ट्रंप की खुशी और भारतीय विदेश नीति का नया व्याकरण

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ट्रंप की खुशी और भारतीय विदेश नीति का नया व्याकरण

▪️राजेश जयंत▪️

कहते हैं दुनिया कूटनीति से चलती है, लेकिन अब लगता है कि वह मूड से चलने लगी है। और अगर वह मूड व्हाइट हाउस से तय हो रहा हो, तो फिर देशों की विदेश नीति नहीं, बल्कि नेताओं की खुशामद नीति सक्रिय हो जाती है। हाल ही में एयर फोर्स वन पर बैठे ट्रंप साहब का बयान इसी नए दौर का उद्घोष जैसा है। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह जता दिया कि “मोदी उन्हें खुश करना चाहते थे” उन्हें पता था कि ट्रंप नाराज़ हैं, इसलिए रूस से तेल खरीद कम कर दी गई।

 

यह कोई साधारण बयान नहीं है। यह उस कहानी का खुला अध्याय है, जिसे भारतीय मीडिया रोज रंगीन कवर में “ग्लोबल स्टेट्समैन” और “विश्व गुरु” कहकर बेचता रहा है। लेकिन ट्रंप की एक झटकी में पूरी परत उतर आती है। सीजफायर हो जाता है, रूसी तेल का आयात घट जाता है और टैरिफ की धमकी पर “जी हुजूर” की मुद्रा अपने आप बन जाती है।

यहां सवाल यह नहीं है कि रूस से तेल कम हुआ या नहीं। सवाल यह है कि फैसला किस आधार पर हुआ। अगर फैसला राष्ट्रीय हित, दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन पर होता, तो बात अलग थी। लेकिन जब खुद अमेरिकी राष्ट्रपति यह कह दें कि “मैं खुश नहीं था, इसलिए खुश करना जरूरी था”, तो यह विदेश नीति नहीं, व्यक्तिगत संतुष्टि प्रबंधन बन जाती है।

 

भारत वर्षों से यह दावा करता आया है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है, संतुलित है और किसी एक ध्रुव पर निर्भर नहीं है। रूस के साथ “अटूट दोस्ती” इसी स्वतंत्रता का प्रतीक बताई जाती रही। लेकिन जैसे ही ट्रंप का मूड खराब हुआ, दोस्ती की परिभाषा बदल गई। रूस अचानक “नो” हो गया और अमेरिका “यस सर”।

इसका असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा। आर्थिक मोर्चे पर भी इसकी सीधी चोट दिखी। रूसी तेल कम हुआ, रिफाइनिंग वॉल्यूम गिरा और जिस “रशियन ऑयल जैकपॉट” को लेकर देश के बड़े कॉरपोरेट घराने फायदे गिन रहे थे, उस पर अचानक “ट्रंप टैक्स” लग गया। अब मुनाफा बाजार से नहीं, ट्रंप के मूड से तय होगा। आज खुश तो ठीक, कल नाराज़ तो टैरिफ डबल।

 

यही वह बिंदु है जहां व्यंग्य खुद लिखने लगता है। 2026 का नया मंत्र साफ दिखने लगा है। देश की अर्थव्यवस्था चलती रहे तो ठीक, रुक जाए तो भी कोई बात नहीं। रूस के साथ दोस्ती ओवररेटेड है। प्राथमिकता सिर्फ एक है, ट्रंप की खुशी। और बड़े उद्योगपतियों का रिफाइनिंग मार्जिन अब बैरल प्रति दिन से नहीं, बल्कि “डोनाल्ड मूड इंडेक्स” से तय होगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की विदेश नीति अब व्हाइट हाउस के किसी अदृश्य व्हाट्सएप ग्रुप में तय हो रही है। जहां एक मैसेज आता है और फैसले बदल जाते हैं। अगर ऐसा है, तो फिर संप्रभुता, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व जैसे भारी-भरकम शब्द सिर्फ भाषणों की शोभा बनकर रह गए हैं।

ट्रंप ने जो कहा, वह शायद उनके लिए डींग हो। लेकिन हमारे लिए वह आईना है। और आईने में जो दिख रहा है, वह “विश्व गुरु” नहीं, बल्कि “विश्व को खुश रखने की मजबूरी” है।