रहस्य और रोमांच है जो रहस्यमयी आदिवासी परम्पराओं से रुबरू कराती है.

यह अनोखी प्रथा है कि भंगाराम देवी की अदालत में देवी–देवताओं पर मुकदमा चलाया जाता और सजा जाती दी है जो संभवतया विश्व में और कहीं नहीं पाई जाती है. यह आयोजन भंगाराम देवी मेला भादो जात्रा कहलाता है और इस बार यह आज दिनांक 9 सितम्बर शनिवार को हो रहा है. यह स्थान कोंडागांव जिले के केशकाल नगर में स्थापित है जहाँ भंगाराम देवी का मंदिर है.

बस्तर के निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. श्री ओमप्रकाश सोनी बस्तर भूषण बताते है कि यह राजधानी रायपुर से करीब 200 किमी दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर कांकेर के बाद केशकाल की सर्पाकार घाट के बाद बांयी तरफ 2 किलोमीटर पर स्थित है. वह बताते हैं कि उन्होंने यहाँ देखा कि देवी का दरबार लगा हुआ है और देवता, देवी के दरबार में अपनी हाजिरी लगाने के लिये उपस्थित है. फरियादी, देवी के पास देवताओं की शिकायत कर रहे है और देवी निष्पक्ष न्याय करते हुए देवताओं को भी सजा के जंजीरों में कैद करने का आदेश देती है.

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अपनी अनूठी आदिम मान्यताओं को समेटे हुए बस्तर की दुनिया में ऐसी अनेकों अबूझ पहेलियां है. ऐसी ही एक अनूठी मान्यता, और अटूट विश्वास ग्रामीणों के दिलों में है कि भंगाराम माई के द्वार में आकर हर फरियादी को न्याय मिलता है. भले ही दोषी देवता ही क्यों ना हो उन्हें भी बराबर सजा मिलती है.

वह आगे बताते है कि, इन समस्याओं के पीछे मान्यता होती है कि अमूक देवता के कारण यह समस्या या विपत्ति आयी है जिसमें ग्रामीण फरियादी एवं आरोपित देवता भंगाराम माई के न्यायालय में उपस्थित होते है. भंगाराम माई न्यायाधीश के रूप में सिरहा गायता के माध्यम से दोनों पक्षों के आरोप एवं दलीलों को सुनती है तथा उसके बाद दोषी देवता को बर्खास्तगी या उनकी पूजा बंद करने की सजा सुनाई जाती है. कभी कभी देवताओं को कैद करने की सजा भी दी जाती है. ऐसे देवताओं को मंदिर परिसर में बने कारागार में छोड़ दिया जाता है. जो देवता निर्दोष होते है उन्हें ससम्मान दोष मुक्त किया जाता है . यह बेहद ही आश्चर्य की बात है कि न्यायाधीश के रूप में देवी देवताओं को कैद करने की सजा देती है और उसका अक्षरशः पालन भी होता है.

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उन्होंने ऐसी ही एक अनूठी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि, जब वह 2018 में भंगाराम माई के इसी जात्रा में उपस्थित थे तब माई के अदालत में दो कुंअरपाट आंगा के असली नकली होने का विवाद लाया गया था. मांझी मुखियों की सभा में विचार विमर्श के उपरांत वास्तविक कुंअरपाट आंगा की पहचान की गई और असत्य कुंअरपाट को मंदिर के पास स्थित कारागार में लाया गया जहां पर सैकड़ों अमान्य किये गये देवताओं के आंगा और उनके श्रृंगार बिखरे पड़े थे. वहां पर असत्य कुंअरपाट को लाया गया और कुल्हाड़ी से आंगा को काटकर उसकी मान्यता सदा के लिये रदद कर दी गई.

यहां के प्रमुख देव जिन गांवों में देवी देवता द्वारा कार्य नहीं किया जाता, उन्हें उक्त मेले में भंगाराम देवी कुंवरपाट जो प्रमुख देवी है, के सामने प्रस्तुत करते हैं। ऐसे देवी देवताओं की वहां पेशी भंगाराम देवी के सामने होती है, तब देवी मुकदमे की सुनवाई कर सजा का निर्धारण करती है.

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इलाके के 9 परगना के 55 राजस्व ग्रामों में स्थापित सैकड़ों देवी देवताओं की आराध्य देवी है. हर साल लगने वाले इस मेले में सभी ग्रामवासी अपने अपने ग्राम के देवी देवताओं को लेकर यहां पहुंचते हैं, जहां एक देव अदालत लगती है जिसमें आरोपी होते हैं देवी देवता (जिन पर भक्तों के काम न करने के आरोप होते हैं) और फरियादी होते हैं ग्रामवासी. इस देव अदालत में सभी देवी देवताओं की पेशी होती है और जिस देवी देवता के खिलाफ शिकायत होती है उसकी फरियाद भंगाराम देवी से की जाती है. सुनवाई पश्चात न्याय किया जाता है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रियंका कौशल बताती है कि – इस आयोजन में देवी-देवताओं को परंपरानुसार पद और प्रतिष्ठा के हिसाब से स्थान दिया जाता है, इनके साथ प्रतिनिधि के रूप में पुजारी, गायता, सिरहा, ग्राम प्रमुख, मांझी, मुखिया और पटेल पहुंचते हैं. यहां होने वाले आयोजन में एक बात खास है कि यहां बिना मान्यता के किसी भी नए देव की पूजा नहीं की जा सकती है. वहीं जब ग्रामीणों की मांग पर ही नए देवताओं को मानने की मान्यता दी जाती है.

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यहां सजा पाने वाले देवी-देवताओं की वापसी का भी प्रावधान है, लेकिन यह तब ही संभव है जब यहां वे अपनी गलतियों को सुधारते हुए भविष्य में लोक कल्याण के कार्यों को पहले करने का वचन देते हैं. यह वचन सजा पाए देवी-देवता संबंधित पुजारी के सपने में आकर देते हैं. भंगाराम देवी की इस अदालत में देवी-देवताओं की पेशी के लिए उन्हें मानने वाले सैकड़ों किलो मीटर पैदल सफर तय कर पहुंचते हैं. कई तो ऐसे इलाकों से यहां आते हैं, जहां ना तो बिजली की सुविधा है और ना ही सड़कों की व्यवस्था. लेकिन इसके बाद भी उन्हें तय समय के कारण इस अदालत में आना ही पड़ता है.

सुबह से लेकर शाम तक ग्रामीण भंगाराम देवी के सामने शिकायत सुनाते हैं. सबकी शिकायतें सुनने के बाद शाम को भंगाराम देवी अपने फैसले सुनाती है. असल में इस पूरी प्रक्रिया में भंगाराम देवी का एक पुजारी बेसुध हो जाता है. मान्यता है कि अनुसार उसके अंदर स्वयं देवी आ जाती हैं और फिर देवी उसी के माध्यम से अपने फैसले सुनाती है.

भंगाराम देवी के पास जाने से पहले भंगाराम सेवा समिति उक्त गांवों से आए देवी देवताओं को लेकर पहले थाने जाती है, जहां उक्त देवी देवता की थाने में हाजिरी लगती है. केशकाल थाने में पुलिस जवान देवी देवताओं की पूजा करते हैं, फिर वहां से फिर 1-4 के गार्ड पुलिस सुरक्षा के साथ देवी देवताओं को पूजा स्थल भंगाराम देव मंदिर तक ससम्मान लेकर जाते हैं.

यहाँ यह देवी इनकी परीक्षा लेती है और अपराधी पाये जाने पर उसे या उन्हें मन्दिर के पीछे खाई में फेंकने का हुक्म देती है. इस खाई में सोने-चाँदी के आभूषण, चाँदी के पुराने सिक्के तथा देवी-देवताओं के प्रतीक आँगा, डोली, टोकरे आदि फेंके गये हैं और कुछ तो ज़मीन में गाड़े गये हैं. फेंके गये सिक्के “हाँडा देव” यानी “हण्डा देव” के प्रतीक हैं. बस्तर अंचल में प्राय: “हाँडा देव” के विषय में कहा-सुना जाता है कि जब सिक्के किसी हाँडी या धातु के किसी पात्र में भर कर जमीन में गाड़ दिये जाते हैं तो कुछ समय बाद वे सिक्के देवता के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं.

इस देवी के बारे में कहा जाता है कि यह देवी बंगाल से आई थी. किन्तु कोंडागाँव जिले के बहीगाँव ग्राम के निवासी और उत्तर बस्तर, विशेषत: कोंडागाँव जिले, के पुरातात्त्विक अवशेषों के विषय में काफी जानकारी रखने वाले श्री घनश्याम सिंह नाग अपने विभिन्न स्रोतों के हवाले से भंगाराम देवी का आगमन वारंगल से होना बताते हैं. उनके अनुसार, लोग यह मानते हैं कि देवी भंगाराम वारंगल से आई. चूँकि लोग वारंगल का उच्चारण “ओरंगाल” किया करते थे, और आज भी लगभग यही उच्चारण करते हैं. इससे देवी का नाम “ओरंगाल” और फिर बिगड़ते-बिगड़ते “भोरंगाल” और अन्त में “भंगाराम” हो गया.

गाँव-गाँव से लाये गये ऐसे देवी-देवता, जो नकारात्मक भूमिका निभाते हैं, को यहाँ लाकर माँ भंगाराम के न्यायालय में पेश किया जाता है. माँ भंगाराम उनकी परीक्षा लेती हैं और अपराधी पाये जाने पर उन्हें खाई में फेंकने का हुक्म देती हैं. वह ऐसे देवी-देवताओं को ग्यारह महीने तक अपने पास एक कमरे में “रिमाण्ड” पर रखती हैं और भादों मास में होने वाले जात्रा के समय इन्हें खाई में फिंकवा देती हैं.

मान्यता है कि यहाँ से किसी भी वस्तु को कोई भी उठा कर ले जाने की हिम्मत नहीं करता. यदि कोई ऐसा करने का प्रयास भी करता है तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ता है. यहाँ तक कि ऐसे व्यक्ति के पूरे परिवार का नाश हो जाता है.