
वसंत पंचमी: जब मां शारदा सरस्वती का प्राकट्य हुआ और सृष्टि को वाणी, विवेक और ज्ञान मिला
▪️डॉ बिट्टो जोशी
वसंत पंचमी सनातन परंपरा का वह पावन पर्व है, जो केवल ऋतु परिवर्तन या सांस्कृतिक उत्सव तक सीमित नहीं है। यह वही दिव्य तिथि है, जब शास्त्रों के अनुसार मां शारदा सरस्वती का प्राकट्य हुआ और सृष्टि को वाणी, ज्ञान, विवेक तथा सृजन की शक्ति प्राप्त हुई। माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला यह पर्व उस क्षण का स्मरण कराता है, जब जड़ और मौन सृष्टि में शब्द, अर्थ और चेतना का संचार हुआ। इसलिए वसंत पंचमी को सनातन धर्म में ज्ञान-ज्योति के अवतरण का महापर्व माना गया है।
● शास्त्रों में मां सरस्वती का प्राकट्य और उसका अर्थ
पुराणों और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में संसार दिशाहीन और मौन था। तब भगवान ब्रह्मा ने अनुभव किया कि बिना ज्ञान और वाणी के सृष्टि अधूरी है। उसी क्षण उनकी जिह्वा से वाग्देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ। उनके प्रकट होते ही ध्वनि को अर्थ, शब्द को संरचना और विचार को अभिव्यक्ति मिली। यही कारण है कि मां सरस्वती को केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि ज्ञान की मूल चेतना कहा गया है।
“सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि। विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥”
● मां सरस्वती का स्वरूप: प्रतीक नहीं, गहन दर्शन
मां सरस्वती का श्वेत वस्त्र मन, विचार और चेतना की शुद्धता का प्रतीक है। उनकी वीणा यह दर्शाती है कि ज्ञान केवल संग्रह नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन और लय का साधन है। उनके हाथ में पुस्तक वेदों और शास्त्रीय अनुशासन का बोध कराती है, जबकि हंस विवेक का प्रतीक है—जो दूध और पानी को अलग कर सकता है। यह स्वरूप स्पष्ट करता है कि सच्ची विद्या वही है जो सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म में भेद करना सिखाए।
● वसंत पंचमी और ऋतु का धार्मिक संबंध
शास्त्रों में वसंत को “ऋतुराज” कहा गया है, क्योंकि यही वह काल है जब प्रकृति पुनः सृजन के लिए जागृत होती है। शीत ऋतु की निष्क्रियता के बाद जब वृक्षों में नवपल्लव आते हैं और पुष्प खिलते हैं, तब यह संकेत मिलता है कि जैसे प्रकृति जागृत हो रही है, वैसे ही मानव चेतना में भी ज्ञान का उदय होना चाहिए। पीत वर्ण, जो वसंत पंचमी से जुड़ा है, त्याग और वैभव दोनों का संतुलन सिखाता है।
● विद्यारंभ संस्कार और भारतीय शिक्षा परंपरा
सनातन परंपरा में वसंत पंचमी को विद्यारंभ का सर्वोत्तम मुहूर्त माना गया है। इसी दिन बालक को प्रथम अक्षर सिखाया जाता है, जिसे अक्षरारंभ संस्कार कहा जाता है। प्राचीन गुरुकुलों में इसी तिथि से वेदाध्ययन, संगीत, व्याकरण और दर्शन का विधिवत आरंभ होता था। यह परंपरा बताती है कि भारतीय शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि आत्मिक और नैतिक विकास था।
● मां सरस्वती और वाणी की मर्यादा
मां सरस्वती की उपासना केवल बुद्धि को तीक्ष्ण नहीं बनाती, बल्कि वाणी को भी मर्यादित करती है। शास्त्र कहते हैं कि जिस समाज में वाणी कटु हो जाती है, वहां ज्ञान होते हुए भी विवेक नष्ट हो जाता है। वसंत पंचमी यह स्मरण कराती है कि शब्दों का प्रयोग सृजन के लिए हो, विध्वंस के लिए नहीं। यही कारण है कि संत, ऋषि और आचार्य मां सरस्वती को वाणी की अधिष्ठात्री देवी मानते हैं।
● आज के समाज और नेतृत्व के लिए संदेश
वर्तमान समय में जब ज्ञान का उपयोग अहंकार, छल और वर्चस्व के लिए होने लगा है, तब मां सरस्वती का स्मरण और भी आवश्यक हो जाता है। यह पर्व सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को विनम्र बनाता है। शासन, प्रशासन और समाज का नेतृत्व तभी सफल हो सकता है जब निर्णय विवेक, नैतिकता और शास्त्रीय सोच से लिए जाएं। यही मां शारदा की वास्तविक कृपा है।
● मां सरस्वती की उपासना, जीवन का संस्कार
वसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह संकल्प का दिन है—कि ज्ञान को अहंकार नहीं, सेवा का माध्यम बनाया जाए। मां शारदा सरस्वती का स्मरण हमें यह बोध कराता है कि बिना विद्या समाज अंधकार में भटकता है, और बिना विवेक ज्ञान भी विनाशकारी बन सकता है। यही कारण है कि वसंत पंचमी सनातन धर्म में ज्ञान, संस्कार और सृजन की प्रतिष्ठा का महापर्व है।
नमस्ते शारदे देवी काश्मीरपुरवासिनि।
त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे॥





