
दिव्यांगों के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्क्राइब बदलने के प्रश्न पर विचार
– विनय झैलावत
सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसला सुनाया, जिससे दिव्यांग संघ लोक सेवा आयोग उम्मीदवार के लिए स्क्राइब (लेखक) का नाम बदलना आसान हो जाएगा। जिन्हें देखने में दिक्कत है, उनके लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर लागू करने में भी मदद मिलेगी। न्यायालय के निर्देशों के मुताबिक, संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवार, जो स्क्राइब (लेखक) के लिए योग्य हैं, उन्हें परीक्षा से कम-से-कम सात दिन पहले तक लेखक का नाम बदलने की रिक्वेस्ट करने की इजाजत होगी। इसके अलावा, संघ लोक सेवा आयोग अपने परीक्षा में देखने में दिक्कत वाले उम्मीदवार के लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल के लिए दो महीने के अंदर एक प्लान बनाकर न्यायालय के सामने रखेगा।
यूपीएससी लेखक वह व्यक्ति होता है जो संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षाओं के दौरान किसी दिव्यांग उम्मीदवार (जैसे दृष्टिहीनता, चलने-फिरने में अक्षमता या सेरेब्रल पाल्सी) के उत्तर लिखता है। दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला इंटरनेशनल डे ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज के साथ मेल खाता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने ‘‘मिशन एक्सेसिबिलिटी‘‘ नाम की रिट याचिका पर यह फैसला सुनाया। यह एक ऑर्गनाइजेशन है, जो दिव्यांगजन के अधिकारों की वकालत करता है। इस याचिका में यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज परीक्षा में लेखक रजिस्ट्रेशन की टाइमलाइन में बदलाव करने और योग्य उम्मीदवार के लिए सुलभ डिजिटल प्रश्न पत्र के साथ स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर वाले लैपटॉप के इस्तेमाल की इजाजत देने की मांग की गई।
गठित की नई कमेटी न्यायालय ने कहा कि संघ लोक सेवा अयोग ने तब से एक सोच-समझकर आगे बढ़ने वाला फैसला लिया ताकि उसके द्वारा आयोजित की जाने वाली अलग-अलग परीक्षाओं में देखने में दिक्कत वाले उम्मीदवार को स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर की सुविधा दी जा सके। हालांकि, न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि फैसले को लागू करने में आने वाली कमियों को ‘‘ठोस योजना, अंतर रिजेंसी सहयोग और एक जैसे स्टैंडर्ड्स बनाने‘‘ के जरिए दूर किया जाना चाहिए ताकि आने वाली परीक्षा में एक्सेसिबिलिटी का लक्ष्य सिर्फ कागजों तक ही सीमित न रहे।
इस पृष्ठभूमि में संघ लोक सेवा आयोग के फैसले को असरदार तरीके से लागू करने के लिए न्यायालय ने ये निर्देश दिए। संघ लोक सेवा आयोग यह पक्का करेगा कि उसके द्वारा आयोजित परीक्षाओं के हर विज्ञापन में एक साफ प्रावधान शामिल किया जाए, जिससे लेखक के लिए योग्य उम्मीदवार परीक्षा की तारीख से कम-से-कम सात दिन पहले तक लेखक बदलने की रिक्वेस्ट कर सकें। साथ ही ऐसी रिक्वेस्ट पर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाएगा। इस संबंध में आवेदन के तीन कार्य दिवसों के भीतर एक तर्कपूर्ण आदेष द्वारा निपटाया जाएगा।
संघ लोक सेवा आयोग इस आदेश की तारीख से दो महीने के अंदर एक पूरा अनुपालन शपथ पत्र फाइल करेगा, जिसमें उसके द्वारा आयोजित परीक्षाओं में देखने में दिक्कत वाले उम्मीदवार के लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर के डिप्लॉयमेंट और इस्तेमाल के लिए प्रस्तावित प्लान ऑफ एक्शन, टाइमलाइन और तौर-तरीकों को साफ तौर पर बताया जाएगा। शपथ पत्र में सभी या तय परीक्षा केंद्रों पर सॉफ्टवेयर और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की टेस्टिंग, स्टैंडर्डाइजेशन और वैलिडेशन के लिए प्रस्तावित स्टेप्स भी बताए जाएंगे। साथ ही यह भी बताया जाएगा कि यह सुविधा अगले एग्जाम साइकिल से सभी योग्य उम्मीदवार के लिए चालू और उपलब्ध हो, इसकी संभावना कितनी है। संघ लोक सेवा आयोग, दिव्यांगजनों का उत्थान विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज) और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद विजुअल डिसेबिलिटीज (एनआईईपीवीडी) के साथ मिलकर स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर और दूसरी मददगार टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए एक जैसी गाइडलाइंस और प्रोटोकॉल बनाएगा ताकि सभी या पहचाने गए एग्जाम सेंटर्स पर परीक्षा प्रोसेस का स्टैंडर्डाइजेशन, एक्सेसिबिलिटी और सिक्योरिटी उस प्रकार से पक्की हो सके, जैसा उसे ठीक लगे।
भारत संघ, डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) और सामाजिक न्याय और उत्थान मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट) के जरिए, ऊपर बताए गए तरीकों को तेजी से लागू करने के लिए संघ लोक सेवा आयोग को सभी जरूरी एडमिनिस्ट्रेटिव और टेक्निकल मदद देगा और जहां भी जरूरत होगी, राज्य सरकारों और परीक्षा अथॉरिटीज के साथ कोऑर्डिनेशन में मदद करेगा। इसे इन तरीकों को इस तरह से लागू किया जाएगा, जिससे योग्य उम्मीदवार को पूरी एक्सेस मिले और परीक्षा प्रोसेस की पवित्रता, गोपनीयता और निष्पक्षता बनी रहे। न्यायालय ने कहा कि गवर्नेंस में सबको शामिल करने के लिए न सिर्फ प्रोग्रेसिव पॉलिसीज बनाना जरूरी है, बल्कि उन पॉलिसीज को ईमानदारी और असरदार तरीके से लागू करना भी जरूरी है। इसमें यह भी कहा गया कि संघ लोक सेवा आयोग के प्रोसेस ट्रांसपेरेंट, आसान और समाज के हर हिस्से की जरूरतों के हिसाब से सेंसिटिव होंगे। आगे कहा गया, ‘‘सही मायने में बराबरी का मतलब एक जैसा होना नहीं है, बल्कि उन रुकावटों को हटाना है, जो लोगों को बराबरी पर खड़े होने से रोकती हैं… दिव्यांग लोगों को दिए गए अधिकार भलाई के काम नहीं हैं, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में दिए गए बराबरी, सम्मान और भेदभाव न करने के संवैधानिक वादे का इजहार हैं।‘‘
भारत के लोगों को दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए बनाये गए कानून, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 को जानना चाहिए। यह अधिनियम दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को प्रभावी बनाने के लिये भारत की संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसे भारत ने वर्ष 2007 में अनुमोदित किया था। यह अधिनियम पहले के निशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 का स्थान लेता है। इसे भारत में दिव्यांगजनों की जरूरतों और चुनौतियों को संबोधित करने में अपर्याप्त तथा पुराना माना जाता था। अधिनियम द्वारा शुरू किये गए प्रमुख परिवर्तनों में से एक दिव्यांगता की परिभाषा और वर्गीकरण का विस्तार है। साथ ही यह अधिनियम 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता देता है। पिछले कानून के तहत यह मात्र सात प्रकार की थी। इनमें अंध और दृष्टि-बाधित, कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति, श्रवणविकार/दोष, चलन-संबंधी दिव्यांगता, बौनापन, बौद्धिक दिव्यांगता, मानसिक रुग्णता, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल स्थितियाँ, स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी, मल्टीपल स्केलेरोसिस, वाक् एवं भाषा दिव्यांगता, थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, सिकल सेल रोग, श्रवण विकार/दोष, तेजाब हमले से प्रभावित और पार्किन्संस रोग सहित कई दिव्यांगता सम्मिलित थी।
यह कानून केंद्र सरकार को निर्दिष्ट दिव्यांगता की किसी अन्य श्रेणी को अधिसूचित करने का अधिकार देता है। इसके अलावा यह दिव्यांग व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जिसके पास दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदी हानि है, जो बाधाओं के कारण, उन्हें दूसरों के साथ समान समाज में पूरी तरह और प्रभावी ढंग से भाग लेने से रोकती है। साथ ही बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें निर्दिष्ट दिव्यांगता 40 प्रतिषत से कम नहीं है, जहाँ निर्दिष्ट दिव्यांगता को मापने योग्य शर्तों में परिभाषित नहीं किया गया है और इसमें दिव्यांगता वाला व्यक्ति भी शामिल है, जहाँ निर्दिष्ट दिव्यांगता को मापने योग्य शर्तों में परिभाषित किया गया है, जैसे प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा प्रामाणित। इसके अलावा दिव्यांग व्यक्तियों को सहायता की उच्च आवश्यकता होती है और उन्हें अपनी दैनिक गतिविधियों के लिये दूसरों से सहायता की आवश्यकता होती है।
इससे स्पष्ट है कि नए कानून में दिव्यांगता को विस्तृत रूप से परिभाषित किया गया है। यह देखना रोचक होगा कि नया कानून दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में कौन से परिवर्तन लाने में सफल हो सकेगा।
(लेखक पूर्व असिस्टेंट सालीसीटर
जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)





