जल चेतना से जागी साहित्य साधना, “जल गंगा संवर्धन” पर चार दिवसीय रचनात्मक अभियान

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जल चेतना से जागी साहित्य साधना, “जल गंगा संवर्धन” पर चार दिवसीय रचनात्मक अभियान

ALIRAJPUR : आस्था, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी जब एक साथ आकार लेती है, तो शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, बल्कि बदलाव का माध्यम बन जाते हैं। ऐसा ही एक प्रेरक और सार्थक आयोजन शब्दिता साहित्य कला संस्था, आलीराजपुर द्वारा संयोजिका माधुरी सोनी “मधुकुंज” के नेतृत्व में देखने को मिला, जहां मध्यप्रदेश शासन के “जल गंगा संवर्धन” अभियान को साहित्य के माध्यम से जीवंत रूप दिया गया।

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*● चार दिन, अनेक विचार, एक संकल्प*

इस चार दिवसीय साहित्यिक आयोजन में संस्था की महिला रचनाकारों ने जल संरक्षण और उसके विविध आयामों पर अपने विचार, लेख, कविताएं और स्तुतियां प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य केवल लेखन नहीं, बल्कि जल के प्रति चेतना और जिम्मेदारी को समाज तक पहुंचाना रहा।

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*● जल के विविध आयामों पर गहन अभिव्यक्ति*

इस आयोजन में जल संरक्षण, जल स्रोतों का पुनरुद्धार, नदियों की स्वच्छता, कृषि भूमि की उर्वरता, सिंचाई के साधन, घटता जल स्तर, वर्षा जल संग्रहण और नदी घाट निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को केंद्र में रखा गया। पूर्णिमा व्यास ने जल को प्रकृति का अनुपम उपहार बताते हुए उसकी महत्ता को लोक स्तुति के माध्यम से अभिव्यक्त किया। अंजू सिसोदिया ने जल और भूमि संरक्षण के साथ उर्वरता के संबंध पर अपने विचार रखे। संध्या पांडे ने नदियों के जल स्तर, जल संग्रहण और कृषि-बागवानी के संबंध को रेखांकित किया, वहीं निर्मला माहेश्वरी ने प्राचीन काल में जल की लोक महत्ता और बूंद-बूंद सहेजने की परंपरा पर प्रकाश डाला।

 

*● भविष्य की चिंता और समाधान की दिशा*

प्रतिभा पंचोली ने “जल बिन जीवन सूना” विषय पर घटते जल स्तर के दुष्प्रभाव और उससे बचाव के उपायों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। वंदना शर्मा और सुरभि रोमिल जैन ने भविष्य में गहराते जल संकट और जल स्रोतों के पुनरुद्धार की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए।

ज्योति श्याम जोशी ने पौराणिक काल से लेकर वर्तमान तक नदियों की महिमा को अपने लेख में जीवंत किया, जबकि आरती सोलंकी ने जल के संरक्षण में शासन और समाज की भूमिका पर प्रकाश डाला।

 

*● कविता, स्तुति और भावनाओं का संगम*

कीर्ती भरत राठौड़ ने “मां नर्मदा तू है कलयुग की गंगा” विषय पर सुंदर स्तुति रचकर उसे स्वर भी दिया, जिससे आयोजन में भावनात्मक ऊर्जा का संचार हुआ। अश्विनी शर्मा ने जल गंगा समर्पण पर कविता प्रस्तुत की, वहीं निशा शाह ने भावी पीढ़ी को जल संरक्षण का संदेश देते हुए घर-घर से इसकी शुरुआत करने पर जोर दिया।

 

*● संकल्प के साथ समापन*

इस आयोजन के अंत में संस्था की महिलाओं ने संकल्प लिया कि वे घर-घर जाकर महिलाओं, बच्चों और युवाओं को जल संरक्षण, प्राचीन कुओं और बावड़ियों के रखरखाव तथा जल स्रोतों के प्रति नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक करेंगी।

अध्यक्षा सुरभि सपन जैन और अन्य सदस्यों ने भी इस प्रकार के जागरूकता आधारित साहित्यिक आयोजनों को निरंतर जारी रखने की बात कही।

यह आयोजन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि जल के प्रति जिम्मेदारी का उत्सव बनकर सामने आया, जहां साहित्य ने समाज को एक नई दिशा देने का कार्य किया।