

श्रीराम का काल: पौराणिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक विमर्श
डॉ बिट्टो जोशी की खास प्रस्तुति
भारतीय संस्कृति और इतिहास में श्रीराम का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के आदर्श, मर्यादा और नैतिकता के प्रतीक भी हैं। उनके जीवन और काल को लेकर सदियों से विमर्श चलता आ रहा है- क्या वे ऐतिहासिक पात्र थे, उनका काल कब था, और रामायण में वर्णित घटनाएं कितनी प्राचीन हैं..? भारतीय काल गणना, पौराणिक ग्रंथ, खगोलीय गणनाएं और आधुनिक वैज्ञानिक शोध- सभी मिलकर इस प्रश्न को और रोचक बना देते हैं।
“भारतीय कालगणना में रामायण काल की स्थिति:
भारतीय कालगणना के अनुसार, सृष्टि को लगभग 19,60,85,3121 वर्ष हो चुके हैं। वर्तमान में वैवस्वत मन्वंतर की 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है। एक चतुर्युगी में सतयुग (17,28,000 वर्ष), त्रेतायुग (12,96,000 वर्ष), द्वापरयुग (8,64,000 वर्ष) और कलियुग (4,32,000 वर्ष) आते हैं।
शास्त्रों के अनुसार महाभारत का युद्ध द्वापरयुग के अंत में, आज से लगभग 5,500 वर्ष पूर्व हुआ था। श्रीराम का जन्म त्रेतायुग के अंत में हुआ था, यानी द्वापरयुग (8,64,000 वर्ष) और कलियुग (लगभग 5,200 वर्ष) जोड़ दें, तो श्रीराम का काल आज से लगभग 8,70,000 से 9,00,000 वर्ष पूर्व माना जाता है। कई संतों और पौराणिक ग्रंथों में यह काल और भी अधिक- पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व तक जाता है।
“पौराणिक और ज्योतिषीय प्रमाण:
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के जन्म के समय की ज्योतिषीय स्थिति का उल्लेख है, जिसे आधुनिक सॉफ्टवेयर (जैसे ‘प्लेनेटेरियम गोल्ड’) से सत्यापित करने के प्रयास हुए हैं। वराहमिहिर और अन्य ज्योतिषाचार्यों ने सप्तऋषि चक्र, नक्षत्र गणना और अन्य खगोलीय घटनाओं के आधार पर भी रामायण काल की पुष्टि की है।
कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, श्रीराम का जन्म 5114 ईसा पूर्व, 10 जनवरी को हुआ था, जब ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति रामायण में वर्णित स्थिति से मेल खाती है। एक अन्य मत के अनुसार, उनका जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था।
पुराणों और ज्योतिष में युगों की गणना के अलग-अलग तरीके (लाखों वर्ष, 5 वर्ष, 1250 वर्ष) मिलते हैं, जिससे श्रीराम के काल पर अलग-अलग मत बनते हैं।
“वैज्ञानिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण:
रामायण में वर्णित सफेद चार दाँतों वाले हाथी (Gomphothere) के जीवाश्म भारत में मिले हैं, जिनकी उम्र 10 लाख से 50 लाख वर्ष के बीच है। इससे कुछ विद्वान रामायण काल को वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाखों वर्ष पुराना मानते हैं।
रामायण में वर्णित ताँबे के तीर, टेराकोटा के बर्तन, आभूषण आदि की कार्बन डेटिंग से वे 7,000 वर्ष पुराने पाए गए हैं, जिससे रामायण की ऐतिहासिकता को बल मिलता है।
अयोध्या में खुदाई, टेराकोटा मूर्तियां, प्राचीन स्तंभ, और अन्य अवशेष भी रामायण की ऐतिहासिकता की ओर संकेत करते हैं। रामायण में वर्णित स्थानों- अयोध्या, चित्रकूट, पंचवटी, लंका आदि—की आधुनिक भौगोलिक स्थिति और वहां मिले पुरातात्विक अवशेषों का भी उल्लेख किया जा सकता है।
डॉ. पद्माकर वर्तक ने हिमालय और विंध्याचल की ऊँचाई के अंतर के आधार पर भी रामायण काल का अनुमान लगाया है। उनके अनुसार, हिमालय की ऊँचाई हर 100 साल में 3 फीट बढ़ती है, जिससे अनुमानित समय लगभग 8 लाख वर्ष पूर्व आता है।
रामसेतु के निर्माण को लेकर भी कई वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं, जिन्होंने इसके अस्तित्व और निर्माण प्रक्रिया को समझने में मदद की है।
“आधुनिक विज्ञान की सीमाएँ:
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रामायण की घटनाओं को पूरी तरह प्रमाणित करना आज भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि कई घटनाएं प्रतीकात्मक या सांस्कृतिक भी हो सकती हैं।
“सांस्कृतिक प्रभाव:
श्रीराम के आदर्शों का भारतीय समाज, साहित्य, कला और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। रामलीला, मंदिर, त्योहार, और लोककथाओं में उनकी छवि आज भी जीवंत है।
निष्कर्ष:
श्रीराम का काल, जिसे त्रेतायुग माना जाता है, पौराणिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। भारतीय काल गणना के अनुसार यह लाखों वर्ष पूर्व का बताया जाता है, जबकि आधुनिक शोध इसे हज़ारों वर्ष पूर्व का मानते हैं। वैज्ञानिक, ज्योतिषीय और पुरातात्विक प्रमाण इस विमर्श को और भी गहरा बनाते हैं। श्रीराम का आदर्श, मर्यादा और जीवन आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।