
झाड़ू से आगे की लड़ाई- इंदौर की बदली हुई स्वच्छता यात्रा: युवा IAS अधिकारी प्रखर सिंह के सामने चुनौती रैंकिंग बनाए रखने की!
इंदौर से अभिषेक मिश्रा की विशेष रिपोर्ट
इंदौर: भागीरथपुरा के बाद इंदौर के लिए स्वच्छता का ताज बचाने की नहीं, भरोसा लौटाने की लड़ाई है और इस सबसे कठिन इम्तिहान के केंद्र में आ गए हैं स्वच्छता मिशन प्रभारी युवा IAS अधिकारी प्रखर सिंह, जिनके सामने चुनौती रैंकिंग बनाए रखने के साथ साथ शहर के विश्वास को फिर से मजबूत करने की भी है, जिसने स्वच्छता को आदत नहीं बल्कि पहचान बना लिया था।
वैसे इंदौर को देश की स्वच्छता राजधानी यूँ ही नहीं कहा गया, यह पहचान वर्षों की सतत मेहनत, नागरिक अनुशासन और प्रशासनिक प्रतिबद्धता से बनी है, लेकिन भागीरथपुरा के दूषित जल कांड ने पहली बार इस चमकदार छवि को भीतर तक झकझोर दिया। यह घटना सिर्फ एक क्षेत्र में गंदा पानी आने की खबर नहीं रही, उस भरोसे पर भी चोट बन गई, जिस पर इंदौर की स्वच्छता यात्रा टिकी है।
ऐसे ही नाजुक और असहज दौर में स्वच्छता मिशन की जिम्मेदारी प्रखर सिंह के हाथों में आई है, और यही वजह है कि उनके सामने चुनौती सफाई व्यवस्था को चलाने के साथ साथ, सिस्टम की विश्वसनीयता को दोबारा खड़ा करने की भी है। भागीरथपुरा ने इतना तो साफ कर दिया कि स्वच्छता अब केवल कचरा प्रबंधन, चमकती सड़कों या राष्ट्रीय रैंकिंग तक सीमित नहीं रह सकती. नल से बहता पानी, पाइपलाइनों की हालत, सीवरेज और जल प्रदाय के बीच तालमेल भी स्वच्छता का अभिन्न हिस्सा हैं।
इस घटना के बाद इंदौर की स्वच्छता यात्रा का चरित्र बदल चुका है..यानी अब “दिखने वाली सफाई” के साथ “महसूस होने वाली सुरक्षा” की भी परीक्षा भी होगी। प्रखर सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे स्वच्छता, जल आपूर्ति और सीवरेज को अलग-अलग विभाग नहीं, बल्कि एक साझा जिम्मेदारी के रूप में संचालित कर पाते हैं या नहीं। शहर के कई इलाकों में पुरानी पाइपलाइनें, अधूरी मैपिंग और तकनीकी निगरानी की कमी पहले भी थी, लेकिन अब इन कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। भागीरथपुरा ने यह स्पष्ट कर दिया कि एक छोटी सी लापरवाही पूरे शहर की साख को दांव पर लगा सकती है। वॉटर प्लस, सेवन स्टार और अन्य राष्ट्रीय मानक अब इंदौर के लिए उपलब्धि के इतर निरंतर दबाव बन गए हैं..क्योंकि अब हर तमगे के साथ यह सवाल जुड़ा है कि क्या ज़मीनी हकीकत भी उतनी ही मजबूत है। नागरिकों के मन में भी बेचैनी है कि जिन्होंने स्वच्छता को अपनाया, नियमों का पालन किया, वे अब ये भी जानना चाहते हैं कि सिस्टम की जवाबदेही कहाँ तय होगी।
प्रखर सिंह के लिए यह एक कठिन परीक्षा होगी कि वे पारदर्शिता, नियमित जल सैंपलिंग, तकनीकी ऑडिट और त्वरित संवाद को स्वच्छता अभियान का स्थायी हिस्सा बना पाते हैं या नहीं। अगर यह संकट आत्ममंथन और सुधार का कारण बनता है, तो ही इंदौर अपनी छवि दुरुस्त कर पाएगा..अब यह प्रखर सिंह और पूरे सिस्टम पर निर्भर है कि वे इस चेतावनी को अवसर में बदलते हैं या इसे एक चूक मानकर आगे बढ़ जाते हैं..भागीरथपुरा इंदौर के लिए एक दाग ही नहीं, एक चेतावनी भी है कि स्वच्छता का ताज जितना चमकदार होता है, उतना ही नाजुक भी। इसे संभालने के लिए अब झाड़ू से ज्यादा सिस्टम, और नारों से ज्यादा निगरानी की जरूरत है। अगर इस चेतावनी को गंभीरता से लिया गया,तो ही इंदौर उभरेगा.. और अगर नजरअंदाज किया गया, तो इतिहास यही कहेगा कि सबसे साफ शहर भी कभी-कभी अपनी सबसे गंदी सच्चाई से हार जाता है।





