सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी से सरकार पर दबाव: विजय शाह अब बोझ बने

- भोपाल से दिल्ली तक सत्ता और संगठन में हलचल, अदालत की सख्ती ने बदले राजनीतिक समीकरण

85

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी से सरकार पर दबाव: विजय शाह अब बोझ बने

Bhopal-New Delhi: मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह को लेकर विवाद अब किसी एक बयान या व्यक्तिगत चूक तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब सत्ता की संवैधानिक जवाबदेही और राजनीतिक नैतिकता की कसौटी बन चुका है। कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की खुली नाराजगी ने भाजपा सरकार और संगठन दोनों को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को सियासी गलियारों में सीधी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। अदालत का यह कहना कि अब माफी मांगने में बहुत देर हो चुकी है, केवल कानूनी टिप्पणी नहीं बल्कि राजनीतिक जिम्मेदारी तय करने का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

 

● सिर्फ माफी नहीं- जवाबदेही तय करने का संकेत

सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक मामलों के जानकार मानते हैं कि अदालत अब केवल शब्दों की गलती नहीं, बल्कि पद पर बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी और आचरण पर फोकस कर रही है। कोर्ट की टिप्पणी यह संकेत देती है कि संवैधानिक पद पर बैठे मंत्री की भाषा, सोच और संवेदनशीलता तीनों न्यायिक निगरानी के दायरे में हैं। कोर्ट रुख यह भी दर्शाता है कि अगर सरकार स्वयं कार्रवाई नहीं करती, तो अदालत निर्देशात्मक भूमिका अपनाने से पीछे नहीं हटेगी। इसी कारण यह मामला अब न्यायपालिका और कार्यपालिका की गरिमा से भी जुड़ता जा रहा है।

● मोहन सरकार पर सीधा असर, डैमेज कंट्रोल की मजबूरी

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पर दबाव खुलकर सामने आने लगा है। सत्ता के भीतर की चर्चाओं के अनुसार सरकार अब यह नहीं देख रही कि विजय शाह कानूनी रूप से दोषी सिद्ध होते हैं या नहीं, बल्कि यह देख रही है कि इस पूरे प्रकरण से सरकार को कितना राजनीतिक नुकसान हो सकता है। भाजपा नेतृत्व को यह स्पष्ट आशंका है कि अगर अगली सुनवाई में अदालत ने सख्त टिप्पणी या निर्देश जारी किया, तो उसका सीधा असर सरकार की छवि, प्रशासनिक स्थिरता और सामाजिक संदेश पर पड़ेगा। यही कारण है कि इस्तीफा अब नैतिक नहीं बल्कि रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

● भाजपा चिंतित- असहज स्थिति से बचने की कोशिश

भाजपा संगठन के स्तर पर यह मामला गंभीर असहजता पैदा कर चुका है। वरिष्ठ नेताओं की राय है कि यदि मामला पूरी तरह अदालत के भरोसे छोड़ दिया गया, तो भविष्य में हर विवादित बयान पर न्यायिक हस्तक्षेप की मिसाल कायम हो सकती है।

इसी वजह से संगठन के भीतर यह संदेश मजबूत होता दिख रहा है कि विजय शाह को हटाकर एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया जाए, ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि भाजपा न्यायपालिका की भावना और संवैधानिक मर्यादा को गंभीरता से लेती है।

● इस्तीफा या कोर्ट का निर्देश-विकल्प सीमित

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय शाह के सामने अब विकल्प सीमित रह गए हैं। पहला विकल्प स्वेच्छा से इस्तीफा देकर नुकसान को सीमित करना। दूसरा विकल्प स्वास्थ्य या व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर पद छोड़ना। तीसरा विकल्प अदालत के निर्देश का इंतजार करना, जिसे सबसे जोखिम भरा माना जा रहा है। यदि तीसरा रास्ता चुना गया, तो यह स्थिति न केवल विजय शाह बल्कि पूरी सरकार के लिए राजनीतिक और नैतिक रूप से शर्मनाक हो सकती है।

● विपक्ष को मुद्दा-सरकार की नैतिकता पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को एक बड़ा राजनीतिक हथियार दे दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा केवल तब कार्रवाई करती है, जब अदालत मजबूर करती है। विपक्ष इस मुद्दे को संवैधानिक मर्यादा, महिला सम्मान और सत्ता की जवाबदेही से जोड़कर सरकार को घेरने की तैयारी में है।

● और अंत में

यह मामला अब यह तय करेगा कि सरकार खुद निर्णय लेकर संदेश देती है या न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ एक बयान का विवाद नहीं बल्कि सत्ता की संवैधानिक परीक्षा है।

आने वाले दिन यह बताएंगे कि भाजपा राजनीतिक विवेक दिखाती है या न्यायिक आदेश का इंतजार करती है। कुल मिलाकर अब अदालत की नाराजगी राजनीति की दिशा तय करेगी।