रविवारीय गपशप: सबक – बिना जांचे सिफारिश पर काम ना करें

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रविवारीय गपशप: सबक – बिना जांचे सिफारिश पर काम ना करें

आनंद शर्मा 

सरकारी कामकाज़ करते वक्त हमें लोगों की अनेक सिफारिशें आती हैं , बहुधा सिफ़ारिशी काम होने लायक़ हो तो हम करते भी हैं , पर कई बार काम कुछ ऊँच नीच वाला हो और बात बिगड़ने लगे तो सिफ़ारिश करने वाले सज्जन नज़र भी नहीं आते । बात पुरानी है , तब मैं रतलाम में सीईओ जिला पंचायत के पद पर कार्यरत था । एक दिन एक सज्जन का फ़ोन आया कि वे मिलने आना चाहते हैं । ये भाई साहब उन दिनों सत्ताधारी दल के प्रमुख लोगों में गिने जाते थे । मैंने विनम्रता पूर्वक फोन पर कहा कि मुझे अभी शासकीय आवास आबंटित नहीं हुआ है अतः आप ऑफिस में पधारें । अगले दिन वे ऑफिस आ गये , मैंने उनके लिए चाय बुलवाई । चाय पीते पीते वे बोले आपके बारे में सुना था कि आप बढ़िया अधिकारी हैं , इसलिए मिलने चला आया वरना हम किसी के दफ्तर नहीं जाते हैं । मैं सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ और इस औपचारिक मुलाक़ात के बाद उन्हें उनकी कर तक छोड़ने भी गया ।

कुछ माह बाद रतलाम से मेरा स्थानान्तरण परिवहन उपायुक्त प्रशासन के पद पर ग्वालियर हो गया और मैंने नए पद पर आमद देकर काम प्रारम्भ कर दिया । उपायुक्त प्रशासन होने के नाते आम तौर पर मुझे विभाग की स्थापना और प्रशासन का काम देखना था , पर राज्य परिवहन प्राधिकार का सचिव होने के नाते वाहनों के अंतर्राज्यीय मार्ग के अस्थायी परमिट भी मुझे ही जारी करने होते थे । यह था तो एक अर्ध न्यायिक स्वरूप का कार्य , जिसमें परमिट चाहने वाले आवेदकों की सुनवाई के पश्चात आदेश पारित करने होते थे , पर इसमें बड़ी सिफ़ारिशें आया करती थीं हालाँकि मैं गुणवागुण पर विचार कर ही अपने निर्णय लेता था । एक दिन रतलाम वाले उन्हीं नेता जी का मोबाइल पर फोन आया , जिनके व्यवहार से मैं बड़ा प्रभावित था । उन्होंने कहा कि आजकल वे भी ग्वालियर आ गए हैं , मैंने प्रसन्नता व्यक्त की तो वे आगे बोले कि फ़लाँ मार्ग पर लगे आवेदनों में फ़लाँ व्यक्ति को परमिट मिल सके तो ग्रांट कर दें । मैंने नाम नोट किया और दूसरे दिन फाइल देख कर उन्हें बताया कि आपके आवेदक की बस अन्य आवेदकों की तुलना में पुराने मॉडल की है , और नियमों में नए मॉडल की बस को प्राथमिकता देने का प्रावधान है , इसलिए आप के सिफारिशी आवेदक का काम संभव नहीं है । बस मालिक उस वक्त सम्भवतः उन्हीं के पास बैठा था , क्योंकि थोड़ी ही देर में उनका वापस पलट कर फ़ोन आया कि जिनके बारे में सिफारिश की गई है , उसकी बस तुलनात्मक रूप से ज़्यादा सीट वाली है इसलिए उसे ही पात्रता है । मैं तबतक दफ़्तर से घर चल चुका था , अतः मैंने कहा , यदि ऐसा है तो फिर नियमानुसार उन्हें परमिट मिल जाएगा । दूसरे दिन मामले की सुनवायी के वक़्त सिफ़ारिशी सज्जन के वकील ने एक आवेदन के साथ आरटीओ का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया जिसमें प्रार्थी के बस की सीटिंग केपेसिटी बढ़ी हुई थी और सभी आवेदकों से ऊपर थी । नियम में कोई बाधा नहीं थी, इसलिए बस का परमिट उसे जारी हो गया पर प्रतिद्वंदी बस आवेदक ने राज्य के अपीलीय प्राधिकरण के यहाँ इस आशय की अपील लगा दी कि बढ़ी हुई बस क्षमता फर्जी है , और वास्तविक रूप में बस में सीटें कम हैं । ट्रिब्यूनल्स के पीठासीन न्यायाधीश ने वकीलों की एक समिति बना कर इंस्पेक्शन रिपोर्ट बुला ली और अपील में कही बातें सच साबित हुईं । अपीलीय प्राधिकारी ने जो सीनियर जिला जज स्तर के वरिष्ठ न्यायविद हुआ करते थे , मेरा आदेश अपास्त करते हुए केस रिमांड कर न्यायोचित निर्णय लेने को कहा और आदेश में ये भी लिख दिया कि सचिव ने देखसुन कर आदेश पारित नहीं किया है । आदेश पढ़ कर मुझे क्षोभ और क्रोध दोनों हुआ , क्षोभ इस कारण कि आख़िर तुरत प्रस्तुत प्रमाणपत्र की जाँच मुझे ही करा लेनी चाहिए थी तो प्राधिकार की कठोर टिप्पणी मुझे न मिलती । मैंने तुरंत आरटीओ को लापरवाही के लिए कारण बताओ सूचना पत्र जारी किया और वापस सुनवाई कर , सीटिंग केपेसिटी में सबसे ज़्यादा और मेक में सबसे नई बस के दूसरे आवेदक को परमिट जारी कर दिया । इसके बाद शाम को मैंने नेताजी को फ़ोन लगाया और कहा कि आपका सिफ़ारिशी आवेदक तो फर्जी प्रमाणपत्र के सहारे परमिट चाह रहा था और आपने भी बिना तस्दीक के ऐसे फर्जी आदमी की सिफारिश कर मुझे उसकी मदद करने को बोल दिया ? मेरे स्वर में रोष था पर नेताजी ने ठण्डे स्वर में कहा “ इसमें क्या बुरा मानना भाई , हमारे पास तो सभी किस्म के लोग आते हैं , अब काम सही है या ग़लत इसकी तस्दीक तो आपको ख़ुद कर लेनी थी ।” मैंने अपने क्रोध को ज़ब्त किया और गाँठ बाँधी की मात्र सिफारिश के आधार पर बिना जांचे कभी किसी की मदद न करूँगा ।