Tribal Mahakumbh : राजस्थान के बांसवाडा जिले का लोकतीर्थ- घोटिया अम्बा जहां लगता है राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासियों का महाकुम्भ!

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Tribal Mahakumbh : राजस्थान के बांसवाडा जिले का लोकतीर्थ- घोटिया अम्बा जहां लगता है राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासियों का महाकुम्भ!

राजेश सोनी की विशेष रिपोर्ट 

Banswara : राजस्थान, गुजरात और मालवा के आदिवासी क्षेत्रों में दूर-दूर तक प्रसिद्ध लोक तीर्थ घोटिया आम्बा, लोक आस्था और श्रद्धा का वह केन्द्र है, जिसके प्रति आमजन में अगाध विश्वास लहराता रहा है। राजस्थान के दक्षिणांचल में घोटिया आम्बा पर हर साल लगने वाला मेला इस कारण विशिष्ट और अन्यतम हैं क्योंकि यह एकमात्र ऐसा मेला है जो विक्रम संवत वर्ष की समाप्ति और नव वर्ष के आगमन का साक्षी है। घोटिया अम्बा एक प्राचीन और प्रसिद्व धर्म स्थल है, जो राजस्थान के बांसवाडा जिले में स्थित है। यह स्थल पाण्डवों के समय का माना जाता है,जहां उन्होंने भगवान शिव की आराधना की थी ।यहां एक विशाल आम्रवृक्ष हैं, जिसे पाण्डवों ने देवराज इन्द्र से प्राप्त गुठली से रोपा था।

बांसवाडा से लगभग 35 किलोमीटर बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के मध्य खूबसूरत पहाड़ियों की गोद में घोटिया अम्बा को महाभारत काल के दौरान पांडवों के छुपने का स्थान माना जाता था। घोटिया अम्बा को जिले के सभी पर्यटन स्थलों के बीच एक विशिष्ट महत्व मिला है। यहां पर आम का पेड़ (जिसे स्थानीय बोली में अंबा कहा जाता है) पांडवो द्वारा लगाया गया था जिसे घोटिया अम्बा का नाम दिया गया। हर साल हिंदू माह चैत्र में एक विशाल मेला लगाया जाता है जहां राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के तीर्थयात्रियों में बड़ी संख्या में आते हैं।

महाभारतकाल की गाथाओं से सम्बन्ध जोड़ने वाले ढेरों कथानक इस स्थल से जुड़े हुए हैं। यहां पाण्डवों का मन्दिर है जिसमें घोटेश्वर शिव, पार्वती व गणेश, नन्दी आदि के अलावा पाण्डवों की सात मूर्तियां हैं। जिनकी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती हैं। जाने कितनी सदियों से पाण्डवों की स्मृति में लगने वाला यह मेला आदिवासियों के लिए अगाध आस्था का केन्द्र हैं। धाम पर घोटेश्वर शिवालय के समीप पवित्र धूंणी, आश्रम, गौशाला, हनुमान मन्दिर व वाल्मीकि मन्दिर के अलावा दिव्य आम्रवृक्ष एवं पहाड़ों के गर्भ से रिसकर आने वाली जलराशि से भरे प्राचीन कुण्ड हैं।

घोटियां आम्बा यह वो पवित्र स्थल है जहां पांडव अपने बनवास के दौरान अपना काफी समय इस स्थान बिताया था। यहां पर भीम के द्वारा गदा से पहाड़ी पर प्रहार किया था जिससे वहां पर झरना निकला है जो आज भी है. यहीं पर पांडवों ने ऋषियों को केलों के पत्तो पर भोजन करवाया था वह केलो के पेड़ आज भी वही है। इस स्थान के पास एक केलापानी नामक स्थान है। केले का अर्थ केला और माना जाता है कि इस जगह पर पांडवों ने केलों के पत्तो पर ऋषियों और संतों को खाना खिलाया था। यह मंदिर और जगह राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग द्वारा देखी जाती है। घोटिया अम्बा मेला बांसवाड़ा, राजस्थान में लगता है, राजस्थान में बेणेश्वर के अलावा एक और बड़ा घोटिया अम्बा मेला हैं। प्राक्रतिक सुन्दरता से भरपुर इस स्थान पर हर वर्ष मेला लगता है जिसके कारण यह स्थान काफी प्रख्यात है।

मनोहारी केलापानी!

घोटेश्वर शिवालय से पहाड़ी रास्तों से होकर एक किलोमीटर दूर दुर्गम केलापानी स्थल हैं जहां महाबली भीम के गदा प्रहार से फूट निकला मनोहारी झरना और सघन वनश्री आच्छादित पहाड़ियां असीम आत्मसंतोष की वृष्टि करती हैं। यहां पाण्डवों की मूर्तियां व चरण चिह्न के अलावा राम मन्दिर, शिवालय हैं जिनमें सीता, लक्ष्मण, राम, शिव-पार्वती आदि की मूर्तियां सुशोभित हैं। पाण्डवों ने घोटिया आम्बा के पठार पर ऋषियों को केलों के पत्तों पर भोेजन परोसा था, उसी परम्परा में केले के झुरमुट यहां विद्यमान हैं जिनका दर्शन पुण्यदायक माना जाता है।

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कामनाएं पूरी करता है आम्र वृक्ष!

यहीं पर पोैराणिक आख्यानों से जुड़ा आम्रवृक्ष मनोकामनापूर्ति करने वाले दिव्य वृक्ष के रूप में प्राचीनकाल से प्रसिद्ध रहा है। जनश्रुति के अनुसार देवराज इन्द्र से प्राप्त गुठली को पाण्डवों ने यहां रोपा व यह तत्काल फलों से लदे विशाल आम्र वृक्ष के रूप में परिणत हो गया। इसी दिव्य वृक्ष के फलों के रस से पाण्डवों ने यहां भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से ऋषियों को तृप्त किया और आशीर्वाद पाया।

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संतों की बनी हुई है सेवा!

यहां संत श्री हिरागिरीजी महाराज के शतायु वर्ष में देवलोकगमन के बाद उनके गादीपति संत श्री रामगिरीजी महाराज यहां के प्रमुख सेवक है। जो मेले के दौरान संत्सग , कीर्तन, प्रसादी के साथ ही भक्तों की व्यवस्था भी देखते हैं। उन्होंने बताया कि यहां आने वाले भक्तगण अपने नए अनाज को लाकर पाण्डवों को भोग लगाते हैं। जिससे उनके घरों में धान्य की कमी नहीं रहती हैं। यहां के कुण्ड से जल ले जाकर अपने घरों आंगन खेत खलिहानों में छिटकने से सदैव खुशहाली बनी रहती है। यहां की विशेषता है कि जो शिवलिंग पाण्डवों ने स्थापित किया था उसकी जलाधारी पूर्वमुखी है। पाण्डवों ने यहां चैत्र नवरात्रि के पूर्व आने वाली अमावस्या के दिन आमरस का भोजन किया था इसीलिए हर वर्ष उस दिन से पांच दिवस का मेला प्रतिवर्ष यहां लगता हैं।

सुविधाओं की दरकार!

संत रामगिरीजी बताते हैं कि अंचल में होने वाले इस महाकुंभ में बडी संख्या में आने वाले भक्तों के लिए यहां पीने के पानी एवं हरियाली के लिए उद्यान की दरकार राजस्थान सरकार से बनी हुई हैं!