
शिप्रा की महिमा: शिप्रा में डुबकी लगाने से मिल जाता है गंगा में स्नान का पुण्य
कीर्ति राणा की विशेष रिपोर्ट
उज्जैन : देश की प्रमुख नदियों गंगा, नर्मदा और शिप्रा इन में शिप्रा का महत्व सर्वाधिक है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि यदि कोई श्रद्धालु शिप्रा में डुबकी लगाए तो वह गंगा स्नान के पुण्य का भागीदार हो सकता है।
सिंहस्थ-28 से पहले मुख्यमंत्री यादव का लक्ष्य है कि शिप्रा सतत प्रवाहमान तो हो ही, इसमें कान्ह-सरस्वती नदी वाली गंदगी को भी रोका जा सके।
इसका मुख्य कारण यह कि इंदौर के पास काकरी-बरदी पहाड़ियों के समीप क्षिप्रा का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां से निकली, बहती, लुप्त होती, कहीं दिखती, लुप्त होती शिप्रा जब उज्जैन पहुंचती है तो प्रति 12 वर्ष में होने वाले सिंहस्थ कुभ के कारण इसमें स्नान का महत्व बढ़ जाता है।
सतत प्रवाहमान नहीं होने से शिप्रा उज्जैन से आगे चंबल नदी में मिल जाती है। यही चंबल-शिप्रा यमुना में समाहित हो जाती है। प्रवाहमान यमुना फिर गंगा में और गंगा नदी फिर हिंद महासागर में समर्पण कर देती है। इसीलिये क्षिप्रा में डुबकी लगाने मात्र से गंगा में स्नान का पुण्य प्राप्त हो जाता है ऐसी धार्मिक मान्यता है।
क्षिप्रा नदी के उदगम से लेकर उसके प्रवाह मार्ग के स्थानों का अध्ययन करने वाले पूर्व प्रशासनिक अधिकारी चंद्र शेखर वशिष्ठ ने कहा कि स्कंद पुराण सहित अन्य ग्रंथों में इसीलिये कहा गया है कि क्षिप्रा के नाम स्मरण मात्र से वहीं पुण्य मिलता है जो नर्मदा के दर्शन और गंगा में स्नान से मिलता है। इसीलिये स्नान करते वक्त स्कंद पुराण में शिप्रा में स्नान की महिमा वाला मंत्र भी है-
ॐ क्षिप्रे क्षीर-समेपे च, महापातक-हारिणी।
अमृतेश्वरी नमस्तुभ्यं, त्रैलोक्य-पावनी शिवे॥
अर्थात- क्षीर (अमृत) के समान जल वाली, तीनों लोकों को पवित्र करने वाली और समस्त पापों का नाश करने वाली माँ अमृतेश्वरी क्षिप्रा को नमन है। इस प्रकार शिप्रा को गंगा से भी अधिक पवित्र और पुण्य-प्रदायिनी माना गया है। मन, वचन और कर्म- तीनों द्वारा किये गये पापों का नाश करने की शक्ति शिप्रा-जल में विद्यमान है।
🔹शिप्रा आए कहां से, शिप्रा जाए कहां रे
मान्यता है कि भगवान विष्णु के रक्त से शिप्रा का जन्म हुआ है। इस का यात्रा मार्ग शिप्रा से चंबल, चंबल से यमुना, यमुना से गंगा फिर हिन्द महा सागर में मिलन है। ऋषियों ने अन्य पवित्र नदियों के मुकाबले इसके नाम स्मरण को ही पुण्य फलदायी इसलिये बताया है कि सतत प्रवाहमान होते हुए भी इसका प्रवाह नर्मदा या गंगा की तरह सर्वत्र दर्शनीय नहीं है। कहीं यह बहती नजर आती है तो कही लुप्त हो जाती है।
वशिष्ठ ने शिप्रा के उदगम से लेकर बहाव क्षेत्र की जानकारी देते हुए बताया-
1. शिप्रा या क्षिप्रा नदी: इसका उद्गम स्थल इंदौर के पास काकरी-बरदी पहाड़ियों से माना जाता है।
2 क्षिप्रा का संगम स्थल : चंबल नदी में मप्र के मंदसौर (मप्र) के पास भानपुरा तहसील के गाँव धनोदा गुराडिया के निकट। चंबल नदी का चौड़ा बहाव क्षेत्र है।
3. चंबल नदी आगे चलकर यमुना में मिलती है पचनदा, इटावा उत्तर प्रदेश में।
पचनदा की विशेषता : यहाँ 5 नदियों चंबल, यमुना, सिंध, क्वारी (कुनवारी) और पहूज नदी मिलती है। इसलिए इसे “पचनदा” (पांच नदियों का संगम) कहा जाता है।संगम के पास प्रमुख गाँव कालेश्वर और भरेह क्षेत्र (इटावा) है। पचनदा के समीप कालेश्वर महादेव मंदिर प्रसिद्ध है, जहाँ संगम के दर्शन के लिए मेला भी भराता है।
4. यमुना नदी गंगा में मिलती है प्रयागराज-संगम।
5. गंगा अंत में बंगाल की खाड़ी समुद्र में समारित हो जाती है।
🔹पुराणों में शिप्रा स्नान का महत्व
पुराणों में क्षिप्रा में स्नान का पुण्य गंगा स्नान से दस गुना अधिक बताया गया है। यह नदी वैकुंठ लोक में स्थित कामधेनु के शरीर से उत्पन्न हुई है।
वापी, कूप, तड़ाग आदि में स्नान से जितना पुण्य मिलता है, उससे दस गुना अधिक फल नदी में नहाने से, इससे दस गुना ज्यादा फल ताप्ती और गोदावरी में स्नान करने से, इससे दस गुना ज्यादा फल रेवा और गंगा में स्नान करने से तथा इससे भी दस गुना ज्यादा फल शिप्रा में स्नान करने से प्राप्त होता है।





