अजित जोगी: अध्यापक, आईपीएस, आईएएस और सीएम से लेकर बाग़ी तक

अजित जोगी: अध्यापक, आईपीएस, आईएएस और सीएम से लेकर बाग़ी तक

मीडियावाला.इन।

छत्तीसगढ़ राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजित जोगी का आज रायपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया.

इसी महीने की नौ तारीख़ को गंगा इमली नामक एक फल का बीज उनकी श्वांस नली में अटक गया था. इसके बाद कॉर्डियक अरेस्ट के कारण उन्हें रायपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

प्राध्यापक, आईपीएस, आईएएस, सांसद और फिर मुख्यमंत्री तक का सफ़र तय करने वाले अजीत जोगी पिछले 16 सालों से व्हीलचेयर पर थे. एक सड़क दुर्घटना के बाद उनके कमर के नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था.

लेकिन अजित जोगी अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अपनी इच्छाशक्ति और जिजीविषा के बल पर राज्य के सर्वाधिक चर्चित नेता बने रहे.

उनके विरोधी भी कहते थे कि जोगी व्हीलचेयर के सहारे नहीं, 'विलपावर' यानी इच्छाशक्ति के सहारे हैं.

29 अप्रैल 1946 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्मे अजित जोगी ने भोपाल से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से क़ानून की डिग्री ली.

जोगी ने कुछ समय तक रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन भी किया. यहीं रहते हुये उन्होंने सिविल सर्विसेस की परीक्षा दी और भारतीय पुलिस सेवा के लिये चुने गये. डेढ़ साल तक पुलिस सेवा में रहने के बाद जोगी ने फिर से परीक्षा दी और वो भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिये चुन लिये गये.

इन परीक्षाओं में कभी आरक्षण का लाभ नहीं लेने वाले अजित जोगी ख़ुद को आदिवासी मानते थे लेकिन पिछले कई सालों से उनकी जाति पर विवाद बना रहा. अभी भी उनकी जाति का मामला न्यायालय में लंबित है.

जोगी अविभाजित मध्य प्रदेश में 14 सालों तक कई महत्वपूर्ण ज़िलों के कलेक्टर रहे. अपनी दबंग छवि के कारण वो मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के काफ़ी नज़दीकी लोगों में शुमार थे. अर्जुन सिंह और राजीव गांधी की सलाह पर ही उन्होंने नौकरी छोड़ी और फिर उन्हें कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा का सदस्य बनाया.

जल्दी ही अजित जोगी राजीव गांधी की कोर टीम के सदस्य बन गये. दो बार राज्यसभा के लिये चुने जाने वाले अजित जोगी को कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया.

लोकसभा चुनाव में हार के बाद बने मुख्यमंत्री

1998 में उन्होंने रायगढ़ लोकसभा से पहली बार चुनाव लड़ा और वो संसद पहुंचे. हालांकि एक साल बाद 1999 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

तब मान लिया गया था कि पार्टी में अब जोगी को हाशिये पर ही रहना होगा. लेकिन वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से अलग जब छत्तीसगढ़ राज्य बनाया गया तो मुख्यमंत्री के तमाम नामों की अटकलों के बीच अप्रत्याशित रूप से अजित जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनाये गये.

जोगी ने किसी करिश्माई नेता की तरह काम करना शुरू किया. स्थानीय बोली में दिये जाने वाले उनके भाषणों ने पहली बार लोगों में छत्तीसगढ़िया अस्मिता को जगाने का काम किया. रामानुजगंज से लेकर कोंटा तक, राज्य के अलग-अलग हिस्सों में उनके हर दिन के दौरों का रिकॉर्ड अब तक बरक़रार है.

अजित जोगी कहते थे-"मैं सपनों का सौदागर हूं."

लेकिन कहा जाता है कि अफ़सर से नेता बने जोगी ने अपने अफ़सरों पर कहीं अधिक भरोसा किया और राज्य में अफ़सरशाही ने पार्टी के नेताओं को ही हाशिये पर खड़ा कर दिया. सरकार एक के बाद एक गंभीर आरोपों में उलझती गई.

अंततः केवल तीन साल के भीतर ही 'सपनों के सौदागर' से 'यथार्थ का सार्थवाह' बनने की उनकी कोशिश धरी रह गई और 2003 में जोगी के नेतृत्व में लड़े गये विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनी गई. जिसने अगले 15 सालों तक शासन किया.

2003 के चुनाव के दौरान ही उनके बेटे अमित जोगी पर राकांपा के नेता राम्वतार जग्गी की हत्या के आरोप लगे और उन्हें लंबे समय तक जेल में भी रहना पड़ा.

सत्ता जाने और बेटे के हत्या के आरोप में फंसने के बाद 2003 में कथित रूप से भाजपा विधायकों की ख़रीद-फरोख़्त का आरोप उन पर लगा और कांग्रेस पार्टी ने उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया.

अगले साल यानी 2004 में अजित जोगी का न केवल निलंबन वापस हुआ, बल्कि पार्टी ने उन्हें महासमुंद से लोकसभा की टिकट भी दी.

आपातकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहने के अलावा कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों में शुमार किये जाने वाले विद्याचरण शुक्ल इस सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे. लेकिन अजित जोगी यह सीट जीतने में कामयाब रहे.

दुर्घटना

चुनाव के दौरान ही 20 अप्रैल 2004 में जोगी एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गये और उनके कमर से नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया. तब से वो अब तक व्हीलचेयर पर ही थे.

लेकिन अजित जोगी की राजनीति पहले की तरह जारी थी. 2008 के विधानसभा चुनाव में राज्य में शीर्ष नेताओं ने कुल मिलाकर जितने दौरे किये थे, उससे अधिक दौरे और भाषण, अकेले व्हीलचेयर पर बैठे अजीत जोगी के हिस्से में थे.

कविता, कहानी और सामयिक मुद्दों पर लिखना-पढ़ना भी उन्होंने नहीं छोड़ा.

इसी दौरान अजित जोगी की पत्नी डॉ. रेणु जोगी और उनके बेटे अमित जोगी भी राजनीति में उतरे और विधायक चुने गये.

छत्तीसगढ़ में 16 सालों तक प्रदेश कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कोई भी रहा हो लेकिन पार्टी में सबसे निर्णायक भूमिका अजित जोगी की ही बनी रही.

बाद के दिनों में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव की जोड़ी ने अपना वर्चस्व बढ़ाना शुरू किया और जोगी को पार्टी में हाशिये पर डालने की कोशिश शुरू हुई. छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी में नेताओं के बीच छत्तीस के आंकड़े गहराने लगे.

इसी बीच बस्तर के अंतागढ़ के उपचुनाव के दौरान कांग्रेस के उम्मीदवार को चुनाव मैदान से हटाने के लिये कथित रूप से सौदेबाजी करने का एक क्लिप वायरल होने के बाद 2016 में कांग्रेस पार्टी ने उनके बेट विधायक अमित जोगी को पार्टी से 6 सालों के लिये निष्काषित कर दिया और अजित जोगी को भी नोटिस थमा दिया गया.

छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस

इसके बाद अजित जोगी ने ख़ुद ही कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया. अजित जोगी को लेकर तरह-तरह के कयास लगते रहे लेकिन जोगी ने 21 जून 2016 को छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस नाम से ख़ुद की पार्टी बनाने की घोषणा की.

अजित जोगी की लोकप्रियता के कारण माना जा रहा था कि उनकी पार्टी राज्य में सरकार बना पाये या न बना पाये, राज्य में सरकार बनाने में सबसे निर्णायक भूमिका ज़रूर निभायेगी.

2018 में उनकी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के साथ समझौता करके विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन अपनी परंपरागत सीट मरवाही से अजित जोगी और कोटा विधानसभा से उनकी पत्नी रेणु जोगी के अलावा पार्टी के केवल 3 अन्य उम्मीदवार ही विधानसभा पहुंच पाये. यहां तक कि बहुजन समाज पार्टी की ओर से मैदान में उतरीं अजित जोगी की बहु ऋचा जोगी भी चुनाव हार गईं.

90 सीटों वाली विधानसभा में केवल 5 विधायकों की जीत के बाद पार्टी के कई नेताओं ने किनारा करना शुरू कर दिया. पार्टी लगभग हाशिये पर आ गई. लेकिन अजीत जोगी के बेटे और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष अमित जोगी लगातार पार्टी को राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण बनाने की कोशिश में जुटे रहे. अजित जोगी भी राज्य की कांग्रेस पार्टी की सरकार पर लगातार निशाना साधते रहे.

यह भी दिलचस्प है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी की सरकार और नेताओं को लगातार घेरने वाले अजीत जोगी ने यथासंभव सोनिया गांधी को लेकर कभी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की. यही कारण है कि राजनीतिक गलियारे में अफ़वाहें फैलती रहती थीं कि अजित जोगी किसी भी दिन कांग्रेस पार्टी में शामिल हो सकते हैं.

अब इन अफ़वाहों पर हमेशा-हमेशा के लिये विराम लग गया है.

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