रविवारीय गपशप : प्रशासन में बैचमेट्स के रोचक किस्से!

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रविवारीय गपशप : प्रशासन में बैचमेट्स के रोचक किस्से!

जिस तरह सहोदर भाइयों में प्यार के साथ साथ एक अव्यक्त प्रतियोगिता रहा करती है , उसी तरह नौकरी में एक साथ भर्ती हुए अधिकारियों के बीच भी अबोला सा प्रतिस्पर्धा भाव होता है , और इसी वजह से कई बार बैचमेट अपना रुआब जमाने के लिये अपने साथी की पकी पकाई रसोई में नुस्ख़ निकालते दिखाई देते हैं । मैं जब इंदौर में अपर कलेक्टर के बतौर पदस्थ था , तब इंदौर जिले में सहकारी संस्थाओं के मकड़ जाल में फंसे सदस्यों को उनके प्लॉट दिलाने का अभियान सम्भाग आयुक्त श्री बसन्त प्रताप सिंह की अगुआई में प्रारंभ हुआ था । सहकारी संस्थाओं के साथ साथ सिंह साहब ने इस दायरे में आईडीए को भी ले लिया , जहाँ नियम और क़ानून के पेंच में फसीं कुछ योजनाओं के हितग्राही भी अपनी बारी का इन्तिजार कर मायूस हो रहे थे । प्रत्येक सप्ताह इस व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की बैठक सिंह साहब ख़ुद लिया करते । एक बैठक में आईडीए की किसी स्कीम में कुछ क़ानूनी पेचीदगियों को दूर करने के लिए संस्था के सीईओ श्री प्रमोद गुप्ता ने मध्यप्रदेश शासन को प्रस्ताव भेजने की जानकारी दी । आवास विभाग के प्रमुख सचिव कमिश्नर साहब के बैचमेट ही थे , तो मेरे मुँह से निकल गया , कि अब तो समस्या हल हो ही जाएगी । सिंह साहब ने बोला ज़्यादा ख़ुशफ़हमी मत पालो मैं जानता हूँ वो कितने बारीकी ढूँढने वाले अफ़सर हैं , और सचमुच तीन चार बार की लौटाफ़ेरी के बाद ही प्रस्ताव पर सहमति मिल पाई ।

मैं सीहोर में मुख्यालय के अनुविभाग का एसडीएम था , तब सीहोर में अपर कलेक्टर श्री अरुण तिवारी जी हुआ करते थे । इसी समय भोपाल सम्भाग में उपायुक्त राजस्व के पद पर उनके बैचमेट की नियुक्ति हो गई । उन दिनों सम्भाग के सभी राजस्व अधिकारियों के राजस्व सम्बन्धी कार्यों की समीक्षा करने की जिम्मेदारी उपायुक्त राजस्व की हुआ करती थी , जो कमिश्नर की ओर से सबकी नकेल कसा करते थे । मैंने तिवारी साहब से कहा सर एक बार भोपाल चलकर डिप्टी कमिश्नर साहब से मिल लेते हैं , कभी कोई कामधाम पड़े तो उनका सॉफ्ट कॉर्नर रहेगा । तिवारी साहब ने सहज भाव से सहमति दे दी और उसके अगले सप्ताह ही किसी बैठक में मैं उनके साथ हो लिया और उन्होंने बाकायदा डिप्टी कमिश्नर साहब के कक्ष में बैठकर मुझे चाय पिलवाई, परिचय कराया और ये भी कहा कि ये मेरे छोटे भाई जैसा है । मैं बड़े संतोष के साथ वापस लौटा , पर न जाने क्या हुआ , अगले सप्ताह से ही छोटी छोटी बातों पर मुझे कमिश्नर कार्यालय से अप्रसन्नता व्यक्त करने वाले पत्र मिलने आरंभ हो गए और एक दिन तो “क्यों ना आपको दण्डित करने की कार्यवाही की जाए की इबारत से एक नोटिस आ गया “। मैं घबरा के तिवारी साहब के पास गया और उन्हें सारे पत्राचार दिखाए और पूछा सर मेरा तो इसमें कोई क़ुसूर ही नहीं है , और इतने भारी भरकम आक्रमण हो रहे हैं , जबकि आप तो मिलवा के आए थे । तिवारी साहब बोले कोई बात नहीं , मैंने बोल दिया था इसलिये भाव खा रहा है , मैं फ़ोन कर के समझा दूँगा । ये तो पता नहीं कि उन दो मित्रों में क्या संवाद हुआ , पर बिना वजह की टांग खिंचाई उसके बाद नहीं हुई ।

मैं ग्वालियर में परिवहन विभाग में उपायुक्त प्रशासन था तो ग्वालियर जिले में एडीएम मेरे बैचमेट हुआ करते थे । एक दिन सुबह-सुबह परिवहन विभाग के आयुक्त श्री एनके त्रिपाठी जी का फोन आया और वे कहने लगे “ आनंद मैं शासन द्वारा स्वीकृत लाइसेंस के तहत रिवॉल्वर ख़रीदने कानपुर आया था , पर मैं देख रहा हूँ कि क्रय की अवधि पिछले सप्ताह ही समाप्त हो गई है , क्या आप कलेक्ट्रेट में अपने परिचय से इस अवधि में वृद्धि का पत्र भिजवा सकते हैं ? “ मैं तो मूल रूप से प्रशासनिक अधिकारी ही था , और एक बार लाइसेंस मिल जाने के बाद शस्त्र क्रय की अवधि की अनुमति तो बड़ी सहज औपचारिक प्रक्रिया थी तो मैंने उन्हें आश्वस्त किया और अपने बैचमेट एडीएम साहब को ह्वाट्सऐप पर संबंधित दस्तावेज़ और आवेदन की प्रति भेज कर फोन किया तथा अवधि वृद्धि का अनुरोध किया । एडीएम साहब यूँ तो बड़े सरल माने जाते थे , पर उस दिन तो उन्होंने हाथ भी न रखने दिया , कहने लगे भाई ओरिजिनल लाइसेंस बुलवा ले , आवेदक को ख़ुद ही आना पड़ेगा और रजिस्टर पर दस्तखत होंगे तभी फाइल प्रोसेस होगी । मेरे तो होश उड़ गए , बॉस को किए वायदे की धज्जियाँ उड़ती दिख रही थी । मैंने कलेक्टर राकेश श्रीवास्तव जी को फोन लगाया और अपनी परेशानी बतायी , वे हँसने लगे और बोले आप मुझे ह्वाट्सऐप कर दो और एक घण्टे में किसी को मेरे ऑफिस भेज दो , आपको अनुमति मिल जायेगी, और सचमुच एक घण्टे में मेरे निज सचिव भदकारिया बाबू , जाकर अवधि वृद्धि की अनुमति लेकर मेरे पास आ गये ।