सरकारी आयुर्वेद कॉलेजों में टॉक्सिकॉलोजी का पद नहीं, रिसर्च क्षेत्र में सबसे बढ़ी बाधा

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सरकारी आयुर्वेद कॉलेजों में टॉक्सिकॉलोजी का पद नहीं, रिसर्च क्षेत्र में सबसे बढ़ी बाधा

भोपाल :  प्रदेश के सात सरकारी आयुर्वेद कॉलेज बीते कई साल से सिर्फ 75 सीटों के साथ संचालित हो रहे हैं। जबकि देश के दूसरे राज्यों में कॉलेज 100 से लेकर 200 सीटों तक की मान्यता हासिल कर चुके हैं। मप्र में यह स्थिति इसलिए है क्यों कि यहां किसी भी कॉलेज में आयुर्वेद शिशु रोग विशेषज्ञ जिसे कौमारभृत्य कहा जाता है का एक भी पद स्वीकृत नहीं है। इतना ही नहीं सिर्फ भोपाल के पंडित खुशीलाल आयुर्वेद कॉलेज को छोड़ दें तो शेष छह आयुर्वेद कॉलेजों में टॉक्सिकोलॉजी यानि अंगदतंत्र के प्रोफेसर का पद स्वीकृत नहीं है। इतने महत्वपूर्ण विषयों के मामले में प्रोफेसर के पद स्वीकृत न होने के कारण सरकारी आयुर्वेद कॉलेजों में बीएएमएस की सीटें अटकी हुई हैं। जब पद ही सृजित नहीं हैं, तो इन पदों पर नियुक्तियां होना असंभव है। यही कारण है कि इन कॉलेजों में उच्च स्तरीय विशेषज्ञता और शोध कार्य ठप पड़े हैं। स्टाफ की इस कमी का सीधा असर प्रदेश की आयुर्वेद शिक्षा की क्षमता पर पड़ रहा है। मानकों के अनुसार, किसी भी कॉलेज में बीएएमएस की 100 सीटें तभी स्वीकृत हो सकती हैं जब वहां अनिवार्य विभागों में प्रोफेसरों की तैनाती हो। इन दो प्रमुख विभागों में प्रोफेसरों की कमी के कारण प्रदेश का कोई भी शासकीय आयुर्वेद कॉलेज 100 सीटों के आंकड़े को नहीं छू पा रहा है।

 नए कॉलेजों की घोषणा और रिक्त पदों की चुनौती
वर्तमान में प्रदेश के शासकीय आयुर्वेद कॉलेजों में टीचिंग स्टाफ, चिकित्सक स्टाफ और पैरामेडिकल स्टाफ को मिलाकर 100 से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पुराने कॉलेजों में ही स्टाफ की भारी कमी है, तो आने वाले वर्षों में प्रस्तावित 11 नए शासकीय आयुर्वेद कॉलेज कैसे संचालित होंगे। बिना नए पदों के सृजन और रिक्त पदों की पूर्ति के, प्रदेश की आयुर्वेद चिकित्सा व्यवस्था केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित रह जाएगी। छात्रों और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में आयुर्वेद को मुख्यधारा में लाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले कौमारभृत्य और अगदतंत्र जैसे विभागों में प्रोफेसरों के पद सृजित कर भर्ती प्रक्रिया तेज करनी होगी।