आम आदमी के कपड़े तो पहले से उतरे हुए हैं !

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आम आदमी के कपड़े तो पहले से उतरे हुए हैं !

अन्ना दुराई

इन दिनों हमारे नेता एक दूसरे को नंगा बताने में जुटे हुए हैं। पहले सरकार के मुखिया ने विपक्ष को नंगा कहा। जवाब में विपक्ष ने विभिन्न मोर्चों पर सरकार की कमियाँ गिनाते हुए उनकी नंगई उजागर कर दी। पक्ष विपक्ष का यह आपसी युद्ध एक तरफ है लेकिन असल आकलन जरूरी है। देखा जाए तो रोजमर्रा के जीवन में विभिन्न समस्याओं के बोझ तले दबे आम आदमी के कपड़े तो पहले से ही उतरे हुए हैं। सुबह होती है, शाम होती है, जिंदगी यूँ तमाम होती है की तर्ज पर आम आदमी अपने और अपने परिवार का जीवन ढोते नजर आता है।
महंगाई का कहर, कदम कदम पर टैक्स, थोपे गए नियम जिनका पालन असंभव। पुलिस प्रशासन का आम आदमी के प्रति व्यवहार जानवरों से भी बदतर। तनख्वाह पाने वाले अधिकारी कर्मचारी बिना रिश्वत लिए कोई काम नहीं करते, ये आरोप आम। आनाकानी करो तो जवाब मिलता है, हमें पैसा ऊपर भेजना पड़ता है। जनता पर पहले ही इतने सारे कर लाद दिए गए हैं। मरता नी क्या करता, आदमी इसकी व्यवस्था में जूटा रहता है। सरकारें भी अलग अलग तरीके से कर वसूली का कोई मौका नहीं छोड़ती। यहां तक कि अब सार्वजनिक शौचालय के उपयोग का शुल्क बढ़ाने पर भी विचार हो रहा है। यानी हलका होना भी आम आदमी को भारी पड़ेगा। लगता है, सरकार का बस चले तो एक नंबर यानी लघु शंका को भी शुल्क के दायरे में ले आए। कभी बोर्ड पर टैक्स लगाने की बात होती है तो कभी अन्य किसी पर। ऐसा लगता है सरकारें आम आदमी से पैसा छिनने के तरीके ढूँढती रहती है। आम आदमी सरकारी बोझ तले दबा ही रहता है। सोचता हूँ, सरकारें लेती ही लेती है, बदले में देती क्या है। विभिन्न प्रकार के डर के सिवाय ज्यादा कुछ नहीं।
कभी कभी लगता है, हम कितने लाचार, बेसहारा और असहाय से हो गए हैं। कई मौकों पर सामने दिखता है, ये गलत हो रहा है, हमारा मन कचोटता है, कसमसाता है लेकिन हम कुछ कर नहीं पाते। सिर्फ सब कुछ होता देखने के अलावा अपने पास कोई चारा नहीं रहता। जनता जब तक गलत चीजों का प्रतिकार करना नहीं सिखेगी। लगातार हो रहे अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं करेगी तब तक यूँ ही मौके बेमौके जलील और अपमानित होती रहेगी।