‘वीणा की वाणी’: यादगार बना पत्रिकाओं के संपादकों का दो दिवसीय सम्मेलन

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‘वीणा की वाणी’: यादगार बना पत्रिकाओं के संपादकों का दो दिवसीय सम्मेलन

मीडियावाला की विशेष रिपोर्ट 

इन्दौर: मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा इंदौर में आयोजित देश की पत्रिकाओं के संपादकों का सम्मेलन
‘वीणा की वाणी’ यादगार बन गया। साहित्यिक पत्र -पत्रिकाओं पर अपनी तरह का इंदौर में यह संभवत पहला और अनूठा आयोजन था।

 

30 और 31 मार्च 2026 को मध्यप्रदेश के तेजी से महानगर में बदलते इंदौर शहर के देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय ,के तक्षशिला परिसर में 30 और 31 मार्च को आयोजित या सम्मेलन साहित्य अकादमी के उर्जावान निदेशक डॉ. विकास दवे की दूरदृष्टि ही कही जायगी जिससे हमारी युवा पीढ़ी साहित्य की तरफ आकर्षित हो सके. निश्चित रूप से निदेशक की परिकल्पना साहित्यिक पत्र -पत्रिकाओं के समक्ष बदलते समय में उत्पन्न हो रही चुनौतियों, उनके स्वरूप, सामग्री का स्तर और भविष्य की दिशा, साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित आर्थिक, तकनीकी और पाठकीय संकटों पर विमर्श को केंद्र में रख कर की गई। इसका उद्देश्य इन विषयों पर वैचारिक विमर्श के साथ साथ इनके समाधानों पर भी केन्द्रित रहा .इसी उद्देश्य से इस महत्वपूर्ण आयोजन में सम्पादन कला को केंद्र में रखकर विविध आयामी विषय चयन किये गए। साहित्य और स्वाद से भरा इंदौर शहर देश भर के संपादकों के इस वृहद आयोजन का मेजबान बना .

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इंदौर से निकलनेवाली ,एक उल्लेखनीय गौरवपूर्ण इतिहास रच चुकी साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ के शताब्दी वर्ष के चलते ‘वीणा की वाणी’ का सार तत्व यही कहता है कि साहित्यिक पत्रकारिता में चुनौतिया ,संघर्ष ,संकट हमेशा ही रहे हैं लेकिन लक्ष्य और संकल्प यदि अर्जुन की आँख की तरह एकाग्रता बनाए रखते हुए निर्धारित गति से चला जाय तो शताब्दी वर्ष भी संभव हो जाता हैं। इसी प्रेरक सन्देश के साथ इस आयोजन में हम सभी ने शुभारम्भ और उद्यापन के बीच सम्पादन के विविध तत्वों और तथ्यों पर केन्द्रित आठ सत्रों में इस दायित्व और संकल्प को देखा ,सुना ,समझा ,और समाधान मूलक सार सार को ग्रहण करने का प्रयास किया .

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मालवा में कहावत है बोनी अच्छी हो तो सफलता मिलती है .या कहूँ आयोजन का श्री गणेश यानी शुभारंभ बहुत शुभ और मंगलमय होना लक्ष्य प्राप्ति का संकेत होता है .इस आयोजन का उद्घाटन ही ‘देश समाज के प्रति दायित्व बोध ‘और राष्ट्र में समरसता का भाव जाग्रत करने की शुभ और सात्विक विचार धारा के साथ माँ वीणापाणी के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ .स्वागत भाषण के माध्यम से डॉ.विकास दवे ने अपने सम्बोधन में कहा कि सम्पादन एक कला है जिसके साथ संपादन (Editing) का अर्थ किसी भी लिखित, दृश्य या श्रव्य सामग्री (लेख, पुस्तक, वीडियो, फिल्म) को प्रकाशन या प्रदर्शन से पहले संशोधित, परिष्कृत और व्यवस्थित करना है। इसमें भाषा सुधार, त्रुटि-सुधार (proofreading), तथ्य-जांच, कांट-छांट और सामग्री को आकर्षक बनाना शामिल है ताकि वह स्पष्ट और प्रभावी बन सके.सम्पादक को समाज की तमाम विसंगतियों ,के बावजूद साहित्य को इस तरह प्रस्तुत करना आना चाहिए जो सकारात्मक हो और राष्ट्रवाद के साथ समाज में समरसता का भाव पैदा कर सके .

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वीणा के संपादक राकेश शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे करने वाले हैं ऐसे में सिंहावलोकन करते हुए अपने पूर्वजों का उनके कार्यों का स्मरण करना चाहिए । 1927 में वीणा शुरू हुई और अब अपनी शताब्दी वर्ष में है ,वह इस निरन्तरता को कैसे बनाए हुए हैं यह जानना और समझना होगा .निष्कर्ष यह की तेज दौड़ने से बेहतर है अपनी गति को साध कर समय प्रबन्धन और आर्थिक प्रबन्धन का संतुलन भी बना कर चलें तो लम्बी यात्रा की जा सकती है .
केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा के उमापति दीक्षित जी ने कहा कि साहित्य यानी सब का हित। सभागार को उन्होंने शिव तांडव स्तोत्र का सस्वर पाठ करते हुए मंत्रमुग्ध आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। देवी अहिल्या बाई विश्व विद्यालय के कुल गुरु डा. राकेश सिंहई ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी की शुद्धता और उसके व्याकरण के महत्त्व के लिए संपादकों को अपनी पत्रिकाओं में एक श्रुंखला देना चाहिए जिससे युवा वर्ग उसे सीख सके।

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डॉ सोनाली सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह सत्र -हमें सम्पादन कला की विविधता के सत्रों के लिए उर्जान्वित कर गया .सूत्रधार अमन व्यास का उल्लेख इस लिए जरुरी है कि उनकी संचालन क्षमता ,उनकी भाषा की उच्चता और संयमित सम्भाष इस सत्र को एक सूत्र में पिरोये रखने में सफल रहा .

अब बात करते हैं तकनीकी सत्रों के साथ सम्पादन पर विमर्श की ——
1. ‘जो दिखता है वही बिकता है’:

यह सत्र किसी भी प्रकाशन के उस परदे के पीछे के काम को रेखांकित करने वाले तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सहज संवाद के रूप में पूर्ण हुआ जिनके बिना कोई भी प्रकाशन प्रभावी नहीं हो सकता .इस सत्र को प्रिंटिंग और लेआउट विशेषज्ञ संजय पटेल ,मनोज राठोर ,श्री हेमंत और समावर्तन जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक श्रीराम दवे ने अपने अनुभव और चुनोतियों की रोचक चर्चा करते हुए स्पष्ट किया .

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• सिर्फ शब्द किसी पत्रिका को पाठक में रूचि जगाने के लिए काफी नहीं होते .उसमें तकनीकी और ग्राफिक्स का संतुलित समायोजन उसे आकर्षक और प्रभावी बनाता है
कागज की क्वालिटी ,ग्राफिक्स और एनिमेशन के लिए समय और भरोसा ,एक सुव्यवस्थित डमी ,सम्पादक का दृष्टिकोण और रंग संयोजन पर केन्द्रित होता है जिसके लिए समय दिया जाना चाहिए .और आवरण पृष्ठ को कलात्मक रूप से प्रस्तुत करने के लिए कलात्मक चित्रों का लिया जाना क्यों जरुरी है यह स्पष्ट हुआ

इस सत्र में -जो महत्वपूर्ण सार रहा –

कागज और छपाई की बढ़ती लागत के कारण प्रकाशन उद्योग, विशेषकर समाचार पत्र और पत्रिकाएँ, संकट में है ,ऐसे में पृष्ट संख्या को थोड़ा सा कम किया जाकर लागत को बजट अनुरूप किया जाना चाहिए ,कम सामग्री हो, पर रोचक ज्ञानवर्धक और प्रासंगिक हो और कलेवर आकर्षक हो .
• रंग संयोजन में कैसे कम लागत में नए प्रयोग किये जाय .
• रेखांकन क्यों जरुरी है और उसके मर्म को प्रस्तुत करने के लिए कलाकार को समय दिया जाना क्यों जरुरी है .
• वर्तिनी ,नुक्तों का प्रयोग ,भाषागत त्रुटियाँ साहित्य को कितनी क्षति पहुचाती है .जैसे विषय और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से उठ रही चिंता भी चर्चा में रही . .

2.अगला सत्र ‘थोड़ी हँसी थोड़ी खुशी’

कार्टून कोना किसी भी समाचार पत्र को बेहद प्रभावशाली बनाता है, क्योंकि कार्टून के माध्यम से जो बात कह दी जाती हैं, वह बड़े-बड़े लेखों के माध्यम से नहीं कही जा पातीं।
कार्टून के माध्यम से तत्कालीन व्यवस्था की कमियों पर व्यंग-कटाक्ष किया जाता है, अथवा कार्टून के माध्यम मनोरंजनात्मक बातों को कह कर पाठकों कुछ समय के लिये तनाव से मुक्ति पाने अवसर दिया जाता है। अपने कार्टून के माध्यम से सामाजिक समस्याओं की ओर सबका ध्यान आकर्षित कराता है। कार्टूनिस्ट वो बात कह देता है, जिसे बडे-बड़े लेखक नही कह पाते। बहुत से समाचार पत्र अपने कार्टूनों के लिये ही लोकप्रिय होते हैं। लोग ‘कार्टून कोना’ जरूर देखते हैं।
साहित्य की बोझिलता के बीच थोड़ी हंसी और मन हल्का करने के लिए यह महत्वपूर्ण विधा अपनाई जाना चाहिए यह बात डॉ विकास दावे और सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट डॉ.देनेंद्र शर्मा की बातचीत से निकली .

3.कला और साहित्य का संगम

यह सत्र रुचिकर कलेवर और सौन्दर्य बोध पर केन्द्रित रहा . सोनाली जी के सवाल और सारंग जी के सटीक जवाब का सिलसिला ही  इसका सहज और सरल स्वरुप रहा जिसने इसे रुचिकर बनाया . श्रोतागण में से डॉ दवे जी ने एक सवाल किया संपादक से चित्रकार की अपेक्षा क्या है?सारंग जी ने जवाब में कहा सबसे महत्वपूर्ण है समय। ‘समय सीमा’ साथ ही उचित पारिश्रमिक भी मिलना चाहिए।कला और साहित्य दो रचनात्मक विधाएँ हैं जो इतिहास भर एक दूसरे से जुड़ी रही हैं। अभिव्यक्ति की ये दोनों विधाएँ मानवीय अनुभवों को तलाशने का प्रयास करती हैं, भाषा और बिंबों के प्रयोग से भावनाओं और अर्थों को व्यक्त करती हैं। कला और साहित्य के बीच संबंधों का पता लगा, और यह स्पष्ट हुआ कि अभिव्यक्ति की ये दोनों विधाएँ एक दूसरे को कैसे प्रभावित करती.ईस महत्वपूर्ण सत्र को कलाकार श्री सारंग क्षीरसागर से डॉ सोनाली सिंह ने प्रश्नोत्तरी के माध्यम से साकार किया .

निष्कर्ष – कला और साहित्य का अंतर्संबंध समाज में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें मानवीय अनुभवों को विभिन्न तरीकों से समझने और व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। अभिव्यक्ति के ये दोनों रूप सामाजिक मानदंडों को चुनौती दे सकते हैं और चिंतन-मनन को प्रेरित कर सकते हैं। विभिन्न रचनात्मक रूपों को एक साथ लाकर, हम अपने आसपास की दुनिया को समझने और उसकी व्याख्या करने के नए और नवोन्मेषी तरीके विकसित कर सकते हैं।

4. अस्तित्व का संकट

इस विषय पर ईश्वर शर्मा से लोकेन्द्र सिंह राजपूत की आपसी बातचीत हुई। डिजिटल माध्यमों के आने से पठन संस्कृति में गिरावट आई है। साहित्यिक पत्रिकाओं के पास संसाधन सीमित है।जिससे वे संकट में है इस विषय को उठाया गया . डिजिटल माध्यमों के आगमन ने सूचना प्राप्त करने के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव किया है, लेकिन साथ ही पारंपरिक पठन संस्कृति (Reading Culture) में स्पष्ट गिरावट और बदलाव भी देखने को मिले हैं।उन्होंने बताया एआई पर कॉपीराइट्स जैसी कोई समस्या नहीं होती है। साथ ही तकनीक से डरने और घबराने की भी जरूरत नहीं है। बस उसको उपयोग करने का तरीका जो है उसे सीखने की आवश्यकता है। जिससे हमारा काम आसान हो ना कि हम खुद उसके जाल में फस जाए।समय के बदलाव के साथ हममें भी बदलाव होना चाहिए। बस मशीन या तकनीक हमारा उपयोग न करें हमें उनके उपयोग के साथ में आगे बढ़ना है।
अतिथियां के करकमलों से जागृत मालवा पत्रिका का विमोचन हुआ।इस सत्र के बाद में दो सत्र और संपन्न हुए जहां पर पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं का संक्षिप्त विवरण मंच पर प्रस्तुत किया।

द्वितीय दिवस

  1. ‘छपास की भूख’ (प्रसिद्धि की लालसा)-  प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता: शोभा जैन के साथ मंच पर सूर्यकांत नागर, शुभदा पांडे, प्रेम जनमेजय, राहुल अवस्थी, संजीव सिन्हा रहे।द्वितीय दिवस का शुभारंभ भी दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ

सत्र का मुख्य विषय ‘छपास की भूख’ (प्रसिद्धि की लालसा) के कारण साहित्य के गिरते स्तर और संपादकों द्वारा अपने मूल धर्म (नैतिकता और चयन की शुचिता) से विमुख होने पर तीखा प्रहार था।शोभा जैन ने रेखांकित किया कि आज की रचनाओं में मौलिकता लुप्त हो रही है। ‘छपास की भूख’ को एक ‘मानवीय उत्कंठा’ के साथ-साथ एक मनोवैज्ञानिक विकृति के रूप में भी देखा जाना चाहिए।  रचनाओं के गिरते स्तर पर डॉ शोभा जैन ने कहा इसके लिए लेखक से अधिक संपादक जिम्मेदार हैं।उनका विधागत ज्ञानतात्विक बोध कितना है यह भी समझना जरुरी है.. लेखकों की पीढ़ी तो सदियों से  प्रकाशन के लिए ऐसी ही प्यासी रही है यह गलत भी नहीं है.लेकिन लेखक सिर्फ लिखने में लगा है न तो उसे पत्रिका की तासीर देखनी है न पूर्वज लेखकों को पढ़ना है..

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-इतिहास में भी बड़े से बड़े साहित्यकारों की रचना लौटाई गई लेकिन उन्होंने उसे सहर्ष लिया आज रचनाएं लौटाई जाए (अस्वीकृत )लेखक सम्पादकों पर निजी आक्षेप लगा देता है बजाय रचना पर काम करने के.संपादक भी विचारधारा विशेष के अनुयायी हो गये रचनाओं की गुणवत्त की समझ पत्रिका के स्तर का निर्धारण करती है..संपादकों को पुरखे संपादकों का अध्ययन उनकी कार्य शैली से गुजरना चाहिए..

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उनके अनुसार: निराला और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान रचनाकारों के लिए ‘छपास’ एक सृजनात्मक संतोष का विषय था, जो आज के लेखकों में केवल संख्यात्मक वृद्धि तक सीमित रह गया है।
सुप्रसिद्ध व्यंगकार श्री प्रेम जन्मेजय ने कहा कि कि व्यंग विधा को  कई वर्षों तक साहित्य की विधा माना ही नहीं गया .
साहित्य में विचारधाराएं चलती हैं,उन्होंने कहा संपादक बनते ही स्वयं का लेखन दूर होने लगता है.उन्होंने कहा कि सभी संपादकों को एक ही कतार में खड़ा करना उचित नहीं है। हर संपादक की अपनी दृष्टि और कार्यशैली होती है।उन्होंने ‘छपास की भूख’ (छपने की तीव्र इच्छा) पर प्रहार करते हुए कहा कि इसे भूख नहीं, बल्कि ‘अभिव्यक्ति का अतिरेक’ कहना चाहिए।

 वरिष्ठ साहित्यकार श्री ​सूर्यकांत नागर  ने कहा कि बड़े से बड़े साहित्यकार भी आज ‘येन-केन-प्रकारेण’ छपने की कोशिश में रहते हैं। नए लेखकों को इस ‘छपास की भूख’ से बचना चाहिए। उन्होंने एक संस्मरण साझा किया कि कैसे एक बार शरद जोशी जी और कमलेश्वर जी ने नागर जी से रचना मांगी थी, लेकिन रचना पसंद न आने पर उसे वापस लौटा दिया था। यह एक संपादक की ईमानदारी का परिचायक है। उन्होंने कहा कि मैंने भी उसे सहजता से स्वीकार किया, जरूर मेरी ही रचना कमजोर होगी और प्रारंभिक चरण में यह सभी के साथ होता है।

उन्होंने लेखकों के लिए सुझाव दिया कि लेखक के लिए ‘धैर्य’ सबसे बड़ी पूंजी है और ‘जल्दबाजी’ सबसे बड़ी कमजोरी। पहले बाहर की दुनिया को समझो, पढ़ो, फिर मूल्यांकन करो। समझ से पहले समझाना गलत है।

संपादक की गरिमा संपादक को अपने अहंकार से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टि से कार्य करना चाहिए। यदि किसी की रचना अस्वीकार करनी हो, तो उसे सीधे मना करने के बजाय सुझाव देना चाहिए कि ‘कुछ और लिखकर भेजें.रचना लौटाना भी एक कला है जो सकारात्मक प्रभाव छोडती .संपादक को निर्भीक,निडर और निरपेक्ष होना चाहिए

डॉ विकास दवे ने  संस्थाओं और पत्रिकाओं के पंजीयन , उसके नियमों पर चर्चा करते हुए डिक्लेरेशन के नियम भी बताए। बताया प्रेस सेवा पोर्टल की सदस्यता और उनके पोर्टल पर आपकी पत्रिका का अकाउंट होना चाहिए   ,अपना प्रोफाइल वहां दर्ज करना चाहिए। प्रेस सेवा पोर्टल पर प्रकाशन के 48घंटे में आवरण स्कैन कर पोस्ट करना होता है। इस अकाउंट पर मुद्रण और विक्रय की जानकारी भी अनिवार्य है। हमें अपनी पत्रिका का एक अंक राजा  राममोहन राय   लाइब्रेरी में प्रेषित करना चाहिए।वहां वह सुरक्षित हो जाती है।एक प्रति जनसंपर्क कार्यालय,एक पोस्टल कार्यालय को और  पीआई बी को भी भेजी जाना चाहिए। पांच साल तक जानकारी न देने पर आपका शीर्षक निरस्त करने का प्रावधान भी है यह जानना चाहिए .

इसके साथ ही हम सब अपनी पत्रिका को नीति आयोग में पंजीकृत करें और केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा से पत्र पत्रिकाओं के अनुदान के लिए करें।मध्यप्रदेश का संस्कृति विभाग संस्था को भी अनुदान देती है और आप वहां अपलाई कर सकते हैं। एक वार्षिक आयोजन के निमित अनुदान की योजना है ।

उद्यापन सत्र /समापन सत्र 

निरोगधाम पत्रिका के संपादक अशोक कुमार पांडे, वरिष्ठ साहित्यकार,इंदौर लेखिका संघ की संस्थापक, अध्यक्ष  डॉ स्वाति तिवारी, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे उपस्थित रहे।इस अवसर पर डॉ .स्वाति तिवारी ने दो दिवस  के इस वृहत आयोजन की त्वरित और अपनी मौलिकता में अनूठेपन और सौंदर्यपूर्ण शब्दों के सृजनात्मकता, कौशल और व्यक्तिगत दृष्टिकोण का सम्मिश्रण रखते हुए रिपोर्ट के साथ सिंहावलोकन प्रस्तुत किया .

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निरोगधाम पत्रिका के  सफलता  भरे  निरंतर प्रकाशन के पीछे जो कारण रहे उन्हें स्पष्ट करते हुए इस आयोजन पर  अकादमी को  बधाई दी .
निरोग धाम के संपादक अशोक पांडे जी ने पाथेय प्रदान किया।सुश्री सोनी सुगंधा ने संपादक धर्म पर ‘नमन मेरा शत-शत नमन है’ गीत प्रस्तुत किया।

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तत्पश्चात कांता राय एवं सुनीता प्रकाश की लघुकथा वृत्त का विमोचन हुआ। साहित्य अकादमी जब भी किसी साहित्यिक अनुष्ठान को आयोजित करती है तो इस आयोजन में उपस्थित सबसे वरिष्ठ साहित्यकार को सम्मानित किया जाता है। आज भी ‘वीणा की वाणी’ के मंच से सभी के आदरणीय वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी का सम्मान इस मंच पर हुआ।और अंत यानी की नए शुभारंभ में विदाई पाथेय मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे ने दियाविशेष रूप से उल्लेखनीय है इस आयोजन में युवा प्रतिभा संचालक अमन व्यास की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। आयोजनों में ऐसे ही सूत्रधार होने चाहिए जो सम्पूर्ण आयोजन को अपनी प्रभावी शैली से बांधे रखे ।।दो दिवसीय साहित्य समागम में देश भर से साहित्यकार लेखक कवि पत्रकार शिक्षाविद संपादक एवं वरिष्ठ जनों ने सहभागिता कर कार्यक्रम को ऊंचाई प्रदान की ।