विनीता सिंह चौहान की तीन कवितायेँ

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विनीता सिंह चौहान की तीन कवितायेँ

  1.  पता

किसी ने मुझसे पूछा,
पता मेरे उस घर का,
जहां मैं रहती हूं….

उस दीवार ओ दर का,
किसी ने मुझसे पूछा,
पता मेरे उस घर का….

कितनी भीड़ व शोर है,
कितना बड़ा शहर है।
पर मैं तन्हाई के साथ हूं,
और मेरा मन बेघर है।।

किसी ने मुझसे पूछा,
पता मेरे उस घर का….

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तो मैं उससे क्या कहती
घर तो है मेरा भी…..
संग वहां तन्हाई रहती।

इसी जहां में है घर मेरा,
जहां मेरा रैन बसेरा,
उम्र कटने तक बस,
डाल रखा है यहां डेरा।

घर तो है मेरा भी…..
पता तो है मेरा भी…..

2.स्त्री जीवन के विभिन्न रंग
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स्त्री का तो रंगों से गहरा नाता है।
स्त्री को रंगों से ही पहचाना जाता है।।
नारंगी, गुलाबी, हरे, नीले….
बैगनी, कत्थई, लाल, पीले…

रंगीले व चटकीले रंगों से सजा था स्त्री का बचपन ,
मीठे स्वभाव से बना हर रंग के मानव से अपनापन,
सुख-दुख,सम विषम, जय पराजय में सदा,
विभिन्न रंगों से सजाया स्त्री ने अपना तन मन।

स्त्री जीवन के यौवन में जब आया रंग लाल….
लाल चूनर, लाल चूड़ी, लाल टीका, सोहे भाल,
प्रेम वर्षा में होकर सराबोर, स्त्री धर्म निभा,
नवजीवन संचारित कर, गढ़ देती नौनिहाल।

स्त्री जीवन के दूजे पड़ाव में….
तब्दीली होती जब हाव भाव में….
कर्तव्यों के वजन से…
चटकीले रंग हो जाते कुछ हल्के-फुल्के!
जूड़े में तब्दील होती…
कुछ काली कुछ सफेद बिखरी जुल्फें!

तब बिखरता जीवन में नया रंग।
ओढ़ जिम्मेदारियों के लबादे संग।।
अब स्त्री बनती धैर्य और साहस की मूरत।
समाज के समक्ष होती खड़ी अनुभव की मूरत।।

एक लंबा अनुभवी सफर…
कई दुख व सुख समेटे पहर,
कई कई बार तन्हा होकर,
जब दिखने लगता उम्र का असर।

कभी अपनों व रिश्ते नातों को खोकर,
कभी गिरते संभलते, खाकर ठोकर….
लपेट लेती है स्त्री स्वयं को धवल रंग में।
उम्र का हिसाब अब दिखता है,
उलझे सुलझे चमकते केश…
चांदी से उज्जवल रंग में।

तजुर्बे के वजन से कंपकंपाते हाथ…
एक-एक कर छूटता अपनो का साथ…
जिम्मेदारियों की झुर्रियों से…
जब तन हो जाता है बेरंग।
तब आकर एक फरिश्ता रोशनी सा…
थामकर आगोश में ले जाता अपने संग….

बस यही है स्त्री जीवन व उसके रंग,
जो बदलते रहते परिस्थितियों के संग।।

3.ग़ज़ल-अल्फाजों में वही दर्द दिखे

अब कलम क्या नया लिखे।
अल्फाजों में वही दर्द दिखे,

धूल पट गई दर अो दीवार पर,
पुरानी यादों का बसेरा दिखे।

आंखों में यादें ज़ज्ब हो गई ,
हर तरफ दर्द का पहरा दिखे

घाव दिए थे जो बरसों पहले ,
निशान आज भी गहरा दिखे।

था कभी गुलिस्तान जहां हमारा,
अब बस दश्त ओ सहरा दिखे।

हम तो हैं आज भी वही खड़े ,
वक्त यादों के साथ ठहरा दिखे।

आंखों को बेवफा अक्श दिखे।
चारो ओर विनीता सन्नाटा पसरा दिखे।

रचनाकार

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विनीता सिंह चौहान- प्रतिनिधि रचनाएं :- रुक गया वर्तमान , अनाथ बच्चे के भाव , बिटिया बिन अम्माॅ॑ की दिवाली
प्रकाशित कृतियां
दो काव्य संग्रह पुस्तकें प्रकाशित 2019 में
तीन बाल साहित्य पुस्तकें प्रकाशित 2024 में
1. आज फिर उठी कलम (काव्य संग्रह)
2. मेरी बिटिया (काव्य संग्रह)
3. चिड़ियाघर की सैर (बाल कविता संग्रह)
4. फूलों सी कहानियां (बाल कहानी संग्रह)
5. बालमन (बाल कविता संग्रह)

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