“जहां से देश चले, वह स्थान प्रेरणादायी हो”: PM ने दिया सेवा तीर्थ से विकसित भारत का संदेश

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“जहां से देश चले, वह स्थान प्रेरणादायी हो”: PM ने दिया सेवा तीर्थ से विकसित भारत का संदेश

New Delhi: राजधानी नई दिल्ली में शुक्रवार को प्रधानमंत्री Narendra Modi ने ‘सेवा तीर्थ’ और ‘कर्तव्य भवन’ राष्ट्र को समर्पित करते हुए केंद्र सरकार के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत दिया। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि 21वीं सदी का पहला क्वार्टर पूरा हो चुका है और अब विकसित भारत की परिकल्पना केवल नीतियों में नहीं, बल्कि उन इमारतों और कार्यस्थलों में भी दिखनी चाहिए, जहां से देश का संचालन होता है।

प्रधानमंत्री ने इसे केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति में परिवर्तन का प्रतीक बताया।

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● पुराने ढांचे की सीमाएं और 100 साल पुरानी इमारतों की चुनौती

प्रधानमंत्री ने कहा कि North Block और South Block जैसी इमारतें देश के इतिहास का हिस्सा हैं, लेकिन वे लगभग एक सदी पुरानी हो चुकी हैं। इन भवनों में जगह की कमी, आधुनिक तकनीकी सुविधाओं का अभाव और संरचनात्मक जर्जरता जैसी समस्याएं सामने आ रही थीं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आजादी के दशकों बाद भी केंद्र सरकार के मंत्रालय दिल्ली के 50 से अधिक अलग अलग स्थानों से संचालित हो रहे थे। इससे प्रशासनिक समन्वय और दक्षता प्रभावित होती थी।

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सरकारी आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न भवनों के किराए पर हर वर्ष 1500 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय हो रहा था। साथ ही रोजाना 8 से 10 हजार कर्मचारियों के आवागमन में अतिरिक्त लॉजिस्टिक खर्च और समय की हानि भी होती थी।

 

● सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन से क्या बदलेगा

प्रधानमंत्री ने कहा कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से मंत्रालयों का एकीकरण होगा, जिससे निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और खर्च में कमी आएगी। कर्मचारियों का समय बचेगा और उत्पादकता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को संरक्षित कर उन्हें संग्रहालय के रूप में विकसित करने की योजना है, ताकि देश की प्रशासनिक विरासत को संरक्षित रखा जा सके।

प्रधानमंत्री ने कहा कि जहां से देश का संचालन होता है, वह स्थान प्रभावशाली ही नहीं, बल्कि प्रेरणादायी भी होना चाहिए। उनके अनुसार, विकसित भारत की दिशा में यह एक आवश्यक कदम है।

 

● गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का संदेश

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में औपनिवेशिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि साउथ और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक सोच को लागू करने के लिए बनाई गई थीं। अब नए परिसर भारत की जनता की आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर तैयार किए गए हैं। उन्होंने पहले किए गए प्रतीकात्मक परिवर्तनों का भी उल्लेख किया। उदाहरण के तौर पर National War Memorial के निर्माण और राजपथ का नाम बदलकर Kartavya Path रखने का निर्णय उन्होंने सत्ता के मिजाज को ‘शासन’ से ‘सेवा’ में बदलने का प्रयास बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नाम परिवर्तन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मानसिकता परिवर्तन का हिस्सा है।

 

● विजया एकादशी के दिन उद्घाटन, संकल्प और प्रतीकात्मक संदेश

13 फरवरी को विजया एकादशी के अवसर पर हुए इस उद्घाटन को प्रधानमंत्री ने विशेष महत्व का बताया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में विजया एकादशी का दिन विजय के संकल्प का प्रतीक माना गया है और विकसित भारत का लक्ष्य लेकर सेवा तीर्थ में प्रवेश इसी भावना के साथ किया गया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अब यहां से लिए जाने वाले फैसले किसी शासक वर्ग की सोच के नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होंगे।

 

● राजनीतिक और प्रशासनिक मायने

विश्लेषकों का मानना है कि यह परियोजना केंद्र सरकार की व्यापक पुनर्विकास योजना का हिस्सा है, जिसके तहत नई प्रशासनिक संरचना विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य मंत्रालयों का केंद्रीकरण, खर्च में कमी और कार्यकुशलता में वृद्धि बताया जा रहा है। हालांकि विपक्ष पहले भी इस तरह की परियोजनाओं की लागत और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता रहा है।

सरकार का तर्क है कि दीर्घकाल में किराए और बिखरे प्रशासनिक ढांचे पर होने वाले खर्च में कमी आएगी और बेहतर समन्वय से नीति क्रियान्वयन की गति तेज होगी।

● विकसित भारत की प्रशासनिक आधारशिला

प्रधानमंत्री के शब्दों में, “जहां से देश चलता है, वह स्थान प्रेरणादायी होना चाहिए।” सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन को उन्होंने विकसित भारत की प्रशासनिक आधारशिला बताया।

अब देखने वाली बात यह होगी कि यह नया ढांचा किस तरह प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और जनसेवा की गति को प्रभावित करता है। फिलहाल सरकार इसे नए युग के शासन मॉडल की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत कर रही है।